शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)
Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास द्वारा
श्रीरामचन्द्र बोले - हे भगवन् ! जो कुछ मैने प्रश्न किया है वह तो उस प्रकार स्थित है, हे महेश्वर! आपने इस
विषयका कोई उत्तर नही दिया ॥१॥
हे महेश्वर ! आपका देह परिच्छिन्नपरिमाण अर्थात् इयत्ता करनेके योग्य है फिर सब संसारकी उत्पत्ति पालन नाश
कैसे करते हो ॥२॥
इसी प्रकार अपने २ अधिकार के पालन करनेवाले इन्द्र वरुणादि सब देवता तुम्हारी देह में कैसे रहते है और वे सब
देवता और चौदह भुवन यह मैं ही हूँ, ऐसा जो तुम कहते तो कैसे कहते हो अर्थात् जबतक उपाधि है तबतक जीव
ईश्वरका अभेद संभौवित नही होता और जड प्रपंच महाभूतोंमें चेतनाका तादाम्य संभावति नही ॥३॥
हे देव! आपसे उत्तर सुना परन्तु संदेह नही जाता कारण कि चित्तका निश्चय नही उस सन्देहकी दूर करनेको आपही
समर्थ हो ॥४॥
श्रीभगवानुवाच ।
श्रीभगवान् बोले ! सूक्ष्म वटके बीजमें जिस प्रकार महान वटका वृक्ष सदा रहता है और उसीसे वह वृक्ष निकल भी
आता है यदि ऐसा न हो तो बताओ वह वृक्ष कहां से आता है इसी प्रकार मेरे सूक्ष्म शरीरसे सब भूतोंका जन्म पालन
और नाश होता है ॥५॥
जिस प्रकारसे जलके बीचमें बड़ा सैन्धैका खण्ड डालनेसे वह उसमें विलीन होजाता है और नही दीखता पीछे जलको
अग्निमें औटाने से वह पूर्ववत् प्राप्त हो जाता है ॥६॥
अथवा जैसे प्रतिदिन सूर्यसे प्रकाश उत्पन्न होता और संध्या समय विलीन हो जाता है इसी प्रकार मुझसे जगत् उत्पन्न
होकर विलीन हो जाता है और मुझमें हि स्थिर रहता है । हे सुव्रत राम! तुम ऐसा जानो ॥७॥
श्रीराम उवाच ।
श्रीरामचंद्र बोले- हे भगवन् ! आपने दृष्टान्तसे प्रतिपादन किया परन्तु जिस प्रकार दिशाओंके भ्रमवाले को उत्तरादि
दिशाओंका भ्रम हो जाता है, इसी प्रकार मुझे भ्रम हो गया है । वह निवृत्त नही होता मै क्या करूं ॥८॥
श्रीभगवानुवाच ।
श्रीभगवान बोले - हे राम ! जिस प्रकार यह चराचर जगत् मुझमें वर्तमान है, सो मैं तुमको दिखाता हूँ परन्तु तुम
उसे देखनेको समर्थ नही ॥९॥
इस कारण उसके देखनेको मै तुम्हे दिव्यनेत्र देता हूँ, उन नेत्रोंसे भय त्यागकर तुम मेरा दिव्य स्वरूप देखो ॥१०॥
नरेन्द्र वा देवता इस मेरे तेज स्वरूपको मेरे अनुग्रह बिना चर्म चक्षुसे नही देखे सकते ॥११॥
सूत उवाच ।
सूतजी बोले ऐसा कहकर शिवजीने रामचन्द्रको दिव्यनेत्र दिये और पातालकी समान बडा विस्तृत मुख रामचन्द्रको
दिखाया ॥१२॥
करोड़ो बिजलीकी समान प्रकाशमान अतिशय भयदायक भयंकर उस रूपको देखतेही रामचन्द्र जंघाओं के बलसे पृथ्वी में
बैठ गये ॥१३॥
प्रणाम और दंडवत् करके शिवजीको बारंबार प्रसन्न करने लगे फिर महाबली रामचन्द्र उठकर जबतक देखते है ॥१४॥
जबतक त्रिपुरघाती शिवजीके मुखमें करोड़ो ब्रह्मान्ड प्रलय कालकी अग्निमें व्याप्त होकर चटका पक्षीके पंखो कि समान
दीखे ॥१५॥
सुमेरु, मंदराचल, विंध्याचलादि पर्वत, सात समुद्र, चंद्र सूर्यादि सब ग्रह, पांच महाभूत और शिवजीके साथ आये हुए
सब देवता ॥१६॥
वन, बड़े २ सर्प, चौदह भुवन इस प्रकार रामचन्द्रने प्रत्येक ब्रह्माण्डको देखकर ॥१७॥
उन्हींमें पूर्वकालमे हुआ देवता और असुरोंका संग्रामभी देखा विष्णुके दश अवतार और उनके र्कतव्य कंसवध रावणवध
आदि ॥१८॥
युद्धमें देवताओंकी पराजय, शिवजीका त्रिपुरासूरको मारना इसी प्रकार उत्पन्न हुए सम्पूर्ण जीवों का लय देखकर ॥१९॥
रामचंद्र भयभीत हो बारंबार प्रणाम करने लगे । यद्यपि रामचन्द्र को तत्त्वज्ञान भी हो गया था तथापि भयभीत हो गये
॥२०॥
तब उपनिषदोंका सार और अर्थरूप वाणीसे शिवजीकी स्तुति करने लगे ॥२१॥
श्रीराम उवाच ।
श्रीरामचन्द्र बोले । हे विश्वेश्वर ! हे शरणागतदुःखनाशक, हे चन्द्रशेखर ! प्रसन्न हूजिये और संसारके भयसे मुझ
अनाथकी रक्षा कीजिये ॥२२॥
हे शंकर ! यह भूमि और इस पर उत्पन्न होनेवाले वृक्षादि सब आपसे ही उत्पन्न हुए है यह सब नित्य तुमही में स्थित
रहते है । हे शिवे ! अन्तमें यह सब तुम्हीमें स्थित हो जाते है ॥२३॥
ब्रह्मा, इन्द्र, एकादश, रुद्र, मरुद्गण, गन्धर्व, यक्ष, असुर, सिद्ध, गंगादि नदी, सागर यह सब हे शूल
धारणकरनेवाले ! तुम्हारे मुखमें दीखते हैं ॥२४॥
हे चन्द्रमौले ! तुम्हारी मायासे कल्पित हुआ यह विश्व तुम्हारे ही स्वरूपमें प्रतीत होता है, इसे भ्रांतियुक्त होकर पुरुष
इस प्रकारसे देखते है जिसप्रकारसे शुक्तिमें रजतका और रस्सीमें सर्पका भ्रम उत्पन्न होता है, वह भाँति वैसी नहीं है
यह जैसी भ्रांति होती है वह पदार्थ अन्यत्र सिद्ध होता है और नही भी होता, जैसे शुक्तिमें रजतकी भाँति हुई । परन्तु
रूपा पदार्थ दूसरे स्थानमें विद्यमान है, तैसे यह जगत् तुम्हारे स्वरूपसे बचकर अन्यत्र नही दीखता इसीसे लोक इसको
शुक्तिका रजतेवत् भ्रम मानते है ॥२५॥
आप अपने तेजसे सब जगत् व्याप्त और प्रकाश करते हो । हे देवदेव ! आपके प्रकाश के बिना तो हज जगत्
क्षणमात्रमें अदृश्य हो जाय ॥२६॥
जो पदार्थ थोडे आश्रयवाला है वह बडे पदार्थको धारण करनेमे समर्थ नही होता, जिसप्रकार एक अणु विंध्याचलको
धारण नही कर सकता और तुम्हारे मुखमात्रमें यह सब जगत् दीखता है । यह सब आपकी माया है, वास्तविक नही
ऐसा मुझे निश्चय है ॥२७॥
जिस प्रकारसे रज्जमें सर्प की भ्रांति भयदायक होती है, यद्यपि वहां वास्तवमें सर्प उत्पन्न नही होता और भ्रमके नाश
होनेपर सबका नाशभी नही होता (यथार्थ ही है कि जो उत्पन्न नही हुआ उसका नाश होनेवाला नही) परन्तु यह भय
देनेवाला होता है इसी प्रकार तुम्हारी मायासे जिसको अस्तित्व प्राप्त हुआ है, ऐसा यह जगत् मिथ्या भ्रांतिकै कार्य को
सत्य उत्पन्न करता है ॥२८॥
जो यह तुम्हारा शरीर जगतका आधारभूत दीखता है यदि विचार दृष्टिसे देखा जाय तो भी यह अज्ञान दृष्टि की कल्पना
है कारण कि तुम सच्चिदानन्दरूप और सर्वत्र पूर्ण हो ॥२९॥
ऐसा है तो कर्मकाण्डप्रतिपादक सर्व श्रुति व्यर्थ हुई, पर ऐसा नही । यज्ञ इष्टापूर्त दान अध्ययनादि कर्मोंका फल तुम
कर्त्ताको देते हो, यह कर्मकाण्डपर विश्वास रखनेका प्रमाण है, परन्तु महापुण्योंके उदयसे जब ब्रह्मका साक्षात्कार होता
है और यह सब प्रपंच तुमसे अभिन्न दीखने लगता है, तब तुम क्यों कर्मों का फल देते हो? अर्थात् नही देते तब
कर्मकांडप्रतिपादक कथा असिद्ध हो जाती है ॥३०॥
ज्ञानहीन अविचारी पुरुष ही पूजा यज्ञ आदि बाह्य कर्मोंसे शिव संतुष्ट होते है ऐसा कहते है परन्तु यह ठीक नही कारण
कि जो अमूर्त परिमाणरहित और अनन्त है उसको भोगकी इच्छा नही होती ॥३१॥
इसी प्रकार किंचित बेलपत्रवा चुल्लभर जल से प्रीतिसे आपको देता है वह प्रीतिसे स्वीकार करके आप उसे स्वराज्यपद
देते हो यह भी माया से कल्पित है ऐसा मेरा निश्चय है ॥३२॥
तुमही एक पुराण पुरुष सम्पूर्ण दिशा बिदिशा और विश्वमें व्याप्त हो, इस जगत् के नाश होनेमें भी तुम्हारी हानि नही
हो सकती, जिस प्रकार घटके नाश होनेसे घटमे व्यापी आकाशकी हानि नही हो सकती, इसी प्रकार जगत् के नाशसे
तुम्हारी कुछ हानि नही ॥३३॥
जिस प्रकार आकाशमें एकही सूर्यका बिंब जल भरेहुए छोटे पात्रोमें अनेक बिंबत्वको प्राप्त होता है अर्थात् अनेकरूप
दीखते है इसी प्रकारसे आप एके होकर भी सबके अन्त:करणमें अनेकरूपसे विराजते हो ॥३४॥
संसारके उत्पत्ति पालन और नाश होनेमे भी तुम्हारा कुछ कर्तव्य नही है केवल अनादि सिद्ध देहधारियोंके कर्मानुसार
स्वप्नवत् तुम सब कार्य करते हो, जीव ईश्वरमें केवल बिम्ब और प्रतिबिंबकी समान अन्तर है ॥३५॥
हे शंभो ! स्थूल और सूक्ष्म दोनों जड़ देहोंमे आत्मतत्वके सिवाय दूसरा चैतन्य अंश नही है, हे पुरमथन ! सुख दुःख जो
दोनों देहको होते है उनकी कहनेवाली श्रुति केवल आपमें आरोप करती है, वास्तविक नही ॥३६॥
हे भगवन् ! सच्चिदानन्दरूप समुद्रमें हंसरूप नीलकण्ठ कालस्वरूप भक्तजनोंके सम्पूर्ण पातक दूर करनेवाले और सबके
साक्षी आपके वास्ते नमस्कार है ॥३७॥
सूत उवाच ।
सूतजी बोले, इस प्रकार विश्वेश्वरको प्रणाम कर, हाथ जोड़ विस्मित हो रामचन्द्र परमेश शिवजीसे बोले ॥३८॥
श्रीराम उवाच ।
श्रीरामचन्द्र बोले, हे विश्वात्मन् ! यह अपना विश्वरूप आप उपसंहार करिये । हे शंकर ! आपके अनुग्रहसे आपमें एकत्र
स्थित सब जगतको देखकर मुझे प्रतीति हुई ॥३९॥
श्रीभगवानुवाच ।
श्रीभगवान बोले, हे महाभुज ! रामचन्द्र ! देखो मुझसे दूसरा कोई नही है ।
सूत उवाच ।
सूतजी बोले - ऐसा कहकर शिवजीने अपने देहमें से देवादिकों को गुप्त किया, अर्थात् विश्वरूप छिपा लिया ॥४०॥
आंख खोल फिर जो रामचन्द्र प्रसन्न होकर देखते है इतने ही समयमें पर्वत के श्रृंगपर व्याघ्रचर्मपर स्थित पंचमुख
नीलकण्ठ त्रिलोचन शिवजीको देखा ॥४१॥
जो व्याघ्रचर्मका वस्त्र ओढे, शरीरमें विभूति लगाये है, सर्पके कंकण पहरे, नागका यज्ञोपवीत धारे ॥४२॥
व्याघ्रचर्मका ही वस्त्र ओढे बिजलीकी समान पीली जटा धारे इकले मस्तकपर चन्द्रमा धारे श्रेष्ठ भक्तोंके अभय देनेहारे
॥४३॥
चार भुजा शत्रुनाशक परशा धारण किये मृग हाथमें लिये सब जगत् के पति शिवजीको देख उनकी आज्ञामें मन लगाये
प्रणाम करके रामचन्द्र स्थित हुए ॥४४॥
तब शिवजी रामचन्द्रसे बोले जो जो तुम्हारे पूछने की इच्छा है वह तुम सब पूछो । हे राम! मेरे सिवाय दूसरा कोई
तुम्हारा गुरु नही है ॥४५॥
इति श्रीपद्मपुराणे उपरिभागे शिवगीतासूपनिषत्सु ब्रह्म० योगशास्त्रे शिवराघवसंवादे विश्वरूपदर्शनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥
७॥
अध्याय ८
श्रीरामचन्द्र बोले, पंचभूतके देहकी उत्पत्ति स्थिति नाश किस प्रकारसे होता है और इसका स्वरूप क्या है, हे भगवन्!
