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सर्वकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 684

६७० * संक्षिप्त शिवपुराण *

हुआ कि कर्मफलोंके त्यागसे शिवधर्ममें मंगलमयी प्रवृत्ति होती है।

इसलिये शिवका कृपाप्रसाद प्राप्त करनेके उद्देश्यसे तुम सब लोग अपने स्त्री-पुत्रों और अग्नियोंके साथ वाणी और मनके दोषोंसे रहित होकर एकमात्र भगवान् शिवका ही ध्यान करते रहो। उन्हींमें निष्ठा रखकर उनके भजनमें तत्पर हो जाओ। उन्हींमें मन लगाकर उनके आश्रित होकर रहो। सब कार्य करते हुए मनसे उन्हींका चिन्तन किया करो। एक सहस्र दिव्य वर्षोंके लिये दीर्घकालिक यज्ञका आरम्भ करके उसे पूर्ण करो। यज्ञके अन्तमें मन्त्रद्वारा आवाहन करनेपर साक्षात् वायुदेवता वहाँ पधारेंगे। फिर वे ही तुम सब लोगोंके कल्याणका साधन एवं उपाय बतायेंगे। तत्पश्चात् तुम सब लोग परम सुन्दर पुण्यमयी वाराणसी-पुरीको जाना, जहाँ पिनाकपाणि श्रीमान् भगवान् विश्वनाथ भक्तजनोंपर अनुग्रह करनेके लिये देवी पार्वतीके साथ सदा विहार करते हैं। द्विजोत्तमो! वहाँ तुम्हें बड़ा भारी आश्चर्य दिखायी देगा। उस आश्चर्यको देखकर तुम फिर मेरे पास आना, तब मैं तुम्हें मोक्षका उपाय बताऊँगा। उस उपायसे एक ही जन्ममें मुक्ति तुम्हारे हाथमें आ जायगी, जो अनेक जन्मोंके संसारबन्धनसे छुटकारा दिलानेवाली होगी। यह मैंने मनोमय चक्रका निर्माण किया है। इस चक्रको मैं यहाँसे छोड़ता हूँ। जहाँ जाकर इसकी नेमि विशीर्ण हो जाय—टूट-फूट जाय, वही तपस्याके लिये शुभ देश है।

ऐसा कहकर पितामह ब्रह्माने उस सूर्यतुल्य तेजस्वी मनोमय चक्रकी ओर देखा और महादेवजीको प्रणाम करके उसे छोड़ दिया। वे सब ब्राह्मण उन लोकनाथ ब्रह्माजीको प्रणाम करके उस स्थानके लिये चल दिये, जहाँ उस चक्रकी नेमि जीर्ण-शीर्ण होनेवाली थी। ब्रह्माजीका फेंका हुआ वह सुन्दर चक्र मनोहर शिलाखण्डोंसे युक्त और निर्मल एवं स्वादिष्ठ जलसे पूर्ण किसी वनमें गिरा। उस चक्रकी नेमिके शीर्ण होनेसे वह मुनिपूजित वन नैमिष नामसे विख्यात हुआ। अनेक यक्ष, गन्धर्व और विद्याधर वहाँ आकर रहने लगे। पूर्वकालमें जगत्‌की सृष्टिकी इच्छा रखनेवाले विश्वस्रष्टा एवं गार्हपत्य अग्निके उपासक ब्रह्मज्ञ प्रजापतियोंने वहीं दिव्य यज्ञका आरम्भ किया था। वहीं शब्दशास्त्र, अर्थशास्त्र तथा न्यायशास्त्रके ज्ञाता विद्वान् महर्षियोंने शक्ति, ज्ञान और क्रियायोगके द्वारा शास्त्रीय विधिक अनुष्ठान किया था। उसी स्थानपर वेदवेत्ता विद्वान् सदा वाद और जल्पके बलसे युक्त वचनोंद्वारा अतिवाद करनेवाले वेदबहिष्कृत नास्तिकोंको पराहत या पराजित