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सर्वकोश
शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा

स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

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द्वितीय विकास : १७
इसे पंचार-चक्र कहते हैं।
अ इ उ दीर्घ स्वरों के साथ मिल कर (अर्थात् क्षोभ को पाकर) जन्मस्थान अथवा
बीजस्थान कहलाते हैं। ऋ तथा ऌ अपने दीर्घ स्वरों के साथ भी न बीज हैं न योनि,
क्योंकि यह शिवतत्त्व में ही अनादिरूप से आनन्दभोग में मग्न हैं।
इस प्रकार इस पंचार-चक्र से पराशक्ति देवी का विस्तार बारह स्वरों में हुआ।
फिर व्यञ्जनों की सृष्टि करके वर्णमाला के पचास अक्षरों में विस्तार पाया। परारूप
पराशक्ति में यह शब्द-राशि-भैरव सनातन रूप से ब्रह्मरन्ध्र में ठहरा है। यही प्राणी
के हृदय में एक अणु से पश्यन्ती के द्वारा, कण्ठ में दो अणुओं से मध्यमा द्वारा और फिर
जिह्वामूल में तीन अणुओं से वैखरी के द्वारा प्रकट होता है। इस प्रकार शब्द से ही
चर तथा अचर व्याप्त है।
अतः परभैरवीय परावाक् शक्तिरूप जो मातृका है वह ज्येष्ठा, रौद्री तथा अम्बा
शक्तियों द्वारा विचित्ररूप धारण कर सब वर्णों में उदित हुई है। इन वर्णों के संघट्ट
(मेल) का स्वरूप मन्त्रों में प्रकट होता है। वही मन्त्रों की भगवती यहाँ विद्याशरीर-
सत्ता का रहस्य कही गई है। इसका साक्षात्कार करके योगी कृतकृत्य बन जाता है
क्योंकि उसे शब्दराशि भैरव के स्वरूप में विश्व के साथ अभेद रखने वाली पूर्णाहन्ता के
विमर्श का विकास होता है।
विषय गहन होने के कारण यदि उपर्युक्त विवरण समझने में कुछ कठिन लगे तो
सद्गुरु महाराज की शरण का ही आश्रय लेना उचित है ॥३॥
सम्बन्ध—जिन साधकों को ऊपर कहे हुए के अनुसार पूर्णाहन्ता के विमर्श का
विकास परमेश्वर की इच्छा से हृदयङ्गम न हो उन्हें बिन्दुनाद की शक्तियों से उत्पन्न
हुई मितसिद्धियों में ही मन ऐसे रमता है जैसे मार्ग में जाता हुआ पथिक अपने ध्येय
को भूलकर तृण तथा पर्णों को ही इकट्ठा करने में लगता है (रथ्यां गमने तृणपर्णानि
इति नीत्या)। इस विषय का अगले सूत्र में वर्णन किया है।
गर्भे चित्तविकासोऽविशिष्टविद्यास्वप्नः ॥४॥
गर्भे—योगमाया भूमि (अख्याति-रूप महामाया अर्थात् मित मन्त्र-
सिद्धियों) के प्रपञ्च में (ही)
चित्तविकासः—(जिस के) मन का विकास (अर्थात् जिस का मन प्रसन्न)
हो (उसको)
अविशिष्टविद्या—(वह) सर्वजन साधारण विद्या अर्थात् किञ्चित् ज्ञान
वाली अशुद्धविद्या
स्वप्नः—स्वप्न के बराबर ही भ्रमात्मक है अर्थात् उसकी समाधि स्वप्न
तुल्य ही है।
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