विस्तारपूर्वक आप मुझसे कहिये ॥१॥
श्रीभगवान बोले - पृथ्वी आदि पंचभूतसे बना हुआ यह शरीर देह है, इसमें पृथ्वी प्रधान है और दूसरे चार इसमें मिले
हुए अर्थात् सहकारी है ॥२॥
जरायुज, अंडज, स्वेदज और उद्भिज्ज यह पांचभौतिक देहके चार भेद है ॥३॥
और मानसिक उत्पत्ति जो कहाती है वह पांचवी है उसे दैवसर्ग कहते है, उन चारोंमें जरायुज प्रधान है, सो प्रथम
उसीका वर्णन करते है ॥४॥
स्त्रीके रज पुरुषके बीजसे जरायुजकी उत्पत्ति होती है जिस समय ऋतुकालमें स्त्रीके गर्भाशयमें पुरुषका वीर्यप्रवेश होता
है ॥५॥
स्त्रीका रज मिलित होता है तभी जरायुज की उत्पत्ति होती है । स्त्रीका रज अधिक होनेसे कन्या और वीर्य अधिक
होनेसे पुरुषकी उत्पत्ति होती है ॥६॥
और शुक्र शोणितकी समान होने से नपुंसक होता है, जब स्त्री ऋतुस्नान कर चुके तब चौथे दिनसे सोलह रात्रितक
ऋतुकालकी अवधि कही है ॥७॥
उसमें विषम दिन पांचवे सातवे नववें दिनमें स्त्री और युग्म दिनमें पुरुषकी उत्पत्ति होती है ॥८॥
जो सोलहवी रात्रिमें स्त्रीके गर्भ रहता है, तो चक्रवर्ती राजा उत्पन्न होता है इसमें संदेह नही ॥९॥
ऋतुमें स्नान करके जो स्त्री कामातुर हो जिस पुरुष का मुख देखती है, उसी आकृति का गर्भ होता है, इसी कारणसे
स्त्री उस दिन स्वामी का मुख देखेँ ॥१०॥
स्त्रीके उदरमें एक पेशी चमडा निर्मित होता है उसे जरायु कहते है, जिस कारणसे शुक्र और शोणितका योग उसी गर्भमें
होता है इसी कारणसे उसे जरायुज कहते है ॥११॥
सर्प और पक्षी आदि जीव अंडज कहलाते है, मशकादि स्वेदज कहलाते है, वृक्षगुल्मादि उद्भिज्ज कहाते है, और देवर्षि
आदि मानसिक कहाते है ॥१२॥
अपने पूर्वजन्मके कर्मवशसे यह प्राणी स्त्रीके गर्भाशयमें प्राप्त होकर शुक्र शोणितके मिलनेसे प्रथममासमें शिथिल रहता
है ॥१३॥
कछ दिनोंमें उसकी बुदबुदकी आकृति होने लगती है, कछ दिनोंमें जेरसी होती है, इस कारण उसमें दहीकी समान कुछ
गाढापन आता है फिर कुछ दिन में उसकी पेशी (मांसपिंड) बनती है । इस प्रकार शुक्र शोणित संयोग होते हुए
एकमास हो जाता है, दूसरे मासमेंमासपिंड बनता है ॥१४॥
तृतीयमासमें शिर, हाथ आदि उत्पन्न होते है, और जीवका आश्रय लिंगदेह चौथे महीनेमें उत्पन्न होता है ॥१५॥
तब यह गर्भ माताके उदरमें चलायमान होने लगता है । पुत्र दक्षिणपार्श्व और कन्या वामपार्श्वमें स्थित होती है ॥१६॥
और नपुंसक उदरके मध्यभागके स्थित होता है । इस कारण दक्षिणापार्श्वमें जन्म लेनेके अनन्तर होनेवाले श्मश्रु तथा
दन्तादिको छोड़कर सब अंग प्रत्यंग के भाग ॥१७॥१८॥
एक साथ चौथे मासमें हो जाते है, पुरुषोंके गंभीरता स्थिरादि धर्म और स्त्रियों के चञ्चलतादि धर्म चौथेमासमें उत्पन्न
हो जाते है जो सूक्ष्मरूपसे रहते है ॥१९॥
और नपुंसक गर्भके स्त्री पुरुषोंके मिले हुए धर्म गर्भमें उत्पन्न होते है और माताके हृदयमें सन्निकटही इसका हृदय
होकर जिस वस्तुकी माताँ इच्छा करतीँ है उसी वस्तुकी यह इच्छा करता है इस कारण गर्भकी वृद्धिके निमित्त माताकी
इच्छा पूर्ण करनी चाहिये और इसीसे गर्भवती स्त्रीकों दोहदवती अर्थात दो हृदयवाली कहते है ॥२०॥२१॥
और उसकी इच्छा पूर्ण न होने से गर्भमें निर्बलता, बुद्धिहीनता व्यंगतादि दोष हो जाते है । और माताका जिन विषयोंमें
चित्त होता है उन विषयोंमें ही आर्त वह पुरुष होता हैं, इसलिये गर्भिणीकी इच्छा पूर्ण करे ॥२२॥
पांचवे महीनेसे चित्त बढ़ता है तथा मांस और रक्तकी पुष्टि होती है, छठे महीनेमें, अस्थि स्नायु और नख मस्तकके
केश तथा शरीरके लोभ प्रगट होते है ॥२३॥
सातवें मासमें बल शरीरका वर्ण तथा सब अवयवोंकी पूर्णता होती है और वह गर्भका बालक घुटनोंमें कोनी धर हाथोंसे
कान ढक ॥२४॥
और गर्भवाससे व्याकुल होकर भयभीत हुआसा स्थित होता है ॥२५॥
उस समय इसको अनेक जन्मो की सुधि हो जाती है तब बड़ा दुःखी होता है और हा! कष्टकी बात है ऐसे कहता हुआ
दुःखी होता है अपने आत्माको शोचता है ॥२६॥
वह असह्य और मर्मभेदी यातना को प्राप्त होकर बारंबार कष्ट पाता है जिस प्रकार से तपायें रेतमें उसीको डाल दो
उसको जो वेदना होती है ऐसी वेदनाको वह प्राप्त होता है और दुःख भोगता है ॥२७॥
गर्भवासके दुःख यह है प्रथम गर्भवासकी अग्निसे (जो जठराग्नि कहाती है) सन्तप्त होकर कहता है कि यह ज्वाला
मुझको अत्यन्त पीडित करती है ॥२८॥
इसी प्रकार उदरके कीए जब काटते है तो विदित होता है कि इनके मुख कूटशाल्मलिके काटेकी समान तीक्ष्ण है और
यह मुझको अत्यन्त पीड़ित करते है ॥२९॥
गर्भकी बड़ी भारी दुर्गन्ध और जठराग्निकी ज्वालासे जो मुझको दुःख प्राप्त हुआ है, उससे कुम्भीपाक नरकका दुःख
कम है ॥३०॥
मवाद, रक्त, कफ, अमंगल, पदार्थही पान करने और वांति भक्षण करने को मिलती है, अशुचि पदार्थ मल मूत्रादिमें
रहनेसे गर्भमें स्थित प्राणी कीड़ाही हो जाता है ॥३१॥
जो दुःख गर्भशय्यामें सोकर मैने पाया है यह दुःख सम्पूर्ण नरकोंमें भी पडकर प्राप्त नही होता ॥३२॥
इस प्रकार से पूर्वकालमें प्राप्त हुई अनेक प्रकारकी यातनाओंको स्मरण करता हुआ मुक्त होनेका उपाय सोचता यही
अभ्यास करता रहता है ॥३३॥
आठवे महीनेमे त्वचा और श्रुति प्राप्त होती है । इसी प्रकार ओज इन्द्रियशक्ति और तेज शरीरके आरम्भ करनेहारे तथा
धातुपरिणामसे होनेहारे हृदयकै तेज जो जीवनके मुख्य कारण है वह प्राप्त होते है ॥३४॥
कुछ समयतक अतिशय चंचल होनेके कारण किसी समय माताके हृदयमें चंचलरूपसे रहता है, कभी गर्भाशयमें चपलता
कौ प्राप्त हो जाता है । इसी कारण अष्टम मासमें उत्पन्न हुआ बालक बहुत नही जीता कारण कि वह ओज और
तेजसे हीन होता है ॥३५॥
फिर नौवें मासमें प्रसूतिका समय होता है परन्तु शीघ्र प्रसव होनेका प्रतिबंधक यह है कि, जो कुछ गर्भके प्रारब्ध कर्म
हुए तो उसे और कुछै कालतक गर्भमें रहना पड़ता है ॥३६॥
माताकी एक रक्तवाहिनी नाडी नाबिचक्रकी एक नाडीसे मिली हुई है, उसीके द्वारा माताका भक्षण किया अन्न गर्भमें
पहुँचता है, इस प्रकार माताके आहारसे पुष्टिको प्राप्त हो यह गर्भ उसीके द्वारा जीवित रहता है ॥३७॥
योनिचक्रमैं इसके सम्पूर्ण अंग अस्थियोंसे पिचकर व्यथित होते है, तब यह प्रथम कुक्षिसे निकलकर योनिए बाहर आता
है, उस समय उसका शरीर मेदा रुधिर से लिप्त और जरायुसे आच्छादित रहता है ॥३८॥
यह प्राणी अत्यन्त दुःख से पीड़ित हो नीचेको मुखकर जैसेही योनिचक्रसे निकलता है वैसेही ऊंचे स्वरसे रोता है, इस
प्रकार गर्भवास के यन्त्रसे निकलकर दुःखी भोगता है, कही सुख नही मिलता ॥३९॥
जन्म लेकर यह कुछ भी नही कर सकता, केवल मांसके पिंडकी समान पड़ा रहता है, तब इसके मातापिता दंड हाथमे
लिये कुत्ते बिलावें तथा डाढवाले जन्तुओंसे इसकी रक्षा करते है ॥४०॥
उस समय यह ज्ञानशून्यही पिताकी ही समान राक्षसोको भी जानता है, पीनेको दुग्ध जानकर पीनेकी अभिलाषा करता
है, तात्पर्य यह है कि बाल अवस्थाभी महाकष्टकारक है ॥४१॥
जबतक सुषुम्ना नाडी कफसे आच्छादित रहती है तबतक स्फुट अक्षर और वचन बोलनेको वह समर्थ नही होता ॥४२॥
इसी कारणसे यह गर्भमेभी नही रो सकता ॥४३॥
पीछे युवा अवस्थाके आनेसे कामदेवके ज्वरसे विह्वलहो अकस्मात ही कभी कुछ गाता है कभी अपना पराक्रम कहने
लगता है ॥४४॥
कभी अभिमानसे वृक्षों पर चढता, कभी शान्त प्राणियोंको उद्वेजित करता, कभी काम क्रोधके मदसे अन्धा हो
किसीको भी नही देखता ॥४५॥
अस्थि मांस और नाडी इनके सिवाय स्त्रीके मन्मथ स्थानमें और क्या है जिसमें कि मेंढकके फाड़े हुए पेटकी समान
दुर्गन्ध आती है परन्तु तथापि उसमें आसक्त हुआ कामबाण से पीड़ित हो अपने आत्मा को अत्यंत जलाता है ॥४६॥
अस्थि मांस शिरा और त्वचा इसके सिवाय स्त्री के शरीर में और क्या है जो यह पुरुष स्त्रियोंमें आसक्त होकर मायसे
मूढ़ होनेके कारण जगत् में कुछ भी नही देखता ॥४७॥
एक समय प्राणपवन निर्गत हो जाने से भी मृगकेसे नेत्रवालीका यह देह व्यर्थता को प्राप्त होता है और पांच छः दिन
बीतनेपर फिर वह देह दीखता भी नही ॥४८॥
इस प्रकार युवावस्थामैं दुःख भोगने उपरांत वृद्धावस्थाका दुःख प्रारंभ होता है तब यह महानिरादरके स्थान जराको
प्राप्त होकर महादुःखी होता है, इसका हृदय कफसे व्याप्त हो जाता है और खाया हुआ अन्नभी जीर्ण नही होता ॥४९॥
दांत गिर पडते है, दृष्टि मंद हो जाती है, तथा अनेक प्रकारके रोग होनेके कारण कटु तिक्त कषाय औषधियोंका सेवन
करता है वायुसे कमर टेढी हो जाती है, कटि गर्दन हाथ जंघा चरण यह निर्बल हो जाते है ॥५०॥
तब सहस्त्रों रोग इसके शरीरमें लिपट जाते है बंधु तिरस्कार करते है (दोहा-सींग झडे और खुर घिसे, पीठ बोझ नहि
लेय । ऐसे बूढे बैलको, कौन बांध भुस देय) तबैं यह पवित्रतारहित ही मलसे व्याप्त शरीर हौनेके कारण
नखशिखपर्यन्ते सब शरीरोंसे सन्तप्त होता है ॥५१॥
तथापि ईश्वरका ध्यान नही करता और शय्या श्रेष्ठ भोजन आदि दुर्लभ भोगोंका ध्यान करता हुआ स्थित होता है इसके
हाथ पैर कांपने लगते है, सब इन्द्रियोंकी शक्ति कुंठित हो जाती है और कोई सामर्थ्य न रहनेके कारण बालक भी
इसकी हँसी करते है ॥५२॥
फिर इसके आगे मरणकालके दुःखका तो कोई दृष्टान्त ही नही, दरिद्रादि पीड़ा रोगादि पीड़ा कितनी ही प्राप्त हो उसको
कुछ न गिनकर एक मरणके भयसे सबही भयभीत होते है ॥५३॥
बंधुओंसे घिरे हुए प्राणी को मृत्यु ले जाती है जिस प्रकार समुद्रमें प्राप्त हुए सर्पको गरुड ले जाता है ॥५४॥
हा प्रिये! हा धन! हा पुत्रो! इस प्रकार दारुण विलाप करते हुए इस पुरुषको मृत्यु इस प्रकार ले जाता है जैसे सर्प
२. अध्याय ५-८: पिण्डोत्पत्ति, देह-स्वरूप व जीव-गति
मेंढकको ले जाता है ॥५५॥
सम्पूर्ण मर्मस्थानोंके टूटने और शरीरके अवयवोंकी संधियां भग्न होनेसे जो दुःख मरनेवाले को होता है वह मुमुक्षुओंको
