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सर्वकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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पृष्ठ 163

पंचमपटलः । ( १५९ )
वह प्रसन्नस्थान वायुका बीज अर्थात् प्राणवायुका
आधार है ॥ ११४ ॥ ११५ ॥
मूलम्-पद्मस्थं तत्परं तेजो बाणलिंगं
प्रकीर्तितम् ॥ यस्य स्मरणमात्रेण दृष्टा-
दृष्टफलं लभेत् ॥ ११६ ॥
टीका-उस हृदयकमलमें जो परमतेज है उसीको
बाणलिङ्ग कहते हैं जिसके ध्यानमात्रसे साधक इस
लोक और परलोकका उत्तमफल आनंदपूर्वक लाभ
करते हैं ॥ ११६ ॥
मूलम्-सिद्धः पिनाकी यत्रास्ते काकिनी
यत्र देवता ॥ एतस्मिन्सततं ध्यानं हृ-
त्पाथोजे करोति यः ॥ क्षुभ्यन्ते तस्य
कान्ता वै कामार्ता दिव्ययोषितः ॥११७॥
टीका-जिस पद्ममें पिनाकी, सिद्ध और काकिनी
देवी अधिष्ठात्री हैं उस हृदयस्थपद्ममें जो साधक
सर्वदा ध्यान करताहै उसके समीप कामार्ता सुन्दर
स्त्री अप्सरा आदि मोहित होजाती हैं ॥ ११७ ॥
मूलम्-ज्ञानञ्चाप्रतिमं तस्य त्रिकालवि-
षयम्भवेत् ॥ दूरश्रुतिर्दूरदृष्टिः स्वेच्छया
खगतां व्रजेत् ॥ ११८ ॥