शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा
स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 38, कुल 108 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय विकास
इस द्वितीय विकास में शाक्तोपाय के द्वारा शिवस्वरूप के अनुभव का वर्णन है ।
शाक्तोपाय इस प्रकार है :—
उच्चाररहितं वस्तु चेतसैव विचिन्तयन् ।
यं समावेशमाप्नोति शाक्तः सोऽत्राभिधीयते ॥
—मालिनीविजयोत्तर तन्त्र : अधि : २ श्लोक २२
अर्थ—मन्त्र का उच्चारण करने के बिना ही अपने मन में उसके अर्थ [ध्येय] का
चिन्तन [ध्यान] करने से जो समावेश होता है उसे शाक्तोपाय कहते हैं ।
चित्तं मन्त्रः ॥१॥
चित्तम्—(शाक्तपरामर्श से रंगा हुआ आराधन करने वाले का) मन
मन्त्रः—अहं परामर्श में मग्न (होता है) ।
व्याख्या—जिससे परमतत्त्व चेता या विमर्श किया जाता है उसे चित्त कहते हैं ।
शाक्त या शाम्भव-प्रणव (ह्रीं) अथवा प्रासाद-प्रणव (सौ) के द्वारा प्रमातृदशा में अभेद-
रूप से विमर्श करना ही मन्त्र है । भेदमय संसार का प्रशमनरूप, त्राण ही मन्त्र है ।
यहाँ योगी का मन ही मन्त्र बन जाता है। मन्त्रदेवता के विमर्श से सामरस्य
को प्राप्त हुआ आराधक का चित्त ही मन्त्र है । केवल 'ह्रीं' आदि मन्त्रों का उच्चारण
करना ही मन्त्र नहीं कहलाता । कहा भी है :—
'शिवो भूत्वा शिवं यजेत्'
अर्थ—शिव बनकर अर्थात् प्रमातृभाव में स्थित होकर ही शिव की आराधना
करनी चाहिए ॥१॥
संबन्ध—इस आराधना के लिये प्रयत्न अर्थात् अभ्यास करने की अत्यन्त आवश्य-
कता है।
प्रयत्नः साधकः ॥२॥
प्रयत्नः—स्वाभाविक अथवा सहज प्रयत्न (ही)
साधकः—मन्त्र जपने वाले साधक का मन्त्रदेवता के साथ तादात्म्य (करा
देता) है।
व्याख्या—प्रथम विकास में शाम्भवोपाय से परिपूर्ण अहं-परामर्श करने के लिए
उद्योग करने की आवश्यकता बताई है :—'उद्यमो भैरवः' ।।१-५।। यहाँ शाक्तोपाय से
भी योगी के चित्त को अहं परामर्श में मग्न करने की आवश्यकता बताई गई है। इसके