स्मरण करना चाहिये, इसके स्मरण करने से संसारसे वैराग्य होकर आवागमनसे छूटनेके निमित्त नारायणके चरणोंमें
ध्यान लगेगा ॥५६॥
यमदूतोंके दृष्टि आकर्षण करने और चेतना लुप्त हो जाने से कालपाशमें बन्धेका कोई रक्षक नही होता ॥५७॥
तब यह अज्ञानसे युक्त हो महत् चित्तमे प्रवेश होने से नही बोलता और जब भार्या पुत्रादि जातिके लोग पुकारते है तो
उत्तर न देकर दीन नेत्रोंसे देखने लगता है ॥५८॥
तब इस जीवको लोहनिर्मित कालपाशसे यमदूत खैंचते है एक ओरसे बंधुओंका स्नेह खेचता है तब यह कुछ नही कर
सकता, तटस्थरूपसे देखता है ॥५९॥
हिचकी बढने और श्वास रुकने तथा तालुके सूखने से उस मृत्युके पकड़े हुएका कोई आश्रय नही होता ॥६०॥
संसाररूपी चक्रमें आरूढ हुआ यमदूतोंसे घिरा कालफांसीमें बंधा महादुःखी हो मै कहा जाऊँ इस प्रकारसे वह जीव विचार
करता है ॥६१॥
क्या करूं, कहां जाऊ, क्या ग्रहण करूं, क्या त्याग दूँ इस प्रकार चिन्तन करता कर्तव्यतासे मूढ हो शीघ्रही प्राणोंको
त्यागता है ॥६२॥
मार्ग में यमदूतोंसे घसीटा हुआ यातनाकी देहमें प्राप्त होकर यहांसे जाकर जिन जिन यमयातनाओंका दुःख भोगता है
उन्हे कहने को कौन समर्थ है ॥६३॥
जिस शरीरको केशर कस्तूरी चन्दन कपूर आदि लगाकर सदा भूषित किया था जिसे अनेक गहनोंसे शोभित और वस्त्रोंसे
आच्छादित किया था ॥६४॥
वह शरीर प्राणवायुके निर्गत होतेही छूनेके अयोग्य और देखनेको भी अयोग्य हो जाता है फिर कोई इसको क्षणमात्र न
रखकर घरसे निकौलने लगते है ॥६५॥
तब यह शरीर काष्ठसे जलाकर क्षणमात्रमें भस्म कर दिया जाता है (फूलबोझा जिन शिर न संभारे, तिनके अंग काठ
बह डारे ! शिरपीडा जिनकी नहिं हेरी, करत कपाल क्रिया तिनकेरी) अथवा शृगाल गृध्र कुत्ते कौए इसको खाजाते है
फिर यह करोडों जन्मतकभी दृष्टिगोचर नही होता है ॥६६॥
जादूगरके समान उत्पन्न जादूंसरीके इस जगतमे मेरी माता मेरा पिता मेरे गुरुजन मेरे स्वजन ऐसी कौन प्रतिज्ञा करता
है? जीव केवल कर्मोको ही लेकर परलोक में जाता है, जैसे मार्गमें पथिकोंके विश्रामके लिये छायाका कोई वृक्ष आ
जाता है, ऐसा ही यह मृत्युलोक है ॥६७॥
जिस प्रकारसे पक्षी संध्याकालमें वृक्षपर आकर बसेरा लेते है और प्रातःकाल उठकर एक दूसरे को त्याग अपने
अभिलषित देशों मे चले जाते है इसी प्रकारसे जाति अजातिके पुरुषोंका समागम है, कर्मानुसार अपने कुटुम्बादिमें जन्म
लेकर स्थित होते है, कर्म समाप्त होते ही अपनी गति को प्राप्त होते है । इससे मनुष्योंकौ उचित है किं, प्राणियोंके
समागमको पथिक समाजके समान जाने, यथा (या दुनियामें आयके, छांड देइ तू ऐंठ । लेना है सो लेइले, उठी जात
है पैठ ) ॥६८॥
मृत्युके बीजसे जन्म और जन्मके बीजसे मृत्यु होती है अर्थात जो उत्पन्न हुआ है उसका अवश्य नाश होगा और नाश
हुआ अवश्य जन्म लेगा, यह प्राणी इसी प्रकार घटीयन्त्रकी समान निरंतर भ्रमण करता रहता है ॥६९॥
हे रामचन्द्र! गर्भके वीर्यके प्राप्त होनेसे इस प्रकारसे प्राणीका जन्म और मृत्यु होती है यह महाव्याधि है, जीवन मरण
दोनों मेंही महादुःख होता है, इस व्याधि को दूर करनेके निमित्त मेरे सिवाय दूसरी औषधि नही (नान्यपंथाः विद्यते
अयनायेति श्रुतेः) इस कारण मेरा भजन करना योग्य है ॥७०॥
इति श्रीपद्मपुराणे शिवगीतासूपनिषत्सु० शिवराघवसंवादे पिण्डोत्पत्तिकथनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥८॥
अध्याय ९
श्रीभगवान बोले - हे राजन! तुम सावधान होकर सुनो, मै तुमसे देहका स्वरूप कहता हूँ, यह संसार मुझहीसे उत्पन्न
होता है मुझही से धारण किया जाता है ॥१॥
और जिस प्रकार भ्रम निवृत होने से रजत सीपमें लय हो जाती है इसी प्रकार यह जगत् ज्ञानसे मुझमें लय हो जाता
है, मै निर्मल पूर्ण सच्चिदानंदस्वरूप हूँ ॥२॥
मै संगरहित शुद्ध सनातन ब्रह्म हूँ, मै अनादिसिद्धि मायासे युक्त होकर जगतका अकारण होता हूँ ॥३॥
मेरी माया का वर्णन नही हो सकता, उसमे सत्त्व, रज, तम यह तीन गुण रहते है ॥४॥
सत्त्वगुण शुक्लवर्ण मनुष्योंको सुख और ज्ञानक देनेवाला है और रजोगुण का रक्तवर्ण है, यह चंचल और मनुष्यों को
दुःख देनेवाला है ॥५॥
तम का कृष्ण वर्ण है, यह जड और सुख दुःखसे उदासीन रहता है, इसी कारण मेरे संयोग से वह त्रिगुणात्मिका माया
॥६॥
मेरे ही अधिष्ठानसे इस प्रकार जगत को रचना करके दिखाती है, जिस प्रकार अज्ञान शुक्ति में रजत और रस्सीमें सर्प
दिखाइ देता है ॥७॥
मुझसे मायाके द्वारा आकाशादिकी उत्पत्ति होती है, मुझसे प्रथम आकाश, आकाशसे वायु, वायुसे अग्नि, अग्निसे
जल, जलसे पृथिवी उत्पन्न होती है, उन्ही पांचोसे उत्पन्न हुआ यह सब देह पंचभूतात्मक कहाता है ॥८॥
पितामाताके भक्षण किये अन्नसे यह षट्कोशात्मक शरीर उत्पन्न होता है, जिसमें स्नायु अस्थि और मज्जा पिता के
कोशसे उत्पन्न होते है ॥९॥
त्वचा मांस और रुधिर यह माताके वीर्यसे उत्पन्न होते है इसी प्रकार मात और पिता सम्बन्धी षट्कोशात्मक देह में
माता से उत्पन्न होने वाले, पिता से उत्पन्न होनेवाले, रजसे उत्पन्न होनेवाले तथा आत्मासे उत्पन्न होनेवाले, चार
पदार्थ है ॥१०॥
उसमें रक्त, मेदा, मज्जा, प्लीहा, यकृत, गुदा, हृदय, नाभि इत्यादि मृदु पदार्थ मातासे उत्पन्न होते है ॥११॥
श्मश्रु, लोम, केश, स्नायु, शिरा, धमनी, नाड़ी, नख, दंत, वीर्य आदि स्थिर पदार्थ पिता के संबधसे होते है ॥१२॥
पुष्टता, वर्ण, तृप्ति, बल, अवयवोंकी दृढ़ता, अलोलुपता, उत्साह इत्यादि रजसे उत्पन्न होते है ॥१३॥
इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, धर्म, अधर्म, भावना, प्रयत्न, ज्ञान, आयुष्य, इन्द्रिय इत्यादि यह आत्मज अर्थात
आत्मासे उत्पन्न हुए कहाते है ॥१४॥
श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा, और घ्राण यह पांच ज्ञानेन्द्रिय कहाते है ॥१५॥
क्रमसे ही शब्द, स्पर्श, रूप रस गन्ध, यह पांच इनके विषय है, वाणी, हाथ, पैर गुदा और उपस्थ यह पांच
कर्मेन्द्रिय है ॥१६॥
बोलना, लेना, देना, चलना, मलविसर्जन और रति यह क्रमसे पांचो इन्द्रियोंके पांच कार्य और मन उभयात्मक है,
मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त यह अन्तःकरणके चार भेद है ॥१७॥१८॥
सुख और दुःख यह मनका विषय है, स्मृति भय विकल्प इत्यादि मनके कर्म है और जो निश्चय करती है उसीको बुद्धि
कँहते है और अहं, मम यह जो अहंकारात्मक मनकी वृत्ति है इसे ही चित्त कहते है ॥१९॥
यह अन्तःकरणभी सतोगुणादिके भेदसे तीन प्रकार का है, सत, रज, तम यह तीन गुण है, जब सतोगुण प्रधान
होता है तब ॥२०॥
आस्तिक्य बुधि, स्वच्छता, धर्ममें रुचि इत्यादि सात्विक धर्म प्राप्त होते है और जब रजोगुण होता है तो काम क्रोध
मद इत्यादि होते है ॥२१॥
तमोगुणकी प्रधानतामें निद्रा, आलस्य, प्रमाद, वंचना होती है, इन्द्रियों की प्रसन्नता, आरोग्य, आलस्य का न
होना, यह गुण सत्त्वसे उत्पन्न होते है ॥२२॥
इन पांच महाभूतोंकी मात्रासे उत्पन्न हुआ यह देह उनके गुणों को धारण करता है, उनमें शब्द, श्रोत्र, इन्द्रिय,
वाणी, कुशलतो, लघुता, धैर्य ॥२३॥
और यह बल सात गुण आकाशसे इस स्थूल देहमें प्राप्त होते है, स्पर्शगुण, त्वगिन्द्रिय, उत्क्षेपण (ऊपर को फेंकना)
अवक्षेपण (नीचे को फेंकना) आकुंचक (संकोड़ना) प्रसारण (फैलना) गर्मन (चलना) यह पांच कर्म है ॥२४॥
प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान यह पांच प्राण है ॥२५॥
नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनंजय यह पांच उपप्राण कहाते है, यह एकही वायुके विकारको प्राप्त होने पर दश
नाम धर लिये है ॥२६॥
उसमें प्राणपवन मुख्य है जो नाभि से लेकर कंठतक स्थित रहता है, और नासिका नाभि तथा हृदयकमलमें गमन
करता है ॥२७॥
शब्द के उच्चारण निशब्द निश्वास और श्वासादिकका यही कारण है ॥२८॥
गुद, लिंग, कटि, जंघा, उदर, नाभि, कंठ, अंडकोश, जोड़ोकी संधि और जंघाओंमें अपानवायु रहता है, उसका
कर्म मूत्र और पुरीषका विसर्जन (त्याग) करना है ॥२९॥
नेत्र, कर्ण, पाव के घुटने, जिह्वा तथा नासिका इन पांच स्थानों में व्यानवायु रहता है, प्राणायाम रेचक, पूरक,
कुंभक इसके कर्म है ॥३०॥
समानवायु सब शरीरमें व्याप्त होकर जठराग्निके सहित बहत्तर हजार नाड़ियोंके रन्ध्रमें संचार करता है ॥३१॥
भोजन किये और पिये हुए सम्पूर्ण रसों के देहकी पुष्टिके निमित्त लेकर चरण, हाथ और अंगकी संधियोंमे उदान वायू
रहता है ॥३२॥
देहका उठाना, चलाना यह इसका कर्म कहा है, त्वचा, मांस रक्त अस्थि और स्नायु इन पांच धातुओंके आश्रय
नागादि पांच उपप्राण रहते है ॥३३॥
डकार, हुचकी, यह नाग पवन का कर्म, पलक खोलना, लगाना, कटाक्ष, यह कुर्मका कर्म, भूख प्यास, छींकना,
कृकलका³ कर्म, आलस्य निद्रा जंभाई देवदत्तका कर्म और शोक और हास्य धनंजय³ का कर्म है ॥३४॥
अग्निके धर्म चक्षु, कृष्ण, नील, शुक्ल इत्यादि रूप भोजनका पाक, स्वतःप्रकाश, क्रोध, तीक्ष्णपन, कृशता,
ओज, इन्द्रियोंका तेज, संताप, शूरता ॥३५॥
और बुद्धि यह गुण तेजसे प्राप्त होते है, और रसनेन्द्रिय, रस शीत, चिकटापन, द्रवत्व पसीना और सम्पूर्ण अवयवोंमें
कोमलता यह धर्म जल से उत्पन्न होते है ॥३६॥
घ्राणैन्द्रिय, गन्ध, स्थिरता, धैर्य, गुरुत्व यह धर्म पृथ्वीसे उत्पन्न होते है, त्वचा, रुधिर, मांस, मेदा, अस्थि,
मज्जा और शुक्र यह सात धातु शरीरको धारण करते हैं ॥३७॥
पुरुषोंका भक्षण किया अन्न जठराग्निसे तीन भाग हो जाता है, तिसका स्थूल भाग मल, मध्यभाग मांस और सूक्ष्म
भाग मन होता है, इससे मन अन्नमय कहाता है ॥३८॥
जलका स्थूलभाग मूत्र, मध्यभाग रक्त और कनिष्ठ भाग प्राण कहाता है इससे जलमय प्राण है ॥३९॥
तेजका स्थूलभाग अस्थि, मज्जा मध्यभाग और वाणी सूक्ष्मभाग है, आशय यह है कि अन्न, उदक और तेजरूप सर्व
जगत है ॥४०॥
रक्तसे मांस उत्पन्न होता है, मांससे मेदा, मेदसे अस्थि और अस्थिसे मज्जा उत्पन्न होती है ॥४१॥
