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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 356 में से

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पृष्ठ 82

46 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे
अस्थियों के संघात चौदह हैं। एक गुल्फ (एड़ी के ऊपर
की गाँठ, टखना का घुट्टी) में, एक जानु में और एक वंक्षण
(पेड़ू और जाँघ के बीच का भाग, ऊरुसंधि) में, इसी प्रकार
दूसरी सक्थि (टाँग) में तथा दोनों बाहुओं में और एक-एक
शिर तथा त्रिकास्थि में होते हैं।
सीमन्त-परिचय
(सङ्घाताः सीविता यैस्तु सीमन्तास्ते प्रकीर्तिताः ।। 74 ।।
चतुर्दशैव सीमन्ताः कथिता मुनिपुङ्गवैः।)
सीमन्त भी चौदह होते हैं और उनकी गणना अस्थि-संघात
के ही समान होती है, क्योंकि जिनके संघात सीवित (सिये
गये) हैं, वे सीमन्त कहे जाते हैं।
जिह्वा-परिचय
(उदरे पच्यमानानामाध्मानाद् रुक्मसारवत् ।। 75 ।।
कफशोणितमांसानां सारो जिह्वा प्रजायते।)
जिस प्रकार सुवर्ण को तपाने से स्वर्ण का सार भाग ही
बच जाता है, इसी प्रकार शरीर की उष्णता से उदर में पकते
हुये कफ, रक्त एवं मांस का सारभूत पदार्थ 'जीभ' बनती है।
हृदय-परिचय
(उरसि स्तनयोर्मध्ये रक्तश्लेष्मप्रसादजम् ।। 76 ।।
मुकुलं पुण्डरीकेण सदृशं स्यादधोमुखम्।)
हृदयं चेतनास्थानमोजसश्चाश्रयो मतम् ।। 77 ।।
(जाग्रतस्तद् विकसति स्वपतश्च निमीलति ।
यतो व्यानप्रणुन्नेन शुद्धरक्तेन जन्तवः ।। 78 ।।
प्रीणिता वर्तयन्तीह यावज्जीवनसंस्थितिः।)
'हृदय' नामक अवयव उरस् या वक्षस् के भीतर स्तनों
(फुप्फुसों) के बीच में स्थित है, जो शरीर-निर्माण के समय
रक्त तथा श्लेष्मा के प्रसाद या सारभाग से उत्पन्न होता है,
मुकुल (अविकसित या न खिले) कमल के समान उसकी
आकृति होती है, उसका मुख नीचे की ओर होता है, वह
'चेतना' का प्रधान स्थान है और 'ओजस्' का आश्रय है।
जब प्राणी जागता रहता है, तब वह खिला रहता है और जब
प्राणी सोया रहता है, तब वह संकुचित रहता है तथा वहीं से
व्यान वायु द्वारा प्रेरित किये हुये शुद्ध रक्त से प्रीणित या तृप्त
किये हुये जन्तु जीवन-पर्यन्त जीवित रहते हैं।
वक्तव्य—यह रक्त रस-मिश्रित होता है, अतः रक्त से
अथवा रस से इन दोनों से शरीर का तर्पण या प्रीणन होता
रहता है।


फुप्फुसादि का स्थान
तद्वामे फुप्फुसप्लीहौ दक्षिणाङ्गे यकृत् तिलम् ।। 79 ।।
हृदय के बाईं ओर फुप्फुस तथा प्लीहा और दाहिनी ओर
यकृत् एवं तिल की स्थिति है।
फुप्फुस-परिचय
(उरो मध्यगतश्चापि श्वासोच्छ्वासप्रसाधनः ।
·रक्तफेनभवो ज्ञेयः फेनवद् बहुकोष्ठकः ।। 80 ।।)
उदानवायोराधारः फुप्फुसः प्रोच्यते बुधैः ।
'फुप्फुस' या फेफड़ा वक्षस् के भीतर रहता है यह
श्वास-उच्छ्वास क्रिया का साधक है। गर्भाशय में शरीर-निर्माण
के समय यह रक्त की झाग से उत्पन्न होता है। इसलिये उसमें
फेन के समान ही अनन्त कोष्ठ होते हैं और विद्वान् लोग उसे
उदानवायु का आधार मानते हैं।
वक्तव्य-सुश्रुत ने दो भागों में विभक्त होने पर भी
'फुप्फुस' को एक ही माना है, किन्तु महर्षि चरक ने 'द्वौ
श्लेष्मभुवौ' (च० शा० अ० 7) दो फुप्फुस माने हैं। इसका
कारण मात्र दृष्टिकोण का भेद है।
प्लीहा-परिचय
(शोणिताच्च समुत्पन्ना रसरञ्जनतत्परा ।। 81 ।।)
रक्तवाहिसिरामूलं प्लीहाख्याता महर्षिभिः ।
शरीरोत्पत्ति के समय प्लीहा रक्त से उत्पन्न होता है और
सदैव रस को रक्त बनाने में तत्पर रहती है। इसलिये महर्षियों
ने उसे रक्तवाही सिराओं का मूल माना है।
यकृत्-परिचय
(शोणिताच्च समुत्पन्नं रसरञ्जनतत्परम् ।। 82 ।।)
यकृद् रञ्जकपित्तस्य स्थानं रक्तस्य संश्रयः ।
यकृत् गर्भोत्पत्ति के समय रक्त से उत्पन्न होता है और
रस को रंगकर रक्त बनाने में तत्पर रहता है, क्योंकि वह
रंजकपित्त का स्थान है और इसलिये वह रक्त का आश्रय
माना जाता है।
वक्तव्य-'शोणितवहानां स्रोतसां यकृन्मूलं प्लीहा च'।
देखें-च० वि० अ० 5। तथा 'स खलु आप्यो रसो यकृत्-
प्लीहानौ प्राप्य रागमपुपैति' । देखें-सु० सू० अ० 14।
क्लोम-परिचय
(रक्तानिलात्समुत्पन्नं कालीयकमिति स्मृतम् ।। 83 ।।)
जलवाहिसिरामूलं तृष्णाच्छादनकं तिलम् ।