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सर्वकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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पृष्ठ 161

पंचमपटलः । ( १५७ )
षद्दलकमलसे जो अमृत स्रवताहै उसकी वृद्धि
होती है ॥ १०७ ॥ १०८ ॥
अथ मणिपूरचक्रविवरणम् ।
मूलम्-तृतीयं पङ्कजं नाभौ मणिपूरकसंज्ञ-
कम्॥दशारंडादिफान्तार्ण शोभितं हेमवर्ण
कम् ॥ १०९॥ रुद्राख्यो यत्र सिद्धोऽस्ति
सर्वमङ्गलदायकः ॥ तत्रस्था लाकिनी-
नाम्नी देवी परमधार्मिका ॥ ११० ॥
टीका-मणिपूरनामक तीसरा पद्म जो नाभिस्थलमें
है वह हेमवर्ण दशदलकरके शोभितहै और-ड-से
फ-तक अर्थात् ड-ढ-ण-त-थ-द-ध-न-प-फ-यह दश-
वर्णसे युक्त है और उस स्थानमें सर्वमंगलदाता रु-
द्रनामक सिद्ध और लाकिनी देवी अधिष्ठात्री और
विष्णुदेवता हैं ॥ १०९ ॥ ११० ॥
मूलम्-तस्मिन् ध्यानं सदा योगी करोति
मणिपूरके ॥ तस्य पातालसिद्धिः स्यान्नि-
रन्तरसुखावहा ॥१११॥ ईप्सितञ्च भवे-
ल्लोके दुःखरोगविनाशनम् ॥ कालस्य व-
ञ्चनञ्चापि परदेहप्रवेशनम् ॥ ११२ ॥
टीका-जो साधक इस मणिपूरचक्रको सर्वदा ध्या-