शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा
स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 73, कुल 108 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीय विकास : ४९
इसी भाव से योगी की शरीर में स्थिति साधारण नियम के अनुसार होती है ॥२६॥
सम्बन्ध—अब ऐसे संसिद्ध योगी के आलाप आदि के विषय में कहते हैं।
कथा जपः ॥२७॥
कथा--(अहं विमर्श में आरूढ़ इस योगी के) जो कुछ भी लौकिक-व्यवहार
के अनुसार आलाप आदि (हों)
जपः - (वह स्वात्मदेवता की भावना के तात्पर्य से) उस का जप ही है।
व्याख्या—पराहंभावना में आरूढ़ योगी की भावना का उल्लेख श्रीस्वच्छन्दतन्त्र
में इस प्रकार है :
अहमेव परो हंसः शिवः परमकारणम्।
अर्थ—(मैं ही वह पर-हंस रूप शिव हूँ जो सर्वत्र व्याप्त हैं।)
हान और समाधान धर्मी होने से शिव को हंसः कहा है। अनुत्तर ज्ञानशाली होने
से योगी का लौकिक व्यवहार के अनुसार जो कुछ भी आलाप (बातचीत) हो वह
उसका जप ही है क्योंकि वह महामन्त्ररूप स्वाभाविक विमर्श पर आरूढ़ होता है जो
परप्रमातृ दशा है। जैसे विज्ञानभैरव में कहा है :
भूयोभूयः परे भावे भावना भाव्यते हि या।
जपः सोऽत्र स्वयं नादो मन्त्रात्मा, जप्य ईदृशः ॥१४५॥
अर्थ—जिस भावना का परमेश्वर में लगातार अनुसन्धान किया जाता है। वहाँ
पूर्णाहंता का परामर्श यहाँ जप कहा गया है। स्वयं नाद (विमर्श) ही यहाँ जप है।
इस विषय में योगबीज में महादेव ने पार्वती से कहा है :
सकारेण बहिर्याति हकारेण विशेत्पुनः ।
हंस-हंसेति मन्त्रोऽयं जीवो जपति नित्यशः ॥
अर्थ—हे पार्वती सकार से प्राण का प्रवाह बाहर जाता है और हकार से पुनः
अन्दर प्रवेश करता है। इस प्रकार हंस-हंस मन्त्र का जप जीव सदा ही करता रहता है।
परन्तु योगी इस मन्त्र को सुषुम्ना द्वार में उल्टा कर सोऽहं सोऽहं मन्त्र निरन्तर
जपता है। इसी को वास्तव में मन्त्रयोग कहते हैं। इस जप की संख्या महादेव ने
विज्ञानभैरव में इस प्रकार कही हैं :
षट्शतानि दिवारात्रौ सहस्राण्येकंविंशतिः।
जपो देव्या विनिर्दिष्टः सुलभो, दुर्लभो जडैः ॥
अर्थ—पराशक्ति को बताने वाला यह जप दिन-रात में २१६०० बार योगी को
सुलभ होता है परन्तु अज्ञानी के लिए ऐसा होना दुर्लभ है।
इसलिए स्वात्म देवता के विमर्शन में लगे योगी की साधारण बातचीत भी उसका
जप ही होता है ॥२७॥
४