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सर्वकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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पृष्ठ 51

द्वितीयपटलः । ( ४७ )
धिवत्सुधीः ॥ तस्मिन्नन्नं हुनेद्योगी प्रत्य-
हं गुरुशिक्षया ॥ ३६ ॥
टीका-इस वैश्वानर अग्निको गुरुके शिक्षापूर्वक
प्रज्वलित करके नित्य उसमें अन्नका होम करै अर्थात्
भोजन करै ॥ ३६ ॥
मूलम्-ब्रह्माण्डसंज्ञके देहे स्थानानि स्युर्ब-
हूनि च ॥ मयोक्तानि प्रधानानि ज्ञात-
व्यानीह शास्त्रके ॥३७॥ नानाप्रकारना-
मानि स्थानानि विविधानि च ॥ वर्तन्ते
विग्रहे तानि कथितुं नैव शक्यते ॥ ३८॥
टीका-यह शरीर ब्रह्माण्डसंज्ञक है इसमें बहुत
स्थान हैं हमने प्रधान प्रधान स्थान कहे हैं ये शास्त्रसे
जाने जाते हैं बहुत प्रकारके स्थान और नाम उन
स्थानोंके हैं जो इस शरीरमें वर्तमानहैं उनके वर्णन
करनेको हम शक्य नहींहै अर्थात् बहुत विस्तारहै उसके
कहनेमें व्यर्थ परिश्रम है ॥ ३७ ॥ ३८ ॥
मूलम्-इत्थं प्रकल्पिते देहे जीवो वसति
सर्व्वगः ॥ अनादिवासनामालाऽलंकृतः
कर्मशृङ्गलः ॥ ३९ ॥
टीका-इसी तरह शरीर कल्पित है और जीव पूर्व-