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सर्वकोश
शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा

स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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४२ : शिवसूत्र विमर्श
इसे मत्स्योदरी दशा कहते हैं। इस दशा में योगी के सारे शरीर में स्पन्दतत्त्व
का उदय होता है अर्थात् किञ्चित् स्फुरण होता है, प्राण का चलन नहीं होता।
आगे कहा है—
'प्रविशेत्तत्स्वचेतसा' अर्थात् उस दशा में योगी तादात्म्यभाव से ही शुद्धात्मा में
स्थिति पाकर बोधमात्र शिव से संयोग पाता है। यही बात इस सूत्र में भी कही गई है
कि योगी को तुर्यदशा का प्रादुर्भाव तभी होता है जब प्रमेयादि सब उपायों को त्याग
कर प्रमातृचित्त से स्वरूप में मग्न होता है। रेचक, पूरक आदि स्वभाव वाले प्राणा-
याम, धारणा, ध्यान आदि स्थूल उपाय हैं। इस दशा में योगी ने इन स्थूल उपायों
का उल्लंघन किया होता है। शुद्ध अन्तःकरण से वह सूक्ष्मतर मध्य-पथ के द्वारा पर
प्रमाता के अन्तर्विमर्श चमत्कार का आस्वादन करता है। इस अविकल्प दशा में शरीर,
प्राण आदि प्रमातृता (अहंरूपता या अभिमानरूपता) गल जाती है।
विज्ञानभैरव तन्त्र में महादेव भगवती पार्वती को इस तुर्यदशा की प्राप्ति के विषय
में इस प्रकार कहते हैं :
मानसं चेतना शक्तिरात्मा चेति चतुष्टयम् ।
यदा प्रिये परिक्षीणं तदा तद्भैरवं वपुः ॥
अर्थ—हे प्रिय पार्वती ! जिस अवस्था में (योगी के) मन, बुद्धि, प्राणापान शक्ति
और जीवात्मभाव (परिमित प्रमाता) नष्ट होते हैं अर्थात् चित्त की चमत्कार दशा को
प्राप्त होते हैं उसी दशा में (उस योगी का) भैरवस्वरूप अर्थात् शिव-सायुज्य होता है।
श्रुति में भी :
यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह ।
बुद्धिश्च न विचेष्टते तमाहुः परमां गतिम् ॥
अर्थ—जब (योगी की) ज्ञानेन्द्रियाँ तथा मन आत्मा में विश्रान्ति पाते हैं और बुद्धि
किसी प्रकार से विचलित नहीं होती है, उस (तुर्य) अवस्था को परमगति कहते हैं।
इस तुर्य अवस्था का वर्णन ज्ञानगर्भ स्तोत्र में बड़ी सुन्दरता से किया गया है :
विहाय सकलाः क्रिया जननि ! मानसीः सर्वतो
विमुक्तकरणक्रियानुसृतिपारतन्त्र्योज्वलम् ।
स्थितैस्त्वदनुभावतः सपदि वेद्यते सा परा
दशा नृभिरतन्द्रितासमसुखामृतस्यन्दिनी ॥
अर्थ—हे माता (संविद्देवी) ! विकल्प, स्मृति आदि सब प्रकार की क्रिया को सब
ओर से त्याग कर और परतन्त्र साधनों (ऊर्ध्वरेचक आदि मुद्राबन्धनों) द्वारा विकास से
मुक्त हो, योगी-जन शाम्भवोपाय के समावेश से सदा सावधान (अतन्द्रित) अनुपम
सुखरूप अमृत-प्रवाह वाली वह अनुत्तर (परा) दशा आप के ही अनुग्रह-वाञ्छा से,
तत्क्षण अनुभव करते हैं ॥२१॥