शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा
स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 64, कुल 108 में से
संदर्भ में पढ़ें४० : शिवसूत्र विमर्श
कवर्गादिषु माहेश्वर्याद्याः पशुमातरः ॥१९॥
माहेश्वर्याद्या : —पीठेश्वरियाँ अर्थात् घोरतरी शक्तियाँ
कवर्गादिषु—अ से क्ष पर्यन्त मातृका-चक्र में अर्थात् बहिर्मुखता को प्राप्त
हुई संवित् में
पशुमातरः—पशुप्रमाता रूप अधिष्ठातृशक्तियाँ बनकर योगी को द्वैत
परम्परा में नीचे और नीचे गिराती रहती हैं।
व्याख्या—यदि कभी इस योगी को चिद्रूपता के निरन्तर अभ्यास में प्रमादवश कमी
आने लगे तो परावाक् प्रसर में आती हुई इच्छा-ज्ञान-क्रिया का आश्रय लेती है। इस
प्रकार शिव-शक्ति-माहेश्वरी आदि वाचक रूपता मे प्रकट होते हुए अ से क्ष रूप मातृका
का आश्रय लेकर बहिर्मुखता को प्राप्त होती हैं। इन्हीं को घोरतरी शक्तियाँ कहते हैं।
यह योगी को द्वैत-प्रथा की ओर खींचती हैं और स्मय, हर्ष, भय, राग, द्वेषादि प्रपञ्च
को फैलाती हैं। असंकुचित चिद्घन स्वरूप पर संकुचित परतन्त्र देहादि भाव को प्राप्त
कराती हैं। पर-प्रमाता भिन्न-भिन्न प्रमाताओं में बंट जाता है जिससे अविकल्प अर्थात्
सुषुप्ति और सविकल्प अर्थात् स्वप्न-जाग्रत् में संवित् संकुचित रूप धारण करती है।
इस विषय में पहले भी कहा गया है :
ज्ञानाधिष्ठानंमातृका (१-४)
जिस में तीन मलों द्वारा बन्धकभाव सामान्य रूप में कहा गया है। द्वैतज्ञान का
आधार (मलत्रय के कारण) बहिर्मुखता को प्राप्त हुई संवित् है जिसे अज्ञाता माता कहते
हैं। परन्तु यहाँ प्राप्त-तत्त्व योगी को भी प्रमादवश पीठेश्वरियों १ (घोरतरी शक्तियों)
द्वारा पशुप्रमाताओं के अधिष्ठान से शब्दानुवेद्य मोह में डाला जाता है ॥१९॥
सम्बन्ध—अतः ऊपर कही हुई युक्तियों से शुद्ध-तत्त्व को प्राप्त करके योगी को
जाग्रदादि सब (चारों) दशाओं में सावधान रहना चाहिये जिससे उसे चित्स्वरूपता सदा
बनी रहे। इस के लिए—
त्रिषु चतुर्थं तैलवदासेच्यम् ॥२०॥
त्रिषु—जाग्रदादि अवस्थाओं में
चतुर्थं—शुद्धविद्याप्रकाश रूप तुर्य अवस्था
तैलवत्—तेल की तरह अधिक और अधिक
आसेच्यम्—फैलानी चाहिए।
१ पीठ शरीर को कहते हैं। उसकी अधिष्ठातृ देवियाँ (आधार शक्तियाँ) बहिर्मुख
बहिष्करण तथा बहिर्मुख अन्तष्करण हैं। इन्हें पीठेश्वरियाँ कहा है।