मांससेही नाडी उत्पन्न होती है, और मज्जासे वीर्य उत्पन्न होता है ॥४२॥
वात, पित्त, कफ यह तीन धातु शरीर में रहते है, शरीरमें दश अंजलि प्रमाण जल रहता है और नौ अञ्जलि रस
अर्थात (अन्न) रहता है ॥४३॥
रक्त आठ अञ्जलि, विष्ठा सात अञ्जलि; कफ छः अञ्जलि, पित्त पांच अंजलि और मूत्र चार अञ्जलि रहता है ॥
४४॥
वसा (चर्बी) तीन अंजलि, मेदा दो अञ्जलि, मज्जा एक अञ्जलि और वीर्य आधी अञ्जलि रहता है, इसी को बल
कहते है ॥४५॥
शरीरमें अस्थि तीन सौ साठ, शंख, कपाल, रुचक, आस्तरण और नवक यह पांच प्रकार की अस्थि होती है ॥४६॥
शरीरमें दौ सौ दश २१० अस्थियोंकी सन्धि है, उनको रौरव प्रसर स्कन्दसेचन उलूखल ॥४७॥
समुद्ग मण्डक शंकावर्त और वायसतुण्डक यह आठ भेद अस्थियोंकी संधिके है ॥४८॥
साढ़े तीन करोड़ सब शरीरपर रोम है, और दाढ़ीके बाल तीन लाख है, हे दशरथकुमार ! इस प्रकार यह देहका रूप
तुम्हरे प्रति वर्णन किया, इस देहकी समान निस्सार पदार्थ दूसरा त्रिलोकीमें कोई नही है ॥४९॥
इस देहको प्राप्त होकर पापबुद्धि पुरुष महाअभिमान करते है और अहंकाररूप पापसे मुख्यआनन्द मोक्षका कुछभी उपाय
नही करते, यह महाशोककी बात है ॥५०॥
इस कारण मुमुक्षुको वैराग्य दृढ होनेकी निमित्त यह स्वरूप जानना अवश्य है ॥५१॥
इति श्री पद्मपुराणे शिवगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे शिवराघवसंवादे देहस्वरूपनिर्णयो नाम नवमोध्यायः ॥९॥
अध्याय १०
श्रीरामचन्द्र बोले- हे भगवन् ! इस देहमें यह जीव कहां वर्तमान है यह कहांसे उत्पन्न होता है और इसका क्या स्वरूप
है सो आप कहिये ॥१॥
देहान्तमें यह कहां जाता है और जाकर कहां स्थित होता है और फिर देहमें किस प्रकार आता है वा नही आता सो आप
कहिये ॥२॥
श्रीभगवानु उवाच ।
श्रीभगवान बोले- हे महाभाग! बहुत अच्छी बात पूछी है जो गुप्तसे भी गुप्त है, जिसे इन्द्रादि देवता और ऋषिभी
कठिनतासे नही जान सकते ॥३॥
हे रघुनन्दन! मै भी यह किसी दूसरेसे नही कहना चाहता परन्तु तुम्हारी भक्तिसे प्रसन्न होकर मै कहता हूँ ॥४॥
मै ही सत्यस्वरूप ज्ञानस्वरूप अनन्त परमानन्द परमात्मा परज्योति मायासे मोहित जीवोंको न दीखनेहारा, संसारका
कारण नित्य विशुद्ध, सम्पूर्णका आत्मा, सर्वान्तर्यामी, निःसंग, क्रियारहित, सब धर्मोंसे परे मनसे भी परे हूँ ॥५॥६॥
मुझे कोई इन्द्रिय नही ग्रहण कर सकती, मै संपूर्णका ग्रहन करनेहारा हूँ, मै सम्पूर्ण लोकका ज्ञाता हूँ और मुझे कोई
नही जानता ॥७॥
मै संपूर्ण विकारोंसे रहित हूँ, बाल्य यौवनादि परिणाम आदि विकारभी मुझमें नही है, जहां मनके सहित जाकर वाणी
निवृत्ते होजाती है ॥८॥
उस आनन्दब्रह्म मुझको प्राप्त होकर यह प्राणी फिर कहींसे भी भयको प्राप्त नही होता है ॥९॥
जो सम्पूर्ण प्राणियोंको मुझमें देखता है और मुझे संपूर्ण प्राणियोंमें देखता है, वह निन्दारहित हो जाता है ॥१०॥
जिसको संपूर्ण (भूत) प्राणी आत्मारूप दीखते है उस सर्वत्र एकरूप देखनेवालेको शोक और मोह नही होता ॥११॥
यह संपूर्ण भूतोमें गुप्तरूप आत्मा प्रकाशित नही होता, परन्तु संपूर्णमें वर्तमान है, सूक्ष्मदशी श्रवण मनन,
निदिध्यासन साधना करनेवाले पुरुषोंको अग्रबुद्धिसे दीखता है, दूसरे मनुष्योंको नही देखता है ॥१२॥
अनादि मायासे युक्त निर्विकार अविनाशी एक मै ही नामरूप रहित ब्रह्म जगत्का कर्ता परमेश्वर हूँ ॥१३॥
जिस प्रकार अविद्याके साक्षीभूत ज्ञानपर स्वप्नमें त्रिलोकी की कल्पना की जाती है इसी प्रकार मुझमें यह सब जगत्
उत्पन्न हो दीखता. स्थिति पाता और लय हो जाता है ॥१४॥
अनेक प्रकारकी अविद्याके आश्रय होकर जीवरूपसे भी मै ही निवास करता हूँ, पांच कर्मेन्द्रिय और पांच ज्ञानेन्द्रिय,
मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त यह चारो ॥१५॥
पंचप्राण यह सब मिलकर लिंगशरीरको उत्पन्न करते है, उसी लिंगशरीर में अविद्यायुक्त यह चैतन्य का प्रतिबिम्ब
पडता है, उसीको व्यवहारमें जीव क्षेत्रज्ञ और पुरुष कहते है ॥१६॥१७॥
वही जीव अनादि कालसे पुण्य पापसे निर्मित हुए स्थावर जंगमादि देहोंमे वास कर शुभाशुभ कर्मका फल भोक्ता है
उसीको परलोकगति होती, तथा वही जाग्रत् स्वप्न सुषुप्ति इन अवस्थाओंका भोक्ता है ॥१८॥
जैसे दर्पणके मलिन होनेमें मुखभी मलीन देखता है, इसी प्रकार अन्तःकरणके दोषोंसे आत्मा विकारी दीखता है ॥१९॥
अंतःकरण और जीव इन दोनोंके परस्पर अध्यासके कारण और एकभावका अभिमान करनेसे परमात्माभी दुःखीसा प्रतीत
होता है, वास्तव में सब दुःखका धर्म अन्तःकरणमें है जीवमें नही परन्तु जिस प्रकार चन्द्रमाका प्रतिबिम्बं जलमे
पडनेसे वह जलके चलायमान होनेसे चलायमान विदित होता है इसी प्रकार अन्तःकरणके सुख दुःख होनेसे वही जीवमें
आरोपण किये जाते है ॥२०॥
जिस प्रकार कि मारवाडदेशमें दोपहरके समय सूर्यकी किरण रेतमें पडकर जलरूपसे प्रतीत होती है, उसमें केवल
अज्ञानसे जाना जाता है, वो जलरूप नही, वास्तवमें संतापही करनेवाली है ॥२१॥
इसी प्रकार आत्माभी निर्लेप है, परन्तु वह मूढ बुद्धिवालोंको अविद्या और अपने दोषके कारण कर्ता भोक्ता प्रतीत होता
है ॥२२॥
इस अन्नमय पिंडके स्थूल देहमें हृदय के विषय जीव स्थित रहता है और नखके अग्रभाग से लेकर शिखापर्यन्त व्याप्त
हो रहा है, सो तू सावधान होकर सुन, वही यह जीव मै 'मनुष्य' मै 'ब्राह्मण' इत्यादि अभिमान करता हुआ इस
मांसपिंडमें स्थित है ॥२३॥
नाभिसे ऊपर और कंठ से नीचे अवकाशके स्थान को व्याप्त करके सदा स्थित रहता है, इतनेही स्थानके बीचमें हृदय है
जिसका स्वरूप डंडी सहित कमलकलीके समान है ॥२४॥
उसका मुख नीचेको है, उसमें सूक्ष्म और सुन्दर एक छिद्र है, उसीको दहराकाश कहते है, उसमें जीव रहता है ॥२५॥
केशके अग्रभाग का सौवाँ भागकर फिर उसका भी सौवाँ भाग करके जो प्रमाण किया जाय वही सूक्ष्मता जीवकी जाननी
वस्तुतः तो जीवके स्वरूपका प्रमाण नही है कि ऐसा है, और इतना है ॥२६॥
जिस प्रकार कदंबके फूलको मध्ययायी चारों और केशर होती है, इसी प्रकारसे हृदय स्थानसे सहस्त्रों नाडी निर्गत हुई है
जो शरीर भरमें व्याप्ते है ॥२७॥
वे हित और बलको देती है इस कारण उनकी हित संज्ञा है योगियोंने उन नाडियों की संख्या बहत्तर सहस्त्र कही है ॥
२८॥
जिस प्रकार सूर्यसे किरण निर्गत होती है, इसी प्रकारसे वे नाडी हृदयसे निकली है, उनमें एकसौ एक मुख्यनाडियोंने
संपूर्ण शरीरको वेष्टित कर दिया है ॥२९॥
और प्रत्येक इन्द्रियोमें दश दश नाडी है उन्हीके द्वारा विषयोंका अनुभव होता है, यह नाडिही सुख दुःख जाग्रत्
स्वप्नादिके साक्षातका कारण है ॥३०॥
जिस प्रकार नदी जलको बहाती है इसी प्रकार नाड़ी सुख दुःखरूपकर्म फलको बहाती है । इन १०१ नाडियोंमें से एक
नाडी ऊपर अनन्तनाम बहाती है ब्रह्मरंध्र तक पहुंच गई है ॥३१॥
जो अनन्त अर्थात् सुषुम्नानाम नाडी है उसमे प्राप्त होकर यह जीव मुक्त हो जाता है, जिस समय वह अन्तःकरण
कामादि दोषशून्य होता है, उस समय यत्न करनेसे योगीका आत्मा इस नाडीमें प्राप्त होता है, परन्तु उस समय
सद्गुरुकी कृपा और पूर्णज्ञानकी आवश्यकता है, कारण कि, ज्ञानद्वारा मुक्ति प्राप्त होती है ॥३२॥
जिस प्रकारसे राहु अदृश्य रहकर भी चन्द्रमण्डलमें दीखता है । इसी प्रकार सर्वत्र रहनेवाला आत्मा लिंग देहमें ही प्रतीत
होता है ॥३३॥
जिस प्रकार घटके ले जानेसे घटाकाश भी लेकर जाया जाता है, इसी प्रकार सर्वत्र व्यापकभी जीवात्मा लिंगदेहमें ही
प्रतीत होता है ॥३४॥
यद्यपि वह सर्वत्र पूर्ण और निश्चल है, परन्तु वह जाग्रत् अवस्थामें घटादि पदार्थोंका चैतन्य प्रतिबिंबयुक्त होनेसे
अन्तःकरण वृत्तिसे व्याप्त होकर चंचलसा दीखता है ॥३५॥
जिस प्रकारसे सूर्य दशो दिशाओंको व्याप्त करता है इसी प्रकार निष्क्रिय और सर्व पदार्थोंमें व्याप्त लिंगदेहके सम्बन्धसे
उत्पन्न हुई अन्तःकरणकी वृत्ति नाडियो द्वारा बाहर जाकर विषयोंमें प्राप्त हो उन्हे प्रकाश करती है ॥३६॥
अपने किये उन उन कर्मोंके अनुसार जाग्रतादि अवस्थामें सुख दुःखका साक्षात्कार जीव करता रहता है, सम्पूर्ण वृत्ति
लिंगशरीर से उठती है, जब तक मोक्ष न हो तब तक लिंगे शरीरका नाश नही होता ॥३७॥
जिस समय ज्ञानद्वारा जीव और ब्रह्मका भेद मिट जायगा और अविद्यासहित इस लिंग शरीरका नाश हो जायगा उस
समय केवल आत्माका अनुभवमात्र 'अहं ब्रह्मास्मि' इस स्वरूपमें स्थिरे होने से ही मुक्त होता है ॥३८॥
जिस प्रकार घटके उत्पन्न होते ही घटाकाश उसमे प्राप्त हो जाता है और उसके नष्ट होनेसे वह अपने स्वरूपमें
अवस्थान करता है, इसी प्रकार मायाके नष्ट होनेसे आत्मा अपने स्वरूपमें अवस्थान करता है ॥३९॥
जब जाग्रत् अवस्थामें भोग देनेवाले कर्मोंका क्षय होकर स्वप्नकालमे भोग देनेवाले कर्म जाग्रत समयके देह गेहादि
विषयके साक्षात करनेवाले ज्ञानको छिपाकर जब जाग्रत होते है तब (यह जीव क्रिडा करो) इस प्रकारसे परमेश्वरकी
इच्छासे पूर्व अनुभव किया हुआ स्वप्नसमयके विषय का जाग्रत होनेपर यह मायावी अविद्योपाधि जीव माया कीनिद्रा
के योगसे जाग्रत अवस्थामें भी स्वप्नसे भिन्नस्वरूप अवस्थाकी ओर देखता है ॥४०॥४१॥
घटपटादि विषय, बुद्धि आदि इन्द्रिय और स्वप्नसमयके भोग देनेवाले पदार्थ की समान सब सृष्टि अन्तःकरणने
कल्पना करी है, जिस प्रकार इकला मनुष्य स्वप्न में अनेक मनुष्य देखता, भोग भोगता और संसार की सब रचना
भिन्न भिन्न जानता है, यथार्थ में एकही है, इसी प्रकार वास्तविक आत्मा है, परन्तु अन्तःकरणकी कल्पना से यह
जगत् अनेक भावसे दीखता है ॥४२॥
इन सबको देखनेहारा स्वयंज्योति आत्मा साक्षीरूपसे सबमे वर्तमान है ॥४३॥
इस अवस्थामें अन्तःकरणादि सर्व पदार्थों की वासना भावनासे की हुई असत्य होनेसे वह वासनारूपी ही है और परमात्मा
उसही स्थानमें वासनामात्र से साक्षी है ॥४४॥
