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सर्वकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

पृष्ठ 223, कुल 850 में से

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पृष्ठ 223
  • रुद्रसंहिता *
    २०९

मौनी और ईर्ष्यालु हैं। इस यज्ञकर्ममें बुलाये जानेयोग्य नहीं हैं। इसलिये मैंने उनको यहाँ नहीं बुलाया है। अतः दधीचिजी! आपको फिर कभी ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये। मेरी प्रार्थना है कि आप सब लोग मिलकर मेरे इस महान् यज्ञको सफल बनावें।'

दक्षकी यह बात सुनकर दधीचिने समस्त देवताओं और मुनियोंके सुनते हुए यह सारगर्भित बात कही।

दधीचि बोले—दक्ष! उन भगवान् शिवके बिना यह महान् यज्ञ अयज्ञ हो गया—अब यह यज्ञ कहलानेयोग्य ही नहीं रह गया। विशेषतः इस यज्ञमें तुम्हारा विनाश हो जायगा।

ऐसा कहकर दधीचि दक्षकी यज्ञशालासे अकेले ही निकल पड़े और तुरंत अपने आश्रमको चल दिये। तदनन्तर जो मुख्य-मुख्य शिवभक्त तथा शिवके मतका अनुसरण करनेवाले थे, वे भी दक्षको वैसा ही शाप देकर तुरंत वहाँसे निकले और अपने आश्रमोंको चले गये। मुनिवर दधीचि तथा दूसरे ऋषियोंके उस यज्ञमण्डपसे निकल जानेपर दुष्टबुद्धि शिवद्रोही दक्षने उन मुनियोंका उपहास करते हुए कहा।

दक्ष बोले—जिन्हें शिव ही प्रिय हैं, वे नाममात्रके ब्राह्मण दधीचि चले गये। उन्हींके समान जो दूसरे थे, वे भी मेरी यज्ञशालासे निकल गये। यह बड़ी शुभ बात हुई। मुझे सदा यही अभीष्ट है। देवेश! देवताओ और मुनियो! मैं सत्य कहता हूँ—जिनके चित्तकी विचारशक्ति नष्ट हो गयी है, जो मन्दबुद्धि हैं और मिथ्यावादमें लगे हुए हैं, ऐसे वेद-बहिष्कृत दुराचारी लोगोंको यज्ञकर्ममें त्याग ही देना चाहिये। विष्णु आदि आप सब देवता और ब्राह्मण वेदवादी हैं। अतः मेरे इस यज्ञको शीघ्र ही सफल बनावें।

ब्रह्माजी कहते हैं—दक्षकी यह बात सुनकर शिवकी मायासे मोहित हुए समस्त देवर्षि उस यज्ञमें देवताओंका पूजन और हवन करने लगे। मुनीश्वर नारद! इस प्रकार उस यज्ञको जो शाप मिला, उसका वर्णन किया गया। अब यज्ञके विध्वंसकी घटनाको बताया जाता है, आदरपूर्वक सुनो।

(अध्याय २७)

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दक्षयज्ञका समाचार पा सतीका शिवसे वहाँ चलनेके लिये अनुरोध, दक्षके शिवद्रोहको जानकर भगवान् शिवकी आज्ञासे देवी सतीका पिताके यज्ञमण्डपकी ओर शिवगणोंके साथ प्रस्थान

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! जब देवर्षिगण बड़े उत्साह और हर्षके साथ दक्षके यज्ञमें जा रहे थे, उसी समय दक्षकन्या देवी सती गन्धमादन पर्वतपर चंदोवेसे युक्त धारागृहमें सखियोंसे घिरी हुई भाँति-भाँतिकी उत्तम क्रीड़ाएँ कर रही थीं। प्रसन्नतापूर्वक क्रीडामें लगी हुई देवी सतीने उस समय रोहिणीके साथ दक्षयज्ञमें जाते हुए चन्द्रमाको देखा। देखकर वे अपनी हितकारिणी प्राणप्यारी श्रेष्ठ सखी विजयासे बोलीं—'मेरी सखियोंमें श्रेष्ठ प्राणप्रिये विजये! जल्दी जाकर पूछ तो आ, ये चन्द्रदेव रोहिणीके साथ कहाँ जा रहे हैं?'

सतीके इस प्रकार आज्ञा देनेपर विजया