श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीहरिवल्लभ जी) (१५
षोडश पार्षद
मो चित्तवृत्ति नित तहँ रहौ जहँ नारायण पार्षद।।
विष्वक्सेन जय विजय प्रबल, बल मंगलकारी।
नन्द सुनन्द सुभद्र, भद्र जग आमयहारी।।
चण्ड प्रचण्ड विनीत, कुमुद कुमुदाक्ष करुणालय।
शील सुशील सुषेन, भावभक्तन प्रतिपालय।।
लक्ष्मीपति प्रीणन प्रवीन भजनानन्द भक्तनि सुहृद।
मो चित्तवृत्ति नित तहँ रहौ जहँ नारायण पार्षद।। ८।।
पार्षद मुख्य कहे सोरह सुभाव सिद्ध, सेवा ही की ऋद्धि हिये राखी बहु जोरिकै।
श्रीपति नारायन के प्रीनन प्रवीन महा, ध्यान करै जन पालैं भाव दृग कोरिकै।।
सनकादि दियो शाप प्रेरिकै दिवायो आप प्रगट ह्वै कह्यो पियो सुधा जिमि घोरिकै।
गही प्रतिकूलताई जोपै यही मन भाई याते रीति हद गाई धरी रंग बोरिकै।। २५।।
श्रीहरिवल्लभजी
हरिवल्लभ सब प्रार्थौं जिन चरणरेणु आसा धरी।।
कमला गरुड़ सुनन्द, आदि षोडश प्रभु पद रति।
हनुमन्त जामवन्त सुग्रीव विभीषण शबरी खगपति।।
ध्रुव उद्धव अम्बरीष, विदुर अक्रूर सुदामा।
चन्द्रहास चित्रकेतु ग्राह, गज पाण्डव नामा।।
कौषारव कुन्ती बधू पट ऐंचत लज्जा हरी।
हरिवल्लभ सब प्रार्थौं जिन चरणरेणु आसा धरी।। ६।।
हरि के जे वल्लभ हैं दुर्लभ भुवन माँझ, तिनही की पदरेणु आसा जिय करी है।
योगी यती तपी तासौं मेरो कछु काज नाहिं, प्रीति परतीति रीति मेरी मति हरी है।।
कमला गरुड़ जाम्बवान सुग्रीव आदि, सबै स्वादरूप कथा पोथिन में धरी है।
प्रभु सौं सचाई जग कीरति चलाई अति, मेरे मन भाई सुखदाई रस भरी है।। २६।।