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सर्वकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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प्रथमपटलः । ( २३ )
अर्थात् एक है इसका वर्णन नहीं होसक्ता तात्पर्य यह
है कि यावत् वस्तु उत्पन्न होती है उसको काल खाजा-
ताहै परन्तु आत्मामें कालकाभी नाश होजाताहै ॥६४॥
मूलम्--न खं वायुर्न चाग्निश्च न जलं पृथिवी
न च ॥ नैतत्कार्यं नेश्वरादि पूर्णैकात्मा
भवेत्खलु ॥ ६५ ॥
टीका-वह आकाश नहीं है इस हेतुसे कि उसमें
शब्द नहीं है वायु नहीं है क्यों कि उसमें स्पर्श नहीं
है अग्नि नहीं है काहेसे कि उसमें तेजभाव नहीं है जल
नहीं है क्यों कि उसमें रस नहीं है वह पृथिवी नहीं है
क्यों कि गन्धरहित है वह कार्य नहीं है क्यों कि उसका
कारण नहीं है वह ब्रह्मा इंद्र आदि ईश्वर नहीं है इस
हेतुसे कि उसका नाश नहीं होता अर्थात् वह आत्मा
न आकाश न वायु न अग्नि न जल न पृथ्वी कुछ नहीं
है निश्चय केवल एक परिपूर्णब्रह्म है ॥ ६५ ॥
मूलम्--आत्मानमात्मनो योगी पश्यत्या-
त्मनि निश्चितम्॥ सर्वसंकल्पसंन्यासी
त्यक्तमिथ्याभवग्रहः ॥ ६६ ॥
टीका-यह मिथ्यासंसाररूपी गृहको त्यागके सर्व