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सर्वकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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पृष्ठ 139

पंचमपटलः । ( ३३५ )
मूलम्--निरन्तरकृताभ्यासादन्तरे पश्यति
ध्रुवम् ॥ तदा मुक्तिमवाप्नोति योगी नि-
यतमानसः ॥ ३६ ॥
टीका-सर्वदा प्रतीकोपासनाके अभ्यास करनेसे
निश्चय हृदयाकाशमें अपना प्रतिबिंब भान होगा तब
निश्चयआत्मा योगीको मुक्ति प्राप्त होगी ॥ ३६ ॥
मूलम्--अंगुष्ठाभ्यामुभे श्रोत्रे तर्जनीभ्यां
द्विलोचने ॥ नासारन्ध्रे च मध्याभ्याम-
नामाभ्यां मुखं दृढम् ॥ ३७ ॥ निरुध्य
मारुतं योगी यदैव कुरुते भृशम् ॥ तदा
तत्क्षणमात्मानं ज्योतीरूपं स पश्यति ३८
टीका-दोनों अंगुष्ठसे दोनों कर्ण बंद करे और दो-
नों तर्जनीसे दोनों नेत्रोंको बंद करे और दोनों मध्य-
मा अंगुलीसे दोनों नासारंध्रको बंद करे और दोनों
अनामिका अंगुली और कनिष्ठासे मुखको बंद करे
यदि इसप्रकार योगी वायुको निरोध करके इसका
वारंवार अभ्यास करे तो आत्मा ज्योतिस्वरूपका
हृदयाकाशमें भान होगा ॥ ३७ ॥ ३८ ॥
मूलम्--तत्तेजो दृश्यते येन क्षणमात्रं निरा-
कुलम् ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तः स याति
परमां गतिम् ॥ ३९ ॥