श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकेशवभट्टजी काश्मीरी) (८५
'सारंग' छाप ताकी भई, श्रवण सुनत आवेश देत।
ब्रजबधू रीति कलियुग विषैं परमानन्द भयौ प्रेमकेत।।७४।।
श्रीकेशवभट्टजी काश्मीरी
केशवभट नरमुकुटमणि, जिनकी प्रभुता विस्तरी।।
काश्मीरि की छाप, पाप तापन जग मण्डन।
दृढ़ हरिभक्ति कुठार, आन धर्म बिटप विहण्डन।।
मथुरा मध्य मलेच्छ, वाद करि बरबट जीते।
काजी अजित अनेक, देखि परचै भय भीते।।
विदित बात संसार सब, सन्त साखि नाहिन दुरी।
केशवभट नरमुकुटमणि, जिनकी प्रभुता विस्तरी।। ७५।।
(चार कवित्त अन्य कवि कृत हैं)
करि दिग विजै सब पण्डित हराय दिये, लिये बड़े-बड़े जीति भीति उपजाई है।
फिरत चौडौल चढ़े गज बाजि लोग संग, प्रतिभा कौ रंग आये नदिया प्रभाई है।।
डरे द्विज भारी महाप्रभु जू विचारी तब, लीला विस्तारी गंगा तीर सुखदाई है।
बैठे ढिंग आय बोले नम्रता जनाय रह्यो, जग जसु छाय नेकु सुनै मनभाई है।।
'लरिकान संग पढ़ौ बातें बड़ी-बड़ी गढ़ौ, ऐपै रढ़ौ कहौं सोई सीलता पै रीझियै'।
'गंगा कौ सरूप कहौ' 'चाहौ दृग आगे सोई', नये सौ श्लोक किये सुनि मति भीजियै।।
तामें एक कण्ठ करि पढ़िकै सुनायौ 'अहो! बड़ो अभिलाष याकी व्याख्या करि दीजियै'।
अचरज भारी भयौ कैसे तुम सीखि लयो?, 'दयौ लै प्रभाव तुम्हें ताने दयौ जीजियै'।
दूषन औ भूषन हूँ कीजियै बखान याके, सुनि दुख मानि कही दोष कहाँ पाइयै।
'कविता प्रबन्ध मध्य रहै खोटि गन्ध अहो ! आज्ञा मोकौं देउ कह्यो 'कहिकै सुनाइयै'।।
व्याख्या करि दई नई औगुन सुगुनमई, आये निज धाम 'भोर मिले' समुझाइयै।
सरस्वती ध्यान कियौ आई ततकाल बाल, बाल पै हरायो सब जग जितवाइयै।
बोली सरस्वती 'मेरे ईश भगवान वेतौ मान मेरौ कितौ सम्मुख बतराइयै'।
भयौ दरसन तुम्हें मन परसन होत, सुनि सुख सोत वानी आये प्रभु पाइयै।।