शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा
स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६२ : शिवसूत्र विमर्श
अन्तः स्वानुभवानन्दा विकल्पोन्मुक्तगोचरा ।
याऽवस्था भरिताकारा भैरवी भैरवात्मनः ॥१५॥
तद्वपुस्तत्त्वतो ज्ञेयं विमलं विश्वपूरणम् ।
—(विज्ञान भैरव)
अर्थ—विकल्प-वासना से रहित पूर्णाहन्ता का स्वप्रकाशरूप आनन्द जो भैरवरूप शिव
की भैरव-सम्बन्धी परिपूर्ण स्वरूपा अवस्था है उस निर्मल विश्वपूरण स्वरूप को सावधान
होकर हृदयंगम करना चाहिये । उस अवस्था में सम्पूर्ण जगत् स्वभित्ति पर ही निरावरण
आभासित होता है ।
इस प्रकार तीनों अवस्थाओं को चौथी तुर्यरूप मध्य-दशा से अनुप्राणन कर योगी
निरन्तर अभ्यास से पूर्णाहन्ता की सावधानी दृढ़ करता है । यह दशा योगी को भगवान्
शिव के शक्तिपात से ही होती है । तत्त्वान्तर्गत विज्ञानाकल प्रमाता से पार होकर ही
यह अवस्था होती है जब विश्व से अभेद ब्रह्मभाव के अनुभव में योगी का मन लीन
होता है । उत्पलदेव, जिसने जीवभाव के पहले दो मल-स्थूलतर मायीय मल और
स्थूल कार्ममल—हटाये थे, उस आन्तरिक अभिन्न से आणवमल के अशेषरूप से
हटाने के लिए अर्थात् विज्ञानाकल प्रमाता (जहाँ अनुसंधान करने से अनुसन्धान और
न करने से बहिर्मुखता होती है) से बाहर निकलने के लिए भगवान् शिव से प्रार्थना
करते हैं :
अन्तरप्यतितरामणीयसी या त्वदप्रथनकालिकास्ति मे ।
तामपीश परिमृज्य सर्वतः स्वं स्वरूपममलं प्रकाशय ॥
—(शिवस्तोत्रावली १३-२)
अर्थ—आप हे प्रभु ! चित्स्वरूप को छिपा रखने वाली मलिनता-चाहे वह जरा भी
क्यों न हो-जो मेरे चित्त में आपके स्वरूप-साक्षात्कार के समय होती है उसको भी पूर्णरूप
से दूर करके अपने चिदानन्दमय निर्मल स्वरूप को (जहाँ व्युत्थान और समाधि का कोई
भेद न रहे) प्रकट कीजिए ।
ईश्वर स्वरूप स्वामी श्री लक्ष्मण जू इसी प्रकार सदा सावधान रहने के लिए अपने
शिष्यगण को यह उपदेश दिया करते हैं :
(१) भोजन करते समय प्रत्येक लुकमे का स्वाद लेते हुए अनुसन्धान करना
चाहिये कि कौन खाने का स्वाद लेता है । इसी प्रकार दूध, जल आदि पीते हुए भी
पीनेवाले को ध्यान में लाना चाहिए ।
(२) चलते-चलते एक कदम उठाने के पश्चात् दूसरा कदम डालने के पूर्व मध्य-
दशा में अनुसन्धान करना चाहिए ।