शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
पृष्ठ 183, कुल 216 में से
संदर्भ में पढ़ेंपंचमपटलः। ( १७९ )
टीका-हे पार्वती ! इस ब्रह्मरन्ध्रमें जिसका मन लीन
होंय सो पुरुषोत्तम योगी अणिमादिगुणोंको भोगके
इच्छापूर्वक हमारेमें लय होजायगा ॥ १८३ ॥
मूलम्-एतद्रन्ध्रध्यानमात्रेण मर्त्यः संसारे
स्मिन्वल्लभो मे भवेत्सः ॥ पापान् जि-
त्वा मुक्तिमार्गाधिकारी ज्ञानं दत्त्वा तार-
यत्यद्भुतं वै ॥ १८४ ॥
टीका-हे देवी ! इस ब्रह्मरन्ध्रके ध्यानमात्रसे यह सं-
सारमें प्राणी हमको प्रिय होजाता है और पापराशिको
जीतके यह साधक मुक्तिमार्गका अधिकारी होजाता
है और अनेक मनुष्योंको ज्ञान उपदेश करके संसार-
से परित्राण करदेता है ॥ १८४ ॥
मूलम्-चतुर्मुखादित्रिदशैरगम्यं योगिवल्ल-
भम् ॥ प्रयत्नेन सुगोप्यं तद्ब्रह्मरन्ध्रं म-
योदितम् ॥ १८५ ॥
टीका-हे देवी ! यह ब्रह्मरन्ध्रका ध्यान जो हमने
कहा है इसको यत्न करके गोपित रखना उचित है
यह ज्ञान योगीलोगोंको अतिप्रिय है इसका मार्ग ब्रह्मा
आदि देवताओंकोभी अगम्य.हैं ॥ १८५ ॥
मूलम्-पुरा मयोक्ता या योनिः सहस्रारे स-