जिस प्रकार जाग्रत् अवस्थामें कर्ता कर्म किया इत्यादि संपूर्ण कारणोंसे युक्त व्यवहार चलता है इसी प्रकार पूर्व जन्मके
किये कर्मोकी प्रेरणासे वासनारूप प्रपंच है परन्तु जाग्रत् अवस्थामें प्रपंचका व्यवहार समर्थ होता है और स्वप्ने अवस्थामें
कल्पित है यही इसमें भेद है ॥४५॥
सम्पूर्ण बुद्धि वृत्तिका साक्षी आत्मा स्वयंही प्रकाश करता है, उस साक्षीका जो वासनामात्र साक्षीपना है उसे स्वप्न कहते
है ॥४६॥
बाल्य अवस्थामें जाग्रत् जो कर्म स्तनपान कन्दुकक्रीडा आदि किये है, उस समय उसीकी वासना हृदयमें प्रबल रहती
है, इस कारण वे ही स्वप्न दीखते है ॥४७॥
और तरुण अवस्थामें इन्द्रिय अपने व्यापारमें कुशल हो जाती है यह प्राणी अनेक व्यापारमें व्यग्र हो जाता है,
अध्ययन, कृषि, व्यापार आदिकी वासना हृदयमें अत्यन्त दृढ हो जाती है, इस कारण तद्रूप ही स्वप्न देखता है ॥४८॥
और जो वृद्धावस्थामें परलोक जानेके निमित्त दान धर्म विद्यादि दान ऐसे उत्तम कर्म करते है उनके हृदयमे यह
वासना दृढ हो जाती है तो प्रायः यहभी इसी प्रकार के स्वप्ने देखा करते है, कि हमने दान किया, इस प्रकार लोककी
प्राप्ति हुई ॥४९॥
जिस प्रकारसे श्येन पक्षी आकाशमें भ्रमण करते २ जब थक जाता है, तब विश्रामका और कोई उपाय नही देखकर निज
पंखो को सकोडकर अपने घोसलेमे विश्राम लेता है ॥५०॥
इसी प्रकार जाग्रत और स्वप्न अवस्थामें विचरनेसे जब आत्मा शांत होता है तब संपूर्ण इन्द्रियोंके शिथिल होने से सब
साधनाओंको लयकर देता है अर्थात संपूर्ण इन्द्रियोंके व्यापारको समाप्तकर निद्रित हो जाता है ॥५१॥
नाडियोंके मार्गसे इन्द्रियकी वासना को आकर्षणकर जाग्रत और स्वप्न अवस्थाके सब कार्य समाप्तकर आत्मा लीन हो
जाता है ॥५२॥
जिस समय यह मायासे आच्छादित चैतन्य अव्याकृत स्वरूपमें लय होता है, उस समय सम्पूर्ण प्रपंच लय हो जाता है,
परन्तु यह लय आत्यंतिक नही है, इसमें केवल कार्यरूपका नाश होता है कारण रूपवासना बनी रहती है ॥५३॥
जिस पुरुषकी किसी स्त्री को अत्यंत इच्छा हो, और वह उसे प्राप्त हो जाय उसके सम्भोगसे जो सुख हो जाता है
उसकी ³ सीमा है परन्तु उससे कही अधिक सुख निद्रा अवस्थामें जीवको आनन्दमय कोशमें प्राप्त होनेसे होता है जब
जीवको बाह्य विषयका ज्ञान नही होता, वह अन्तर अर्थात् मोक्षकी अवस्थाकी समान जिसमें विषयवासना अत्यन्त
निवृत्त होती है, निवृत्त वासनावाला भी नही होता ॥५४॥
निद्रावस्थामें जीवात्मा जब ईश्वरको प्राप्त होता है तब जाग्रत आदि अवस्थामें जैसे ईश्वर से भिन्न रहता है तैसा भी
भिन्न रहता है, तब भी भेद नही जाता ऐसा होनेसे ही वह उस समय दुःख रहित होता है, क्योकि कारणात्मामें उसका
साम्य माना जाता है एकत्व पाता है, इस कारण औपचारिक है ॥५५॥
जो भी उस अवस्थामें अविद्याकी सूक्ष्मत्व वृत्ति आनेसे जैसे सुख अनुभव करता है उस सुखको जैसे,
'सुखमहमस्वाप्सम् अर्थात् मै सुखसे सोआ' 'नकिंचिदवेदिषम' 'और दूसरा कुछ भी न जाना केवल अज्ञानका ही अनुभव
किया ॥५६॥
परन्तु यह अज्ञानभी साक्षी आदिकी वृत्तिसे अनुभव किया जाता है, कि सुखसे सोया यदि साक्षी न हो तो सुखसे
सोनेकी स्मृति किसी प्रकार नही हो सकती, क्योंकी गाढ निद्रामें सोते समंय तो उसे सुखका अनुभव होता नही, उसके
पश्चात जाग्रत होकर साक्षीके द्वारा जानता है ॥५७॥
जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति यह तीन अवस्था जैसी इस लोककी है तैसी देवलोक की है, सुषुप्तिके अन्तमें जब जाग्रत
अवस्था आती है तो ³ अपने कारणरूप जीवके प्रारब्धके कर्मसे फिर इन्द्रिये इस प्रकार जाग ³ उठती है जिस प्रकार अग्निसे
विस्फुलिंग (चिनगारियां) उठने लगती है इसी प्रकार सूक्ष्मरूपमें लीन हुई इन्द्रियमे उठती है ॥५८॥
जिस प्रकार जलभरा हुआ घडा जलमें डुबादो और यदि उसे फिर निकालो तो वह उस जल से भराही आताहै इसी प्रकार
से यह जीवात्मा इन्द्रिये आदि सहित कारणमें लयको प्राप्त हो उन इन्द्रियों सहित ही जाग्रत अवस्थाको प्राप्त होता है
॥५९॥
विज्ञानात्मा (जीव) कारणात्मा (ईश्वर) यह दोनों वास्तवमें एकही रूप है परन्तु अविद्याके प्रपंच से उनमें भेद प्रतीत
होता है, जब यह अविद्या नष्ट होजाय तो ऐसा नही होता उस समय दोनों एकरूप हो जाते है ॥६०॥
जिस प्रकार से एक ही सूर्य जलादि पदार्थों से प्रतिबिंबित होनेसे अनेकरूप दीखता है और जलके चलायमान होनेसे
सूर्यादिमें ही चञ्चलता प्रतीत होती है, इसी प्रकार कूटस्थ एक (जीवात्मा) ईश्वर एकही है, और अनेक देहोंमे
प्रतिबिम्बित जीवरूपसे प्रविष्ट होकर अनेकरूप और गमनागमनादिरूपसे दीखता है ॥६१॥
आत्मा देहादि उपाधिसे रहित स्वप्रकाश है, परन्तु स्वरूपकी स्मृति लोप करनेवाली मायाने विस्मृति को प्राप्त कर दिया
है, इससे सब प्रपंच इस में अज्ञानसे विदित होता है, कारण कि, यह माया तो (अघटितघटनापटीयसी) न होनेवाली
बातको भी करके दिखा देती है । माया के योग से आत्मामें कितने ही विरुद्ध कर्म दीखे परन्तु मायाके दूर होते ही जीव
ईश्वर और निर्विकार हो जाता है, हे दशरथकुमार! यह तुमसे जीवका स्वरूप वर्णन किया ॥६२॥६३॥
इति श्रीपद्मपुराणे उपरिभागे शिवगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे शिवराघवसंवादे जीवस्वरूपकथनं नाम
दशमोऽध्यायैः ॥१०॥
अध्याय ११
जीवकी देहान्तरगरि ओर परलोकगति लिंग देहके कारण होती है यह बात संक्षेपसे कहकर अब विस्तारसे वर्णन करते
हुए श्रीभगवान बोले-हे नृपश्रेष्ठ! उस जीवकी देहान्तरगति और परलोकगति मैं तुमसे वर्णन करता हूं, सावधान होकर
सुनो ॥१॥
इस स्थूलदेहसे जो कुछ भोजन किया जाता और पिया जाता है उसीके कारण लिंग और स्थूल देह में सम्बन्ध उत्पन्न
होता है, उसीसे जीवन धारण होता है ॥२॥
जिस समय व्याधि वा जरा अवस्थासे कफ प्रबल होता है तब जाठरानल के मंद होने से भोजन किया हुआ अन्न अच्छी
तरह नही पचता है ॥३॥
जब भोजन किये हुए रसके न प्राप्त होनेसे शीघ्र ही धातु सूख जाते है, और भोजन किये तथा पान किए रससे ही
शरीरमें जाठराग्निके दीप्त रहते जो अन्न भक्षण किया जातो है, वह रसरूप होकर शरीर को पुष्ट करता है ॥४॥
उस समय प्राणवायु वह सम्पूर्ण रस लेकर सब धातुओं में पहुंचाता है इसी कारण से यह समान वायु कहाता है और
वृद्धावस्थामें वह रस उत्पन्न नही होता इस कारण शरीरके बंधन जो दृढ़तासे परस्पर संघट्ट है शिथिल हो जाते है ॥५॥
जिस प्रकार कि, आम्र फल पककर अपने भारसे आपही शीघ्र पतित हो जाता है, इसी प्रकार शरीरके शिथिल होनेसे
लिंगशरीरका स्थूल से वियोग हो जाता है ॥६॥
सम्पूर्ण इन्द्रियोकी वासना, आध्यात्मिक-जीवसम्बन्धी बुद्धि और ज्ञानेन्द्रियादि आधिभौतिक-प्राप्त होनेवाले देहके
कारणभूत सूक्ष्म रूपवाले कर्म यह तीनों आकर्षित होकर हृदयकमलमें एकता को प्राप्त होते है ॥७॥
तब मुख्य प्राणवायु शेष नौ वायुओंसे संयुक्त होकर ऊर्ध्वश्वासरूपी हो जाता है, और फिर वे सब एक होकर जीवात्मा
से संयुक्त होते है ॥८॥
विद्या, कर्म और वासनासे युक्त हो यह जीव अपने कर्मसे नाडीमार्गका आश्रयकरके नेत्रमार्ग अथवा ब्रह्मरंधके द्वारा
बहिर्गत होता है ॥९॥
जिस प्रकारसे घडेको इस देशसे दूसरे स्थानमें ले जाते है परन्तु वह आकाशासे पूर्ण हो जाता है, जहां घट जायगा उसी
उसी स्थानमें घटाकाशभी जायगा इसी प्रकार से जहाँ जहाँ लिंगशरीर गमन करतो है उसी उसी स्थानमें जीव होता है ॥
१०॥११॥
और कर्मानुसार दूसरे देहको प्राप्त होता है, जिस प्रकार नदीका मच्छ कभी इस किनारे और कभी दूसरे किनारे जाता
है, इसी प्रकारसे यह मोक्ष न होनेतक अनेक योनियोंमे भ्रमण करता रहता है ॥१२॥
जो पापी है उनको यमदूत ले जाते है यह यातना देहका जो नरक दुःख भोगनेके लिये दी जाती है, उसको आश्रय करके
केवल नरकों ही को भोगता है ॥१३॥
और जिन्होंने सदा इष्ट (यज्ञादि) पूत- (वापीकूपतडागादि निर्माण करना) कर्म किये है, वह पितृलोकको गमन करते
है, यमदूत उन्हे पितृलोकको प्राप्त करते है ॥१४॥
उस मार्गका क्रम यह है कि, धूम फिर रात्रिअभिमानी देवता के निकट फिर कृष्णपक्षाभिमानी देवता के निकट फिर
दक्षिणायन अभिमानी देवता के निकट फिर वहांसे पितृलोकमें जाता है, पितृलोकसे आगे चन्द्रलोकको प्राप्त हो दिव्य
देह पाकर महालक्ष्मीका भोग करता है ॥१५॥
वहां यह चन्द्रमाकीही समान होकर कर्मकी फलकी अवधितक चन्द्रलोकमें वास करता है, जब पुण्य फल समाप्त हो
जाता है तो जिस क्रमसे इस लोकमें गमन हुआ था उसी क्रमसे इस लोकमें फिर आता है ॥१६॥
चन्द्रलोकसे चलते समय उस शरीरको छोड़ यह आकाशरूप होकर आकाशसे वायुमें और वायुसे जलमें आता है ॥१७॥
जलसे मेघोंमें प्राप्त होकर फिर यह वर्षाद्वारा पृथ्वीपर पतित होता है, फिर अनेक कर्मके वश होकर भक्षण योग्य
अन्नमें प्राप्त होता है ॥१८॥
और कितने एक शरीरप्राप्तिके निमित्त मनुष्यादि योनिमें प्राप्त होते है और कितने एक कर्म और ज्ञानके
तारतम्यसेस्थावरत्व को प्राप्त हो जाते है ॥१९॥
जो जीव अन्नमें प्राप्त हुए है, उस अन्नको स्त्री पुरुष भक्षण करते है उससे स्त्री और पुरुषोंका रज और शुक्र होकर
उन दोनोंके संयोगसे वह गर्भरूप धारण करते है ॥२०॥
यही जीव कर्मके अनुसार स्त्री, पुरुष और नपुंसक होता है, इस प्रकारसे इस जीवकी इस लोकमें गति और परलोकगति
होती है अब इसकी मुक्तिका वर्णन करता हूँ ॥२१॥
जो शमदमादिसाधनसम्पन्न सदा अपने वर्णाश्रमके कर्म करते और फलकी आकांक्षा न करके ईश्वरापण कर देते है वह
मनुष्य देवयानमार्गसे ब्रह्मलोकपर्यन्त गमन करते है ॥२२॥
वह प्रथम ज्योतिमें प्राप्त हो पीछे दिन और फिर शुक्लपक्षाभिमानी देवताके निकट जाता है फिर उत्तरायणको प्राप्त
होकर संवत्सरके निकट गमन करता है ॥२३॥
फिर सूर्यलोकको प्राप्त होता है, चन्द्रलोकसे भी ऊपर विद्युत लोकको प्राप्त होता है फिर उससे आगे कोई एक पुरुष
