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सर्वकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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पृष्ठ 141

१२६) (श्री भक्तमाल
श्रीकिशोरसिंहजी
अभिलाष उभै खैमाल का, ते किशोर पूरा किया ।।
पाँयनि नूपुर बाँधि, नृत्य नगधर हित नाच्यौ।
राम कलस मन रली, सीस तातें नहीं बाच्यौ ।।
वानी विमल उदार, भक्ति महिमा विस्तारी।
प्रेमपुंज सुठि सील, विनय सन्तनि रुचिकारी ।।
सृष्टि सराह्रै राम सुव, लघु वयस लछन आरज लिया।
अभिलाष उभै खैमाल का, ते किशोर पूरा किया ।।१२१।।
खेमालरतन तन, त्याग समैं अश्रुपात, बात सुत पूछैं, अजू नीकें खोलि दीजिये।
कीजै पुण्य दान बहुँ, सम्पति अमान भरी, धरी हिये दोई सोई, कही सुनि लीजिये ।।
विविध बड़ाई में, समाई मति भई पै नं, नित ही विचार अब, मन पर खीजिये।
नीर भरि घट सीस, धरिकै न ल्यायो और, नूपुरन बाँधि नृत्य, कियौ नाँहि छीजिये ।।४६१।।
रहे चुपचाप सबै, जानी, काम आप ही कौ, बोल्यौ, यों किसोर नाती, आज्ञा मोकौं दीजियै।
यही नित करौं, नहीं टरौं जौलौं जीवै तन, मन में हुलास उठि, छाती लाय जीजियै ।।
बहु सुख पाये, पाये वैसे ही निवाहे, पन, गाये गुन लाल प्यारी, अति मति भीजियै।
भक्ति विस्तार कियौ, वयस लघु भीज्यौ हियौ, दियौ सनमान सन्तसभा सब रीझियै ।।४६२।।
श्रीहरीदासजी
खेमालरतन राठौर की, सुफल बेलि मिठी फली ।।
हरीदास हरिभक्त, भक्ति मन्दिर कौ कलसौ।
भजन भाव परिपक्व, हृदै भागीरथि जल सौ ।।
त्रिधा भाँति अति अनन्य, राम की रीति निबाही।
हरि गुरु हरिबल भाँति, तिनहिं सेवा दृढ़ साही ।।
पूरन इन्दु प्रमुदित उदधि, त्यों दास देखि बाढ़े रली।
खेमालरतन राठौर की, सुफल बेलि मीठी फली ।। १२२ ।।