शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २० ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
टीका-जिसतरह आकाश सब वस्तुमें मिला है
और सबसे अलग है उसीतरह परमात्मा सब वस्तु
चराचरमें व्याप्त है और सबसे अलग है ॥ ५५ ॥
मूलम्-ईश्वरादिजगत्सर्वमात्मव्याप्यं सम-
न्ततः ॥ एकोऽस्ति सच्चिदानंदः पूर्णो
द्वैतविवर्जितः ॥ ५६ ॥
टीका-ब्रह्मा आदि सब जगत्में वही एक आत्मा परि-
पूर्ण व्याप्त है वह एक सच्चिदानन्दपरिपूर्ण द्वैतरहित है
अर्थात् दूसरा कुछ नहीं है ॥ ५६ ॥
मूलम्-यस्मात्प्रकाशको नास्ति स्वप्रकाशो
भवेत्ततः ॥ स्वप्रकाशो यतस्तस्मादात्मा
ज्योतिःस्वरूपकः ॥ ५७ ॥
टीका-जिसका कोई प्रकाशक नहीं है वह आपही
प्रकाशमान है जो आपही प्रकाशमान है वह आत्मा
ज्योतिःस्वरूप है ॥ ५७ ॥
मूलम्-अवच्छिन्नो यतो नास्ति देशकाल-
स्वरूपतः ॥ आत्मनः सर्वथा तस्मा-
दात्मा पूर्णो भवेत्खलु ॥ ५८ ॥
टीका-देश करके वा कालके प्रमाणसे वह परि-
च्छिन्न नहीं है अर्थात् उसका इयत्तापरिमाण नहीं है न