दिव्य देहको प्राप्त हो ब्रह्मलोकको जाता है, और वहांसे येंहां नहीं आता है ॥२४॥
ब्रह्मलोकमें प्राप्त होकर दिव्य देहके आश्रित हो यह जीव रहता है, उस दिव्य देहसे ब्रह्मलोकमें अनेक प्रकारके मन
इच्छित भोगोंको भोगता हुआ बहुत कालतक उस स्थानमें वासकर ब्रह्माके साथ मुक्त हो जाता है है उसकी फिर
आवृत्ति नही होती ॥२५॥२६॥
जिस प्रकारसे स्वप्नमें देखी हुई सृष्टि जाग्रत होतेही लय हो जाती है इसी प्रकारसे ब्रह्मज्ञान प्राप्त होनेसे यह सब
सृष्टि लय हो जाती है और जिन्होने केवल पापही किये है और उपासना तथा पुण्यकर्मसे रहित उनकी तीसरी गति
अर्थात नरक होता है ॥२७॥२८॥
वे अनेक प्रकारके रौरव, महारौरव, घोर नरकोंको भोगकर पीछे शेष कर्मोके अनुसार क्षुद्र जन्तुओंके शरीरको प्राप्त होते
है ॥२९॥
पृथ्वीमें लीख, मच्छर, डांश आदिका जन्म लेता है, इस प्रकारसे जीवकी गति तुमसे वर्णन की अब और क्या सुनने
की इच्छा है ॥३०॥
श्रीराम उवाच ।
रामचन्द्र बोले, हे भगवन् ! आपने उपासना और कर्मफलसे अनेक प्रकारसे चन्द्रलोक और ब्रह्मलोककी प्राप्ति वर्णन
की सो यथार्थ है ॥३१॥
गन्धर्वादि लोक और इन्द्रादि लोकोंमे किस प्रकारसे भोग प्राप्त होते है कोई देवता कोई इन्द्र और कोई गन्धर्व होता है
॥३२॥
हे शंकर! यह कर्मका फल है वा उपासनाका फल है सो कृपा करके वर्णन कीजिये, इसमें मुझे बड़ा सन्देह है ॥३३॥
श्रीभगवानुवाच ।
शिवजी बोले, उपासना और शुभकर्म, इन दोनोंहीके योगसे फल प्राप्त होता है, वह हम वर्णन करते है, जो मनुष्य
युवा सुन्दर शूर नीरोग और बलवान हो ॥३४॥
वह यदि सप्तद्वीपयुक्त पृथ्वीको निष्कंटक भोग करता हो उसका नाम मानुषानन्द है यह आनन्द साधारण मनुष्योंको
देह प्राप्त होनेवाले आनन्दसे सौ गुणा अधिक है ॥३५॥
जो मनुष्य तप आदिसे संयुक्त हो वह गन्धर्व होता है मनुष्योंके आनन्दसे सौगुणा आनन्द गन्धर्वोको प्राप्त होता है ॥
३६॥
इसी प्रकारसे ऊपर ऊपर पितृलोक देवादिलोकमें उत्तरोत्तर सौगुणा आनन्द बढता जाता है ॥३७॥
तिनमें भी देवता, देवतासे इन्द्र, इन्द्रसे बृहस्पति, बृहस्पतिसे ब्रह्मदेव, ब्रह्मदेवसे ब्रह्मानंद उत्तरोत्तर सौ २ गुणा
अधिक है ॥३८॥
ज्ञानके आनंदसे अधिक आनंद तो देवलोकमें भी नही है, कारण कि, ज्ञानीको किस वस्तुकी अपेक्षा नही है कहींसे भय
नहीं है, जो ब्राह्मण क्षत्रियादि वेदवेदांगके पारगामी निष्पाप और निष्काम है, और भगवँत् की उपासना करनेवाले है ॥
३९॥
वह अनुक्रमसे उत्तर उत्तर आनंदको प्राप्त होते है परन्तु हे दशरथकुमार! यह जो कुछ आनंद है सौ आत्मज्ञानकी
बराबर नही है इससे आत्मज्ञानका अनुष्ठान करना उचित है ॥४०॥
जो ब्राह्मण ब्रह्मदेवता है उसे कर्मउपासनासे कुछ प्रयोजन नही है न उसकी कर्मसे कुछ वृद्धि और न करनेसे कुछ हानि
भी नही, जो शास्त्रने विहित कर्मोंका विधान और निषिध कर्मोंका निषेध किया है, वह कँवल जब तक ज्ञान नही
तभीतक है, ज्ञान होने पर कुछ नही, और यदि ज्ञानी लोकस्थापनके निमित्त करे तो भी कुछ हानि नही ॥४१॥
इस कारणसे ज्ञानवान ब्राह्मण सबसे श्रेष्ठ है, जो कोई पुण्यवान ज्ञानी जानकर कर्म करता है उसके पुण्यका फल
अक्षय होता है ॥४२॥
जिस फलको मनुष्य करोड ब्राह्मणके भोजन करानेसे प्राप्त होता है वह फल एक ज्ञानीके भोजन कराने से प्राप्त
होजाता है ॥४३॥
जो वस्तु ज्ञानिजनों को दिया जाता है वह करोडगुण मिलती है और जो मनुष्योंमें अधम ज्ञानीकी निन्दा करता है वह
क्षयरोगकौ प्राप्त होकर मृतक हो जाता है कारण कि, ज्ञानी साक्षात् ईश्वर है ॥४४॥
हे रामचन्द्र! जो निर्गुण को कठिन समझते है वह पहले सगुण उपासना करे, किसीभी सगुण उपासना करनेवाले की
अधोगति नही होती, इस कारण सगुणरूपकी ही उपासना करके सुखी हो ॥४५॥
इति श्रीपद्मपुराणे उपरिभागे शिवगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे शिवराघवसंवादे जीवगत्यादिनिरूपणं
नामैकादशोऽध्यायः ॥११॥
अध्याय १२
श्रीरामचंद्र बोले, दे देवदेव! महेश्वर आपको नमस्कार है आप उपासना की विधि और उसका देशकाल वर्णन कीजिये,
कि किस समय किस प्रकार उपासना की जाय ॥१॥
ईश्वर उवाच ।
हे भगवन ! हमारे ऊपर आपकी कृपा होय तो उपासनाका अंग और नियम कहो, फिर शिवजी बोले हे राम! मै तुमसे
उपासनाकी विधि और उसका देश काल कहता हूँ तुम मन लगाकर सुनो । जितने देवता है यह सब मेरे ही रूप है
वास्तवमें मुझसे भिन्न नही ॥२॥३॥
जो दूसरे देवताओंके भक्त है, और श्रद्धापूर्वक उनका पूजन करते है, हे राजन!! वे पुरुष मेआ ही भेदबुद्धिसे यजन
करने वाले है ॥४॥
जिस कारण कि, इस सम्पूर्ण संसारमें मेरे सिवाय और कुछ नही है, इसीसे मै सब क्रियाका भोक्ता और सबका फल
देनेवाला हूँ ॥५॥
जो पुरुष विष्णु, शिव, गणेशादि जिस भावसे मेरी उपासना करते है, उसी भावनाके अनुसार उसी देवताके रूपसे मै
उन्हें वांछित फलँ देता हूँ ॥६॥
विधिसे अविधिसे किसी प्रकारसे हो जो मेरी उपासना करते है उनको मै प्रसन्न होकर फल देता हूँ, इसमें कोई संदेह
नही ॥७॥
यद्यपि वह दुराचारी है परन्तु वह अनन्य होकर मेरा भजन करता है उस पुरुषको साधुही मानना चाहिये, और
पुण्यवान है यह भक्तिकी महिमा दिखाई है परन्तु यह निश्चय जानना चाहिये कि अनन्यभक्तिवाला किसी प्रकार
दुराचारी नही हो सकता, कारण कि अनन्य भक्तिका और स्थानमें मन नही जाता ॥८॥
जो एकनिष्ठबुद्धि होकर जीवात्मा परमात्माको एकही रूप जानता है, अर्थात् जीवरूपभी मेरेको ही जानता है और अनन्य
बुद्धिसे मेरा भजन करता है उसको पाप स्पर्श नही करता बहुत क्या उसे ब्रह्महत्याभी स्पर्श नही करती ॥९॥
उपासनाकी विधि चार प्रकारकी है संपत्, आरोप, संवर्ग और अध्यास ॥१०॥
अल्प वस्तुकाभी गुणयोगसे मन की वृत्तिसे अनन्त गुणोंकी भावनासे चिंतन करना जैसे कि, मूर्तिमें अनंत गुणविशिष्ट
शिव तथा ³विष्णुका ध्यान करना इसका नाम संपत है ³॥११॥
एक देश वा अंगमें सम्पूर्ण उपास्य वस्तु का आरोप करके जो उपासना करनी है उसे आरोप कहते है, जैसे ओंकारकी
उद्गीथसाम रूप से उपासना की जाती है ॥१२॥
आरोप और अध्यास इनका स्वरूप बहुधा एकसा है, भेद इतनाही है कि बुद्धिपूर्वक किसी एक वस्तुमें विवक्षित धर्मका
आरोप करके उसकी उपासना करना, ³जैसे स्त्रीपर अग्निका आरोप (अर्थात् ³) स्त्रीको अग्निरूप मानना यह अध्यास है ॥
१३॥
कर्मयोगसे उपासना करने का नाम संवर्ग है अर्थात् सम्पूर्ण भूतोंको उपासनाके योगसे वशमें करना, जैसे प्रलय कालमें
संवर्त नामक, वायु अपनी शक्तिसे सब भूतोंको वश करती है ॥१४॥
गुरुसे प्राप्त हुए ज्ञानसे देवतामें और अपनेमें भेद न मानना और अन्तःकरणसे देवताके समीप प्राप्त होना और
अन्त:करणसे ³ही सब पूजन कल्पित करना, इसका नाम अंतरग उपासना है, और इसके उपरांत दूसरी विधिसे बहिरंग
उपासना कहाती है ॥१५॥
तब इस प्रकार किसी की उपासना करनी और कहां तक करनी किसी भी देवताकी उपासना करते हुए, ध्यानसे उस
देवताके स्वरूपका जो ज्ञान होता है उस ज्ञानको विजातीय ज्ञानसे शिवका ध्यान करते हुए कामिनी के ध्यानसे-मध्यमें
विच्छिन्न न होकर व्यवधानरहित ज्ञानपरम्परासे-निदिध्यासना करके ध्यानयोग्य देवताओंमें अपनी बुद्धि लगाकर
एकरूपका साक्षात् होने तक उपासना करता रहे ॥१६॥
संपादादि जो चार उपासना वर्णन की है, यह दृढ बुद्धिकी उपासना तथा उपासनाकी परम अवधि है और सगुण उपासना
इस प्रकार है कि, मूर्तिकी उपासना करनेके समय ³उसके प्रत्येक अंगोंमें अक्षय दृष्टि लगाकर उपासना करनी, इस
उपासनाके अंगोको श्रवण करो ॥१७॥
उपासनोके योग्य देशोंका कथन करते है कि, तीर्थ और क्षेत्रादिकोंमें ही जानेसे उपासना होगी यह विचार न करे,
क्षेत्रादिकोंमें जानेकी श्रद्धा त्याग दे, और जहां अपना चित्त स्वच्छ और एकाग्रतायुक्त होय तहां ही सुखसे बैठकर
उपासना करे ॥१८॥
कम्बल मृदुकुपास वस्त्र अथवा मृगचर्मपर स्थित होकर एकान्त देशमें स्थितहो समान ग्रीवा और शरीरको सरल करेंगे ॥
१९॥
विधिपूर्वक भस्म धारणकर और सम्पूर्ण इन्द्रियोंको रोककर तथा भक्तिपूर्वक अपने गुरुको प्रणाम करके,
ज्ञानशास्त्रद्वारा ज्ञानकी प्राप्तिके निमित्त भक्तिसे प्राणायाम करे ॥२०॥
जिसका अन्तःकरण मूढ और विवेकशून्य है उसकी इन्द्रियें दुष्ट घोडोंकी समान है, अर्थात् जैसे दुष्ट घोड़ा सारथीके
वशमें नही आता तैसे ³दुष्ट इन्द्रिय वाले उन्हे वश नही कर सकते ॥२१॥
और जो ज्ञानसम्पन्न है उनके यत्न करने से सम्पूर्ण इन्द्रिये मनके सहित वशमें हो जाती है, जिस प्रकार सुशिक्षित
अश्व सारथीके वशमें हो जाता है ॥२२॥
और जो विवेकशून्य चंचलचित्त बाह्य और अन्तर शौचसे हीन और अनुभवज्ञानरहित है वे उस स्थानको नही प्राप्त होते
परन्तु निरंतर संसारमें ही भ्रमण करते है ॥२३॥
और जो ज्ञानी स्थिरचित्त बाह्य आभ्यन्तर पवित्रतासे युक्त है वे उस स्थानको प्राप्त होते है जहांसे फिर आना नही होता
(न स पुनरावर्तते २) यह श्रुतिमें लिखा है ॥२४॥
जिसका विज्ञानरूपी सारथी मनरूपी लगाम धारण किये है, इन्द्रियरूपी घोड़े जुते शरीररूपी रथमे जो बैठा है वह
संसाररूपी मार्गसे पारहो परमपद (मोक्ष) स्थानपर पहुँच जाता है ॥२५॥
हृदयकमल कामादिदोष रहित शमदमादिगुणसम्पन्न स्वच्छ और शोकरहित करके उसमें मेरा ध्यान करना उचित है ॥
२६॥
जो अचिन्त्यस्वरूप सीमारहित है, जिससे श्रेष्ठ कोई दूसरा नही है, जो नाशरहित कल्याणस्वरूप आदिअन्तशून्य प्रशांत
और सबका कारण है ॥२७॥
३. अध्याय ९-१२: विश्वरूप दर्शन, शिव-माहात्म्य व भक्ति-योग
सर्वव्यापक सच्चिदानन्दस्वरूप रूपरहित उत्पत्तिशून्य आश्रय युक्त मुझ ब्रह्मरूपको शुद्ध स्फटिक मणिकी समान शरीर
और अर्धांगमे पार्वतीको धारण किये ॥२८॥
व्याघ्रचर्म ओढे, नीलकंठ, त्रिलोचन, जटाजूट धारण किये चन्द्रमा शिरपर धरे, नागोंका यज्ञोपवीत पहरे ॥२९॥
