शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमपटलः । ( ९ )
ना कर्मकरणे पुण्यं भवति निश्चितम्॥२१॥
टीका-कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड वेदके दो मत
हैं इसमेंभी दो दो भेद कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्डमें भये
हैं ॥ २० ॥ उस कर्मकाण्डमें दो प्रकार हैं एक निषेध
दूसरा विधि तहां निषेध कर्म करनेसे निश्चय पाप होता है
विहित कर्म करनेसे निश्चय करके पुण्य होताहै ॥२१॥
मूलम्-त्रिविधो विधिकूटःस्यान्नित्यनैमित्ति-
काम्यतः॥नित्येऽकृते किल्बिषं स्यात्का-
म्ये नैमित्तिके फलम् ॥ २२ ॥
टीका-विधि कर्ममें तीन प्रकारका भेद कहाहै नित्य
१ नैमित्तिक २ सकाम ३ नित्यकर्म संध्या देवार्चन
आदि न करनेसे पाप होता है सकाम अर्थात् जो कर्म
फलके इच्छासे किया जाताहै और नैमित्तिक जो तीर्थों
में पर्वादिकमें स्नानादिक करते हैं इनके न करनेसे
पाप नहीं होता परन्तु करनेसे फल होताहै ॥ २२ ॥
मूलं-द्विविधन्तु फलं ज्ञेयं स्वर्गो नरक एव
च ॥ स्वर्गो नानाविधश्चैव नरकोपि तथा
भवेत् ॥ २३ ॥
टीका-फल दो प्रकारका होताहै स्वर्ग और नरक
स्वर्ग नानाप्रकारका है ऐसेही नरकभी बहुत प्रकारका