सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

पृष्ठ 751, कुल 850 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 751

* वायवीयसंहिता *
७३७


और मण्डल सुन्दर है, जो सुवर्णके समान कान्तिमान् आभूषणोंसे विभूषित हैं, जिनके नेत्र कमलके समान हैं, जिनके हाथमें भी कमल हैं, जो ब्रह्मा, इन्द्र और नारायणके भी कारण हैं, उन भगवान्‌को नमस्कार है।$^{१}$' यों कह उत्तम रत्नोंसे पूर्ण सुवर्ण, कुंकुम, कुश और पुष्पसे युक्त जल सोनेके पात्रमें लेकर उन देवेश्वरको अर्घ्य दे और कहे—‘भगवन्! आप प्रसन्न हों। आप सबके आदिकारण हैं। आप ही रुद्र, विष्णु, ब्रह्मा और सूर्यरूप हैं। गणोंसहित आप शान्त शिवको नमस्कार है।’$^{२}$

जो एकाग्रचित्त हो सूर्यमण्डलमें शिवका पूजन करके प्रातःकाल, मध्याह्नकाल और सायंकालमें उनके लिये उत्तम अर्घ्य देता है, प्रणाम करता है और इन श्रवणसुखद श्लोकोंको पढ़ता है, उसके लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं है। यदि वह भक्त है तो अवश्य ही मुक्त हो जाता है। इसलिये प्रतिदिन शिवरूपी सूर्यका पूजन करना चाहिये। धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके लिये मन, वाणी तथा क्रियाद्वारा उनकी आराधना करनी चाहिये।

तत्पश्चात् मण्डलमें विराजमान महेश्वर देवताओंकी ओर देखकर और उन्हें सम्पूर्ण शास्त्रोंमें श्रेष्ठ शिवशास्त्र देकर वहीं अन्तर्धान हो गये। उस शास्त्रमें शिवपूजाका अधिकार ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंको दिया गया है। यह जानकर देवेश्वर शिवको प्रणाम करके देवता जैसे आये थे, वैसे चले गये। तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् जब वह शास्त्र लुप्त हो गया, तब भगवान् शंकरके अंकमें बैठी हुई महेश्वरी शिवाने पतिदेवसे उसके विषयमें पूछा। तब देवीसे प्रेरित हो चन्द्रभूषण महादेवने वेदोंका सार निकालकर सम्पूर्ण आगमोंमें श्रेष्ठ शास्त्रका उपदेश किया, फिर उन परमेश्वरकी आज्ञासे मैंने, गुरुदेव अगस्त्यने और महर्षि दधीचिने भी लोकमें उस शास्त्रका प्रचार किया। शूलपाणि महादेव स्वयं भी युग-युगमें भूतलपर अवतार ले अपने आश्रित जनोंकी मुक्तिके लिये ज्ञानका प्रसार करते हैं। ऋभु, सत्य, भार्गव, अंगिरा, सविता, मृत्यु, इन्द्र, मुनिवर वसिष्ठ, सारस्वत, त्रिधामा, मुनिश्रेष्ठ त्रिवृत्, शततेजा, साक्षात् धर्म-स्वरूप नारायण, स्वरक्ष, बुद्धिमान् आरुणि, कृतंजय, भरद्वाज, श्रेष्ठ विद्वान् गौतम, वाचःश्रवा मुनि, पवित्र सूक्ष्मायणि, तृणविन्दु मुनि, कृष्ण, शक्ति, शाक्तेय (पाराशर), उत्तर, जातूकर्ण्य और साक्षात् नारायण-स्वरूप कृष्णद्वैपायन मुनि—ये सब व्यासावतार हैं। अब क्रमशः कल्प-योगेश्वरोंका वर्णन सुनो। लिंगपुराणमें द्वापरके अन्तमें होनेवाले उत्तम व्रतधारी व्यासावतार तथा योगाचार्यावतारोंका वर्णन है। भगवान् शिवके शिष्योंमें भी जो प्रसिद्ध


१-सिन्दूरवर्णाय सुमण्डलाय सुवर्णवर्णाभरणाय तुभ्यम्। पद्माभनेत्राय सपङ्कजाय ब्रह्मेन्द्रनारायणकारणाय॥
(शि० पु० वा० सं० उ० ख० ८।३२)
२-प्रदत्तमादाय सहेमपात्रं प्रशस्तमर्घ्यं भगवन् प्रसीद।...................................................॥
नमः शिवाय शान्ताय सगणायादिहेतवे। रुद्राय विष्णवे तुभ्यं ब्रह्मणे सूर्यमूर्तये॥
(शि० पु० वा० सं० उ० ख० ८।३३-३४)