शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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कर्म कहाहै इसी पुण्य पापसे शरीर बंधायमान है
अर्थात् बारंबार शरीरधारण करनेका कारण है ॥ २९ ॥
मूलम्-इहामुत्र फलद्वेषी सफलं कर्म सं-
त्यजेत् ॥ नित्यनैमित्तिके संगं त्यक्त्वा
योगे प्रवर्त्तते ॥ ३० ॥
टीका-इस लोकका भोग वा परलोकके फलकी
इच्छा और नित्य नैमित्तिक आदि कर्मोंको फलसहित
त्यागके योगाभ्यास अर्थात् परब्रह्मके विचारमें
महात्मा जनोंके तत्पर रहना उचित है ॥ ३० ॥
मूलं-कर्मकाण्डस्य माहात्म्यं ज्ञात्वा यो-
गी त्यजेत्सुधीः ॥ पुण्यपापद्वयं त्यक्त्वा
ज्ञानकाण्डे प्रवर्त्तते ॥ ३१ ॥
टीका- कर्मकाण्डके माहात्म्यको जानके योगीको
उचितहै कि, पुण्य पाप दोनोंको तृणवत् विचारके
त्याग दे और ज्ञानकाण्डमें तत्पर होरहै ॥ ३१ ॥
मूलम्--आत्मा वारे च श्रोतव्यो मंतव्य
इति यच्छ्रुतिः ॥ सा सेव्या तत्प्रयत्नेन
मुक्तिदा हेतुदायिनी ॥ ३२.॥
टीका- यह श्रुतिका वाक्य है कि, आत्माको सुनो
और आत्माको मनन करो अर्थात् जो कुछ