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सर्वकोश
शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा

स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 108 में से

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द्वितीय विकास : २१
शिवरूप प्रसरोन्मुख द्वितीय कला है जिसे अकुल अर्थात् विमर्शोन्मुख अहं कहते हैं। यहाँ
शाक्तोपाय में दूसरे प्रकार के विमर्श से तात्पर्य है, मातृकाचक्र की यत्किञ्चित् व्याख्या
इसी विकास के तीसरे सूत्र में की गई है ॥७॥
सम्बन्ध — इस प्रकार अहं परामर्श के तात्त्विक क्रम का सम्यक् बोध प्राप्त करने के
लिए योगी चिदग्नि में स्थूल-सूक्ष्मादिरूप शरीर की आहुति देता है। इस पर कहते हैं।
शरीरं हविः ॥८॥
शरीरं — (योगी) स्थूल, सूक्ष्म, कारण तथा पररूप शरीर के अहम्भाव की
हविः — (चिद्-अग्नि में) आहुति देता है।
व्याख्या — देह स्थूल, सूक्ष्म, कारण तथा पर चार प्रकार का है। इस तरह जीव
शरीर में चार प्रमाताओं से अभिषिक्त है। वे हैं देह, पुर्यष्टक, प्राण और शून्य । अतः
जीव की मितप्रमातृता जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और शून्य अवस्थाओं में रहती है। महा-
योगी पूर्णाहन्ता को प्राप्त करने के लिए इन चारों प्रमाताओं को पर प्रमातृरूप चिदग्नि
में जब आहुति देता है तब वह कृतकृत्य हो जाता है।
अतः देह-प्रमातृता का शमन ही यहाँ तात्पर्य है । गीता जी में कहा है :—
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च।
शब्दादीन् विषयांस्र्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥
—(गीताः अध्याय १८; श्लोक ५१-५३)
अर्थ—संशय, विपर्यय आदि से विमुक्त बुद्धि से युक्त ब्रह्मवित् यति सात्त्विक धृति
से बाह्यविषयों में प्रवृत्त चित्त का निरोध कर, शब्दादि विषयों का त्याग कर (अर्थात्
अनुसन्धान न कर) तथा राग और द्वेष का परित्याग कर, जो निर्जन अरण्य आदि
देशों में रहता है, परिमित अशन करता है, वाणी, शरीर और मन को वश में रखता
है, सदा ध्यान और योग में तत्पर रहता है एवं सदा वैराग्य से पूर्ण रहता है, अहंकार,
बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रह का त्याग कर देह आदि में ममतारहित और शान्त
रहता है, वह यति ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है।
स्पन्दशास्त्र में भी कहा हैः—
'यदा क्षोभः प्रलीयेत, तदा स्यात् परमं पदम् ।'
—(९)