व्याघ्रचर्मकाही उत्तरीय (डुपट्टा) ओढे, सर्वश्रेष्ठ भक्तोंके अभयदाता, पीठकी ओरके ऊँचे दोनों हाथोंमें मृग और परशु
धारण किये, सब अंग में विभूति लगाये, तथा सम्पूर्ण आभूषणोंसे भूषित ॥३०॥
इस प्रकारसे आत्माकी अरणी और प्रणवको उत्तर अरणी करके उसका मथन करता हुआ मेरा ऊपर कहे अनुसार ध्यान
करे तौ यह मेरा साक्षात्कार पाता है, जब यज्ञको करते है तब अग्निके निमित्त खैर वा शमीकी दो लकडी ले ऊपर
नीचे रख अग्निके निमित्त उसे मथते है ॥३१॥
वेदवचन और शास्त्रोंके वचनसे मुझे कोई नही पा सकता परन्तु जो एकाग्रचित्तसे सदैव मेरा ध्यान करता है, मै उसे
प्राप्त होता हूँ और उसे फिर त्याग नही करता ॥३२॥
जो पापसे पराङ्मुख नही जिसकी तृष्णा शान्त नही श्रवण मनन निदिध्यासनसे जिसका मन समाधान नही है जिसका
मन चंचल है ऐसी पुरुष केवल शास्त्रके अध्ययनसे मुझे प्राप्त नही कर सकता ॥३३॥
जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाका प्रपंच जिस साक्षीरूप अधिष्ठान ब्रह्मस्वरूपके द्वारा प्रकाशित होता है,
वह ब्रह्म मैं हूँ, ऐसी यथार्थ जाननेसे यह सम्पूर्ण बंधनोंसे मुक्त हो जाता है ॥३४॥
तीनों अवस्थामें जो भोग पदार्थ जो भोक्ता और जो भोग्य वस्तु है, यह तीनों ब्रह्मकी ही सत्तासे कल्पित है, इनका
प्रकाशक गति करनेहारा सदाशिव मै ही हूँ ॥३५॥
इस प्रकार निर्गुण कथन कर अब फिर मद अधिकारियोंको सगुणरूप का उपदेश करते है, मध्याहनकालके करोडों सूर्यकी
समान तेजयुक्तँ और करोडों चन्द्रमाकी समान शीतल सूर्य चंद्रमा अग्नि जिसके नेत्र है उनके मुखकमलका स्मरण करे
॥३६॥
एक ही परमात्मा सम्पूर्ण भूतोंमे गुप्त है, सर्वव्यापी और सब भूतोंका अन्तरात्मा है, सबका अध्यक्ष और सब भूतोंमें
निवास करनेवाला सबको साक्षी चित्तकी प्रेरणा करनेवाला निर्लेप और निर्गुण है ॥३७॥
स्वाधिक सब भूतोंका आत्मा वह एकही देव है, मायारूप प्रपंचका बीज प्रगट करता है, वह पुरुष मै ही हूँ मुझको जो
धीर पुरुष शास्त्र और आचार्यके उपदेशसे साक्षात्कार करते है उन्हीको निरन्तर शान्ति और कैवल्य मुक्ति होती है,
दूसरों को नही ॥३८॥
जिस प्रकार से एक ही अग्नि सब संसारमें प्रविष्ट होकर उन काष्ठ लोह आदिमें सीधे टेढे चतुष्कोण आदिरूपसे उसी
वस्तुके आकारसी हो ही है, इसी प्रकार सबका अन्तरात्मा एकही है, और शरीरमें प्राप्त होनेसे उसीके आकारसा प्रतीत
होता है, यद्यपि उपाधिके वशीभूत होनेसे भिन्न २ प्रकार का प्रतीत होता है, तथापि सर्व लोकके दुःख से वह दुःखी
और सुखसे सुखी नही होता ॥३९॥
जो विद्वान ज्ञानी मुझको सर्वान्तर्यामी महान व्यापक स्वप्रकाश, मायासे रहित आत्मस्वरूप जानता है, वही संसार
बंधनसे मुक्त होता है, इसके सिवाय मुक्तिके प्राप्त होने का दूसरा उपाय नही है, तथा च श्रुति (वेदाहमेतं पुरुषं
महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात ॥ तमेव विदित्वातिमृत्युनेति नान्यः पंथा विद्यतेयनाय ) ॥४०॥
प्रथम सृष्टिके आरंभ में मै ब्रह्माको उत्पन्न करके उसके निमित्त वेद को उपदेश करना वही स्तुतिके योग्य पुराण पुरुष
मै हूँ, जो इस निश्चयसे मुझे जानते है, वे मृत्यु के मुखसे छूट जाते हैं तथा च श्रुतिः (या वै ब्रह्माणं विदधौति पूर्वं
यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै) इत्यादि श्रुतिमें प्रसिद्ध हैं ॥४१॥
इस प्रकार शान्ति आदि गुणोंसे युक्त हो जो मुझको तत्त्वसे जानता है वह दुःखोंसे छूटकर अन्तमें मुझको प्राप्त हो
जाता है ॥४२॥
इति श्रीपद्मपुराणे शिवगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे शिवराघवसंवादे उपासनाज्ञानफलं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥
१२॥
अध्याय १३
सूतजी बोले, बुद्धिमानोंमे श्रेष्ठ रघुनाथजी इस प्रकार श्रवण करके प्रसन्न हो गिरिजापतिसे मुक्तिका लक्षण पूछने लगे
॥१॥
श्रीराम उवाच ।
श्रीरामचन्द्र बोले- हे कृपासागर भगवन् ! आप मेरे ऊपर प्रसन्न होकर मुक्ति का स्वरूप और लक्षण वर्णन कीजिये ॥२॥
श्रीभगवानुवाच ।
श्रीभगवान बोले, हे राम! सालोक्य, सारूप्य, सार्ष्ट्य सायुज्य और कैवल्य यह मुक्तिके पांच भेद है ॥३॥
जो कामना रहित अज्ञानसे हीन होकर मूर्तिमें मेरा पूजन करते है वह मेरे लोकको प्राप्त होकर सालोक्य मुक्ति को प्राप्त होते है और अनेक प्रकार के इच्छित भोग भोगते है ॥४॥
और जो मेरा स्वरूप जानकर निष्काम बुद्धिसे मेरा भजन करता है वह मेरे स्वरूपको प्राप्त होकर अनेक प्रकारके अभिलाषित भोगोंको भोगता है इसे सारूप्य मुक्ति कहते है ॥५॥
जो पुरुष मेरी प्रीतिके निमित्त इष्टपूर्तादिकर्मोंको करता है वह भी उसी फलको प्राप्त होता है इसमें संशय नही ॥६॥
जो कर्ता जो भोजन करता और जो अग्निमें हवन करता है जो देखता है और जो कुछ तपस्या आदि करता है, वह सब मेरे ही अर्पण करता है, वह मेरे लोक की सब लक्ष्मी जगत् के कर्तापन आदिसे व्यतिरिक्त सब दिव्य संपत्ति भोगता है, इसे सार्ष्ट्य मुक्ति कहते है ॥७॥
जो शान्ति आदि साधनसे युक्त होकर श्रवण मनन निदिध्यासनपूर्वक मुझेही आत्मारूप जानता है वह अद्वैत स्वप्रकाश ब्रह्मके तद्रूपको प्राप्त होता है, जो जीवका यथार्थ स्वरूप है इस स्वरूपसे अवस्थान करने का नाम सायुज्यमुक्ति है ॥८॥९॥
सत्य ज्ञान अनंत आनंद इत्यादि लक्षण युक्त और सब धर्मरहित मन और वाणीसे परे ॥१०॥
सजातीय और विजातीय पदार्थोंके उसमें न होनेसे इस ब्रह्मको अद्वैत कहते है ॥११॥
हे राम! यह जो शुद्ध स्वरूप का वर्णन किया है; इसे आत्मरूप जानकर सम्पूर्ण स्थावर जंगम जगतको मेरे ही रूपमें देखता है ॥१२॥
जिस प्रकार आकाशमें गन्धर्वनगर नही है और उसकी मिथ्या प्रतीति होती है इसी प्रकारसे यह अनादि अविद्यासे उत्पन्न हुआ जगत् मुझमें कल्पना किया जाता है, वास्तविक मिथ्या है ॥१३॥
जिस समय मेरे स्वरूपके ज्ञानसे अविद्या नष्ट हो जाती है तब मन वाणीसे परे एक म ही विद्यमान रहता हूँ ॥१४॥
मै नित्य परमानन्द स्वप्रकाश और चिदात्मा हूँ, काल दिशा विदिशा पंचभूत इस स्वरूपमें कुछ नही है, मेरे सिवाय दूसरी कोई वस्तू नही है, मै केवल एकही विद्यमान रहता हूँ ॥१५॥
मेरे निर्गुण स्वरूप कोईनील पीतादि आकार और वर्णका नही है और इन चर्मचक्षुसे भी कोई मुझे देखनेको समर्थ नही हो सकता, जो कोई हृदयमें बुद्धिसे मेरे स्वरूपको जानते है, वे ही ज्ञान मुक्त हो जाते है ॥१६॥
श्रीराम उवाच ।
श्रीरामचन्द्रजी बोले, हे भगवन!! ! मनुष्योंको शुद्ध ज्ञान किस प्रकारसे होता है, हे शंकर! जो आपकी कृपा मेरे ऊपर है तो इसका उपाय वर्णन कीजिये ॥१७॥
श्रीभगवानुवाच ।
श्रीभगवान बोले, ब्रह्मलोकपर्यन्त दिव्य देहको भी नाशवत समझकर भार्या, मित्र, पुत्रादि इन सबको क्लेशदाता और अनित्य समझकर इनसे चित्तकी वृत्ति पृथक करे ॥१८॥
और श्रद्धापूर्वक ज्ञान प्राप्त होने के निमित्त मोक्षशास्त्र वेदांतमें निष्ठाशील होकर उसी के जाननेका उपाय करता हुआ ब्रह्मवेत्ता गुरुके निकट जाय ॥१९॥
उस गुरुके आगे अपने हाथमें लाया हुआ पदार्थ रखेके दंडवत नमस्कार करे फिर उठके हाथ जोड़के इच्छित अर्थका निवेदन करे ॥२०॥
बहुत कालतक सावधान हो इन्हे सेवासे संतुष्ट करे और मन लगाकर सब वेदान्तके वाक्योंका अर्थ श्रवण करे ॥२१॥
और सम्पूर्ण वेदान्तके वाक्यों का तात्पर्यभी निश्चय करले (यह नही कि अहं ब्रह्म करता फिरे) इसका नाम ब्रह्मवादियोंने श्रवण कहा है ॥२२॥
लोहमणी आदिके दृष्टान्त सदुक्तिसे जैसे कि, चुम्बककी शक्तिसे लोहा भ्रमण करता है, इसी प्रकार ब्रह्मकी सत्तासे
जगत् भ्रमण करता है श्रवणकौँ पुष्ट करके मनन करें अर्थात् उसका चिन्तन करे वाक्यार्थके विचारका ही नाम मनन
कहा है ॥२३॥
ममता और अहंकार रहित सबमें समान संगवर्जित शांति आदि साधन सम्पन्न होकर निरन्तर ध्यानयोगसे आत्माका
आत्मासेही ध्यान करनेको निदिध्यासन कहते है ॥२४॥
सम्पूर्ण कर्मके क्षय हो जानेसे जो आत्मा का साक्षात्कार है, किसी को शीघ्र और किसीको चिरकालमें होता है जिसे
प्रतिबेधक नही होता उसे शीघ्र और जिसे प्रतिबंधक होते है उसे देरमें होता है ॥२५॥
जो कुछ जीवके किये हुए और करोडों जन्मसंग्रह किये कर्म है वह ज्ञानसे ही नष्ट होते है, कर्म चाहे दशसहस्त्र
करोडँनसे नष्ट नही होते ॥२६॥
ज्ञान होने पर जो कुछ पुण्य वा पाप थोडा या बहुत किया जाता है, उससे यह प्राणी लिप्त नही होता ॥२७॥
और जो इस प्राणीके शरीर निर्माणका हेतु प्रारब्धका कर्म है, वह भोगनेसे ही नष्ट होगा, ज्ञानसे नही ॥२८॥
जिसको मो अहंकार नही है, जो सम्पूर्ण संगसे रहित है, सम्पूर्ण प्राणियोंको आत्मामें और सम्पूर्ण प्राणियों में जो
आत्माको देखता है इस प्रकार ज्ञानयुक्त विचरता हुआ प्राणी जीवन्मुक्त कहाता है, कारण कि वेह प्रारब्ध कर्मक्षयके
निमित्त विचरता है ॥२९॥
सांपकी केंचली सर्पसहित जिस प्रकार देखनेवालोको भय देती है और सर्पके शरीरसे छुटने पर कुछ भी भय नही देती,
इसी प्रकार मायामुक्त आत्माके होनेसे अनेक प्रकारसे संसार भय प्रतीत होते है, वहीं जीवन्मुक्त होने से फिर कही
किसी प्रकारसे भयभीत नही होता ॥३०॥
जिस समय इस प्राणीके हृदयकी वासना संपूर्ण नष्ट हो जाती है और वैराग्य प्राप्त होता है, तभीयह प्राणी अमृत हो
जाता है, यही वेदान्तशास्त्रकी मुख्य शिक्षा है ॥३१॥
जिस प्रकार कैलास वैकंठ आदि दिव्यलोक है, इस प्रकार मोक्ष कोई लोक नही है, मुक्त किसी ग्रामान्तरका निवासी
नही होता, केवल हृदयँकी अज्ञानग्रन्थिके नष्ट हो जानेसे मुक्त होता है ॥३२॥
जिसका वृक्ष अग्रभागसे चरण आगे पडता है वह उसी समय नीचे गिरता है, इसी प्रकार ज्ञानी पुरुषोंको ज्ञान होते ही
मुक्तिकी प्राप्ति हो जाती है, इस संसारसे वह तत्काल छूट जाता है ॥३३॥
जीवन्मुक्त पुरुष तीर्थमें वा चाण्डालके घरमे देह त्यागन करे अथवा ब्रह्मका चिन्तन करता हुआ देहका त्यागने करे
