शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपंचमपटलः । (१६९)
तो उसका प्रतिमापूजन करना वा जप करना सर्वथा
अनर्थवत् है ॥ १४९ ॥
मूलम्-यक्षराक्षसगन्धर्वा अप्सरोगणकिन्न-
राः ॥ सेवन्ते चरणौ तस्य सर्वे तस्य व-
शानुगाः ॥ १५० ॥
टीका-यक्ष और राक्षस और गन्धर्व और अप्सरा
और किन्नर आदि सब इस ध्यानयुक्त योगीके वशमें
होजाते हैं और उसके चरणकी सेवा करते हैं ॥१५०॥
मूलम्-करोति रसनां योगी प्रविष्टां विपरी-
तगाम्॥ लम्बिकोर्ध्वेषु गर्तेषु धृत्वा ध्या-
नं भयापहम् ॥ १५१ ॥ अस्मिन् स्था-
ने मनो यस्य क्षणार्धं वर्ततेऽचलम् ॥ तस्य
सर्वाणि पापानि संक्षयं यान्ति तत्क्ष-
णात् ॥ १५२ ॥
टीका-जो योगी विपरीतगामी जिह्वाको ऊपर
तालूमूलमें प्रवेश करके यह भयनाशक आज्ञाकमल-
का ध्यान अर्धक्षणभी मन अचल स्थिरतापूर्वक
करते हैं उनका सकल पातक उसीक्षण नाश
होजाताहै ॥ १५१ ॥ १५२ ॥
मूलम्-यानि यानि हि प्रोक्तानि पंचपद्मे फ-