शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमपटलः । ( १३ )
है सो आत्माही है सो श्रुति मुक्तिकी देनेवाली है
यत्न करके सेवनके योग्य है ॥ ३२ ॥
मूलम्-दुरितेषु च पुण्येषु यो धीवृत्तिं प्रचा-
दयात् ॥ सोऽहं प्रवर्तते मत्तो जगत्सर्वं
चराचरम् ॥ ३३ ॥ सर्वं च दृश्यते
मत्तः सर्वं च मयि लीयते ॥ न तद्भिन्नोऽ-
हमस्मीह मद्भिन्नो न तु किंचन ॥ ३४ ॥
टीका-पाप पुण्य दोनोंमें समानरूपकी बुद्धिको
जो वृत्ति प्रेरणा करती है सो हम हैं और हमसेही सब
जगत् चराचर उत्पन्न है ॥ ३३ ॥ और जो देख पड़ताहै
वह सब हम हैं हममेंही सब लीन होताहै न वह
हमसे भिन्न है न हम उससे किंचित्मात्र भिन्न हैं ता-
त्पर्य यह है कि, वह आत्मा जिससे यह जगत् उत्पन्नहै
हमसे भिन्न नहीं है इस हेतुसे इस संसारके स्थिति
संहार कर्त्ता हम हैं ऐसी वृत्ति योगीकी रहती है ॥३४॥
मूलम्--जलपूर्णेष्वसंख्येषु शरावेषु यथा-
भवेत् ॥ एकस्य भात्यसंख्यत्वं तद्भेदोऽत्र
न दृश्यते ॥ ३५ ॥ उपाधिषु शरावेषु या
संख्या वर्तते परा ॥ सा संख्या भवति
यथा रवौ चात्मनि तत्तथा ॥ ३६ ॥