किंवा अचेतनँ होकर मृतक हो जाय, वह ज्ञानके बलसे मुक्तही हो जाता है ॥३४॥
जीवन्मुक्त किसी प्रकारके वस्त्र धारण करे, वा नग्न, भक्ष्य अथवा अभक्ष्य कुछभी खाय चाहे जहां शयन करे वह
प्रारब्धँकर्मके क्षय हो जानेसे मुक्त हो जाता है ॥३५॥
जिस प्रकार दुधमें से निकाला हुआ घृत यदि फिर दूधमें डालो वह घृत उसमें नही मिलता उसी प्रकार ज्ञानवान संसारसे
विरक्त होकर फिर जगतमें आसक्तँ होता नही ॥३६॥
हे रामचन्द्र! जो इस अध्यायको नित्य पढते और सुनते है वह अनायास देहबंधनसे छूट जाते है ॥३७॥
हे राम! तुम्हारा अन्तःकरण जो संशयके वश हो रहा है इस कारण तुम नित्य इस अध्याय का पाठ करो इससे
अनायास तुम्हारी मुक्ति हो जायेगी ॥३८॥
इति श्रीपद्मपुराणे शिवगीतासूपनिषत्सु० शिवराघवसंवादे त्रयोदशोऽध्यायः ॥१३॥
अध्याय १४
श्रीराम उवाच ।
शिवजीसे ब्रह्मसाक्षात्कारकी विधि सुनकर अब दूसरे साधनोंसे प्रश्न करते हुए, रामचन्द्रजी बोले- हे भगवन् ! यद्यपि
तुम्हारा रूप सच्चिदानंदात्मक निरर्वयव क्रियाशून्ये और निर्दोष है ॥१॥
तथा सब धर्मोसे परे मन और वाणीके अगोचर तुमको सर्वव्यापक होनेसे जीव सर्वस्थानमें स्थित आत्मा स्वरूपसे देखता
है ॥२॥
आत्मविद्या और तपही जिसका मूल साधन है, जो उपनिषदोंका मुख्य तात्पर्य है, जो मूर्तिरहित सम्पूर्ण भूतोंका
आत्मा अर्थात् सब जीव जिसके अंश हैं, जो कारण का कारण अदृश्य स्वरूप है ॥३॥
जो अतिसूक्ष्म और इन्द्रियोंसे अग्राह्य है वह ब्रह्म ग्राह्य कैसे हो सकता है, उस सूक्ष्ममे चित्तकी वृत्ति किस प्रकार
हो सकती है, यह मुझे संदेह है इसी से बुद्धि व्यग्र है इसका उपाय आप वर्णन कीजिये ॥४॥
श्रीभगवानुवाच ।
श्रीशिवजी बोले- हे महाभुज रामचन्द्र! सुनो मै इस विषयमें उपाय कहता हूँ प्रथम सगुण उपासना करते २ चित्त को
एकाग्र करे और स्थूलसौरौंभिकान्यायसे निर्गुण स्वरूपमें चित्तकी वृत्ति प्रवृत्ते करे, स्थूलसौरौंभिकान्याय इसको कहते
हैं कि, प्रियमनुष्यको जिस प्रकार मृगजलं दिखाकर रवि यथार्थ जल है ऐसा प्रतारणासे बुलाकर फिर वास्तविक जल
दिखाते है, इसी प्रकार प्राणीको प्रथम साधनादि का उपदेश कर पीछे ब्रह्मज्ञान कथन करते है ॥५॥
और इस प्रकार जाने कि इस अन्नके पिंड स्थूल देह में जन्म मृत्यु व्याधि यही दृढतासे विद्यमान है, अर्थात्
निश्चयही इसकी दशा बदलती रहती है ॥६॥
ऐसे स्थूल देहमें प्राणोको अहंभावसे जो आत्मबुद्धि दृढ हो जाती है वह नही मिटती, आत्मा कभी जन्म नही लेता और
इसका नाश भी नही होता कारण कि यह नित्यै है ॥७॥
अब शरीरकी अवस्था वर्णन करते इसकी निस्सारता प्रतिपादन करते है । उत्पत्ति (होना) अस्ति, परिपक्वता, वृद्धि,
क्षय और नाश यह छः अवस्था इस शरीर की है ॥८॥
और घटमे स्थित आकाश जिस प्रकार निर्विकार है, इसी प्रकार इस देहमें आत्मा विकार रहित है, इस प्रकार देह और
आत्मा इन दोनोंके धर्म परस्पर विरुद्ध हैं, अज्ञानी जन अविद्यासे देहको आत्मा मानते हैं, और ज्ञानी देहसे आत्मा को
पृथक् देखते है ॥९॥
घड़ियामें गला करके डाले सुवर्णकी कान्तिके समान प्राणमय कोश है, यह स्थूल देह के अन्तर प्राणादि वायुसे बद्ध
वर्तमान है, परन्तु पाय्वादि इन्द्रियोंसे युक्त चलनादि कर्मोंसे युक्त क्षुधापिपासासे व्याप्त और जड होने के कारण यह
आत्मा नही है ॥१०॥११॥
आत्मा चैतन्यरूप है जिसके द्वारा यह जीव अपने शरीरको देखता है आत्माही परब्रह्म निर्लेप और सुखका सागर है ॥
१२॥
अज्ञान इस ब्रह्मका ग्रास नही कर सकता, न ब्रह्म किसी वस्तुका ग्रास करता है अर्थात् वह अनामय परिपुर्ण सर्वत्र
सुखस्वरूप है, उसे कार्य कारण की अपेक्षा नही है, उस प्राणमय कोशके अन्तर्गत मनोमयकोश है, वह संकल्प
विकल्परूप बुद्धि और इंद्रियोंसे समायुक्त है ॥१३॥
काम, क्रोध, लोभ, मोह मात्सर्य और मद यह शत्रुओंका षड्वर्ग और ममता इच्छादिक यह सम्पूर्ण मनोमयकोशके
धर्म है ॥१४॥
जो कर्मविषयीणी बुद्धि और वेदशास्त्र से निश्चित की गई है, वह ज्ञान इन्द्रियोके सहित विज्ञानमय कोशमें स्थित रहती
है ॥१५॥
इसमें कर्तृत्वपनका अभिमानी निःसन्देह वह जीव विद्यमान है । जो इस लोक तथा परलोकमें गमन करता है,
व्यवहारमें जिसको जीव कहते है ॥१६॥
आकाशादिके सात्त्विक अंशसे ज्ञानेन्द्रियोंकी उत्पत्ति होता है, आकाशसे श्रोत्र, पृथ्वीसे घ्राण, जलसे जिह्वा, और
तेजसे चक्षु और वायुसे त्वचा उत्पन्न होती है इस प्रकार यह इन्द्रिय पांचभौतिक है, जीवत्वप्राप्तिके तीन शरीर है,
स्थूल, सूक्ष्म और कारण, स्थूल का अन्त सूक्ष्म और सूक्ष्मका अन्तः कारणशरीर है, सूक्ष्म शरीरकोही लिंग शरीर
कहते है, इन तीनों शरीरोंमे पाँचकोश रहते हैं, अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय, स्थूल
शरीरमें अन्नमय कोश है, सूक्ष्म शरीरमें आनंदमय कोश है, इन पांचो कोशोंमें अन्नमयकोशसे वर्णन करके लिंग
शरीरके तीनों कोश कहकर लिंगशरीरके अवयवोंका वर्णन किया है ॥१७॥१८॥
इन पांचभूतोंके सात्विकादि अंशसे बुद्धि और मन उत्पन्न होते है, जिसमें बुद्धि निश्चयात्मिका और मन संशयात्मक है
और वचन हाथ, पाद, पायु, उपस्थ यह पांच कर्मेन्द्रिय तो आकाशादिकोंकें रजोगुण अंशसे क्रमपूर्वक उत्पन्न होते है
॥१९॥
और उन सबके रजोगुण समान मिलनेसे पांच प्राणादि वायु उत्पन्न होते है, यही पांच ज्ञानेन्द्रिय, पांच कर्मेन्द्रिय,
पांच प्राण, मन और बुद्धि मिलाकर सत्रह अवयवोंसे लिंग शरीरकी उत्पत्ति होती है ॥२०॥
यह लिंगशरीर तपाये हुए लोहखण्डकी समान गोल है, इस कारण परस्परके अध्यास पड़नेसे साक्षी चैतन्यसे युक्त है ॥
२१॥
जहा साक्षी चैतन्य लिंग शरीरसे अध्यासको प्राप्त होता है, वही आनंदमयकोश है, उस आनंदमयकोशका जो
कर्तृत्वपनका अभिमानी है, वही उपासना और कर्म फलसे इस लोक तथा परलोकमें कर्मफलका भोगनेवाला कहा जाता
है ॥२२॥
और जिस समय निद्रावस्थामें यही आत्मा लिंगशरीरके अध्यासको छोड़कर केवल अपने स्वरूपमें अविद्यासंयुक्त रहता
है, तब इसकी साक्षी संज्ञा है ॥२३॥
अन्तःकरणादि इन्द्रिय और इनकी वृत्ति अनुभव और स्मृति इनका द्रष्टा होनेसे अन्तःकरणका अध्यास होनेपर
आत्माको साक्षित्व और केवल (अन्तःकरणके अध्यास नहीं ऐसा) हुआ तब भोक्तृत्व होता है ॥२४॥
इसके उपरान्त "ऋत पिबतौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे । छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च
त्रिणाचिकेताः' इस श्रुतिको कहते है, आतप बिना आच्छादित बिंबरूप ईश्वर छाया- आच्छादित बिंबरूप जीव यह दोनो
ब्रह्मए प्रकाशसे प्रकाशित है, इन दोनोंमें एकजीव भोक्ता होनेसे कर्मफलको भोक्ता है और ईश्वर द्रष्टा होनेसे भुगाता
है ॥२५॥
क्षेत्रज्ञ जीवात्माको रथी, शरीरको रथ, बुद्धिको सारथी, मनको लगाम कहते है सो तू जाना ॥२६॥
इन्द्रियोको घोड़े स्वरूप जानना और यह इन्द्रियरूपी अश्व रूपादिविषयीरूपी स्थानमें विचरते है, इन्द्रिय और मनके
सहित यह आत्मा भोक्ता कहाता है वास्तवमें उपाधि बिना यह आत्मा शुद्ध है कदाचित कर्तृत्व भोक्तृत्वको प्राप्त नही
होता, तात्पर्य यही है कि रथी तो रथ में बैठा है, सारथी और घोड़े रथ को जिधर ले जाय उधर ही जाता है और यदि
दुष्ट घोड़े हुए तो सारथी का भी कहना न मानकर रथ लेकर कही गढे में डाल देते है, इसी प्रकार दुष्ट इन्द्रिये इस
शरीररूपी रथको विषयोंमें लेजाकर पटकती है, तब सब इन्द्रियोंके सहित आत्मा दुःखी प्रतीत होता है ॥२७॥
इस प्रकारसे जो ब्राह्मण शान्ति आदिसे युक्त होकर उपासना करता है वह जिस प्रकारसे कदलीके वल्कलको बराबर
उतारते चले जाओ तो उसमें वल्कलही निकलते है पश्चात सार प्राप्त होता है, इसी प्रकार पंचकोशमें क्रम से उपासना
करते और उनसे चित्त हटाते तथा उन्हे असाररूप जानते हुए सबके अन्तःसारभूत आत्मा को प्राप्त होता है ॥२८॥२९॥
इस प्रकार मन को सावधान करके पंचकोश का ज्ञान करके जो मन स्थिर करता है, तब उसका चित्त निराकार
परमात्मामें लग जाता है ॥३०॥
तब यह मन केवल परमात्माको ही ग्रहण करता है जो केवल अदृश्य, अग्राह्य, स्थूल सूक्ष्मादि धर्म से परे है, उसमें
प्राप्त होकर निश्चल हो जाता है, फिर चलायमान नही होता ॥३१॥
श्रीराम उवाच ॥
श्रीरामचन्द्र बोल-हे भगवन्! जब श्रवणादि साधनद्वारा आत्मस्वरूपकी प्राप्ति हो जाती है तो वेदशास्त्रके जाननेवाले
यज्ञशील सत्यवादी उसके श्रवण करनेमें प्रवृत्त क्यों नही होते ॥३२॥
और कोई सुनकर भी आत्माको जान नही सकते, और कोई जानकर भी मिथ्या मानते है, क्या यह तुम्हारी माया है
॥३३॥
श्रीभगवानुवाच ।
श्रीशिवजी बोले, हे महाबाहो! यह ऐसेही है इसमें कुछ सन्देह नही, मेरी त्रिगुणात्मिका मायाका उल्लंघन करना महा
कठिन है ॥३४॥
जो मेरी शरणागत आकर मुझको प्राप्त हो जाते है वे ही इस माया को तरते है, हे महाभुज! जो अभ्यभक्त है और
जिनकी श्रद्धा मेरे विषय नहीं है ॥३५॥
वे इस लोक और परलोकमें अनेक प्रकारके फलकी इच्छा करनेवाले है उनको कर्मानुसार फल मिलता है वे सुख भोगकर
भी थोड़े कालमें इस लोक में प्राप्त होते है, कारण कि, उन्हे तो कर्मफलही इष्ट है और कर्मफल क्षय होनेवाला है तथा
थोडा और ऐसे लोकोंमें उन फलोंको भोगते है जहां जहां अल्पसुख है और शीघ्र नष्ट हो जाता है ॥३६॥
इस बातको न जानकर जो अधम मनुष्य कर्मों को करते है, वे माताके गर्भमें उत्पन्न होकर बारंबार मृत्यु मुखमें पडते
है ॥३७॥
अनेक प्रकार की योनियोंमें उत्पन्न हुए किसी एक प्राणीकी करोडों जन्मके संचित किये पुण्यसे मेरे विषे भक्ति होती है
॥३८॥
वही श्रद्धायुक्त मेरा भक्त ज्ञान को प्राप्त होता है और दूसरा करोडों जन्मभी कर्म करनेसे मुझे प्राप्त नही होता ॥३९॥
इस कारण हे राम! और सब त्यागकर केवल मेरी भक्ति करो । दुसरे और सब धर्मोका त्यागन करके एक मेरी शरणमें
हो मै तुमको सब पापोसे छुड़ाकर मुक्त कर दूँगा तुम सोच कुछ मंत करो ॥४०॥