शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १० ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
है तात्पर्य यह है कि, जैसा जो मनुष्य शुभाशुभ कर्म
करता है वैसेही नरक वा स्वर्गमें जाताहै ॥ २३ ॥
मूलम्-पुण्यकर्माणि वै स्वर्गो नरकः पापक-
र्मणि ॥ कर्मबंधमयी सृष्टिर्नान्यथा भव-
ति ध्रुवम् ॥ २४ ॥
टीका-पुण्यकर्म करनेसे स्वर्गमें जाताहै और पापक-
र्मसे नरकमें जाताहै. संसार कर्मसे निश्चय करके बंधाहै
दूसरा हेतु नहीं है तात्पर्य यह है कि, जो ईश्वरको
जानके कर्माकर्मसे अपनेको रहित समझेगा वह इस
बंधसे छूटजायगा ॥ २४ ॥
मूलम्-जन्तुभिश्चानुभूयंते स्वर्गे नानासुखा-
नि च ॥ नानाविधानि दुःखानि नरके दुः-
सहानि वै ॥ २५ ॥
टीका-प्राणी स्वर्गमें नानाप्रकारके सुखका अनुभव
करता है ऐसेही बहुत प्रकारके दुःसह दुःख नरकमें
भी भोगता है ॥ २५ ॥
मूलम्-पापकर्मवशाद्दुःखंपुण्यकर्मवशात्सुखं
तस्मात्सुखार्थी विविधं पुण्यं प्रकरुते ध्रुवं २६
टीका-पापकर्म करनेसे दुःख होता है और पुण्यकर्म
करनेसे सुख होताहै इस हेतुसे निश्चय करके सुखार्थी
पुरुष नानाप्रकारके पुण्य करते हैं ॥ २६ ॥