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सर्वकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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पृष्ठ 146

श्रीतुलसीदासजी) (१३१
ठाढ़ौ हाथ जोरि, मति दीनता में वोरि, कीजै दण्ड मोपै कोरि, यों निहारि मुख भाखियै।
घटती ने मेरी, आप कृपा ही की घटती है, बढ़ती-सी करी, तातें न्यूनताई राखियै॥
सुनिकै प्रसन्न भये, कहे लै प्रसंग नये, बालमीकि आदि दै-दै, नानाविधि साखियै।
आये निज गाँव, नाम सुनि सब साधु धाये, भयोई समाज वैसो, देखि अभिलाखियै।।५०६।।
आये बहु गुनीजन, नृत्य-गान छाई धुनि, ऐपै सन्तसभा मन, स्वामी गुण देखिये।
जानिकै प्रवीन उठे, नूपुर नवीन बाँधि, सप्तस्वर तीन ग्राम, लीन भये पेखिये।।
गायौ रघुनाथ जू कौ, वन कौ गमन समैं, ता संग गमन प्रान, चित्र सम लेखिये।
भयौ दुखरासि, कहाँ पैयै श्रीमुरारिदास, गये राम पास, एतौ हिये अबरेखिये।। ५०७।।
मास परायण तेईसवाँ विश्राम
गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी (भक्तमाल सुमेरु)
कलि कुटिल जीव निस्तार हित, बाल्मीकि तुलसी भयौ।।
त्रेता काव्य निबन्ध, करी सतकोटि रमायन।
इक अक्षर उद्धरैं, ब्रह्म हत्यादि परायन ।।
अब भक्तनि सुखदैन, बहुरि लीला विस्तारी।
रामचरन रसमत्त, रहत अहर्निसि व्रतधारी ।।
संसार अपार के पार को, सुगम रूप नवका लयौ।
कलि कुटिल जीव निस्तार हित, बाल्मीकि तुलसी भयौ ।। १२६ ।।
तिया सौं सनेह, बिन पूछे पिता गेह गई, भूली सुधि देह, भजे वाही ठौर आये हैं।
बधू अति लाज भई, रिस सौं निकसि गई, प्रीति राम नई, तन हाड़-चाम छाये हैं।।
सुनी जब बात, मानौ ह्वै गयौ प्रभात, वह पाछे पछितात्त, तजि कासीपुरी धाये हैं।
कियौ तहाँ वास, प्रभुसेवा लै प्रकास कीनौ, लीनौ दृढ़भाव, नैन रूप के तिसाये हैं।। ५०८।।
शौच जल शेष, पाय भूतहू विशेष, कोऊ बोल्यौ सुखमानि, हनुमान जू बताये हैं।
रामायन कथा सौ, रसायन है काननि कौ, आवत प्रथम पाछे, जात घृना छाये हैं।।
जाय पहिचानि, संग चले उर आनि आये, वन मधि जानि, धाय पाँय लपटाये हैं।
करैं तिरस्कार कही, सकौगे न टारि मैं तो, जाने रससार रूप, धर्यौ जैसे गाये हैं।। ५०६ ।।
माँगि लीजै वर, कही दीजै राम भूपरूप, अति ही अनूप नित, नैन अभिलाखियै।
कियौ लें संकेत, वाही दिन ही सौं लाग्यौ हेत, आई सोई समैं, चेत कब छबि चाखियै ।।