श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२२) (श्री भक्तमाल
राजैं गिरिधारीलाल, तिनहीं सौं रंग जाल, बोलत हँसत ख्याल कान परी प्यारी है।
जायकै सुनाई, भई अति चपलाई, आयौ लिये तरवार दै, किवार खोलि न्यारी है।।४७६।।
जाके संग रंग भींजि, करत प्रसंग नाना, कहाँ वह नर गयौ, वेगि दै बताइयै।
आगे ही विराजै कछू तोसों नहीं लाजै अभूँ, देखि सुख साजै, आँखें खोलि दरसाइयै।।
भयौई खिसानौ, राना लिख्यौ चित्र भीत मानौ, उलटि पयानौ कियौ नेकु मन आइये।
देख्यौ हूँ प्रभाव ऐपै, भाव में न भिद्यौ जाइ, बिना हरिकृपा कहो, कैसे करि पाइयै।।४७७।।
विषई कुटिल एक, भेष धरि साधु लियौ, कियौ यों प्रसंग, मोसों अंग-संग कीजियै।
आज्ञा मोकौं दई आप, लाल गिरिधारी अहो, सीस धरि लई करि, भोजन हूँ लीजिये।।
सन्तनि समाज में, बिछाय सेज बोलि लियौ, शंक अब कौन की, निशंक रस भीजियै।
सेत मुख भयौ, विषैभाव सब गयौ, नयौ पाँयन पै आय, मोकौं भक्तिदान दीजियै।।४७८।।
रूप की निकाई भूप, अकबर भाई हिये, लिये, संग तानसेन देखिवे कौं आयो है।
निरखि निहाल भयौ, छबि गिरिधारीलाल, पद सुखजाल एक, तबही चढ़ायो है।।
वृन्दावन आई, जीव गुसाँई सौं मिलि झिली, तिया मुख देखिवे को, पन लै छुटायो है।
देखि कुँज-कुँज, लाल प्यारी सुखपुंज भरी, धरी उर माँझ आय, देश वन गायो है।।४७६।।
राना की मलीन मति, देखि बसी द्वारावति, रति गिरिधारीलाल, नित ही लड़ाइयै।
लागी चटपटी भूप, भक्ति कौ सरूप जानि, अति दुख मानि, विप्र श्रेणी लै पठाइयै।।
वेगि लैकेँ आवौ मोकौं, प्रान दै जिवावौ अहो, गये द्वार धरनौ दै, विनती सुनाइयै।
सुनि विदा होन गई, राय रनछोर जू पै, छाँड़ौं राखौ हीन, लीन भई नहीं पाइयै।।४८०।।
श्रीपृथ्वीराजजी आमेर नरेश
आमेर अछत कूरम कौ, द्वारकानाथ दरसन दियौ।।
श्रीकृष्णदास उपदेश, परमतत्त्व परचौ पायौ।
निरगुन सगुन निरूप, तिमिर अज्ञान नसायौ।।
काछ वाच निकलंक, मनौ गांगेय युधिष्ठिर।
हरि पूजा प्रह्लाद, धर्मध्वज धारी जग पर।।
पृथ्वीराज परचौ प्रगट, तन शंख चक्र मण्डित कियौ।
आमेर अछत कूरम कौ, द्वारकानाथ दरसन दियौ।।११६।।