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सर्वकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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पृष्ठ 182

( १७८) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
ले यदा ॥ विचिन्त्य यस्त्यजेत्प्राणान्स
तदा मोक्षमवाप्नुयात् ॥ १८० ॥
टीका-मृत्युके समयमें साधक जो यह चिंतन करे
कि हमारा शरीर त्रिवेणीके सलिलमें मग्न है तो उसी
क्षण प्राणको त्यागके मोक्षगतिको प्राप्त होगा ॥१८०॥
मूलम्-नातः परतरं गुह्यं त्रिषु लोकेषु विद्य-
ते ॥ गोप्तव्यं तत्प्रयत्नेन न व्याख्येयं
कदाचन ॥ १८१ ॥
टीका-इस तीर्थसे परे त्रिभुवनमें दूसरा गुप्त तीर्थ
नहीं है इसको यत्नसे गोपित रखना उचित है यह कदा-
पि प्रकाश करनेके योग्य नहीं है ॥ १८१ ॥
मूलम्-ब्रह्मरन्ध्रे मनो दत्त्वा क्षणार्धं यदि
तिष्ठति ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तः स याति
परमां गतिम् ॥ १८२ ॥
टीका-ब्रह्मरन्ध्रमें मन देकरके यदि क्षणार्धभी स्थिर
रक्खे तो सर्वपापसे मुक्त होके साधक परमगतिको
अर्थात् मोक्षको प्राप्त होजाय ॥ १८२ ॥
मूलम्-अस्मिन् लीनं मनो यस्य स योगी
मयि लीयते॥ अणिमादिगुणान्भुक्त्वा स्वे-
च्छया पुरुषोत्तमः ॥ १८३ ॥