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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 356 में से

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पृष्ठ 76

40 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे
कर्म-गर्भ की उत्पत्ति करना है। इस प्रकार सातों धातुओं के
सात मुख्य कर्म कह दिये हैं।
रस-स्वरूप
( सम्यक् पक्वस्य भुक्तस्य सारो निगदितो रसः।
स तु द्रवः सितः शीतः स्वादुः स्निग्धश्चलो भवेत्।। 18।।)
भली-भाँति पचे हुये आहार का सारभूत भाग 'रस'
कहलाता है और वह द्रव (पतला), श्वेत, शीत, मधुर, स्निग्ध
और चल अर्थात् सदा चलनशील होता है।
रक्त का स्वरूप
( यदा रसो यकृद् याति तत्र रञ्जकपित्ततः।
रागं पाकं च सम्प्राप्य स भवेद् रक्तसंज्ञकः ।। 19 ।।)
जब रस यकृत् एवं प्लीहा में पहुँचता है, तो वहाँ रंजक
पित्त द्वारा राग (लालिमा) तथा पाक को प्राप्त होकर वह रस
'रक्त' बन जाता है।
मांस का स्वरूप
( शोणितं स्वाग्निना पक्वं वायुना च घनीकृतम्।
तदेव मांसं जानीयात् पेशीरूपेण संस्थितम् ।। 20 ।।)
रक्त अपनी अग्नि द्वारा परिपक्व (होकर) तथा वायु
द्वारा घनीभूत हो जाता है, उसी को 'मांस' जानना चाहिये
और वह शरीर में पेशी के रूप में रहता है।
मेदस् का स्वरूप
( यन्मांसं स्वाग्निना पक्वं तन्मेद इति कथ्यते।
तदतीव गुरु स्निग्धं बलकार्यतिबृंहणम् ।। 21 ।।)
जो मांस अपनी अग्नि द्वारा परिपक्व हो जाता है, वह
'मेदस्' कहलाता है। वह अत्यन्त गुरु, स्निग्ध, बलकारक
एवं शरीर का अत्यन्त वर्द्धक होता है।
अस्थि का स्वरूप
( मेदो यत्स्वाग्निना पक्वं वायुना चातिशोषितम्।
तदस्थि संज्ञां लभते स सारः सर्वविग्रहे ।। 22 ।।)
जो मेदस् अपनी अग्नि द्वारा परिपक्व हो जाता है और
वायु द्वारा अत्यन्त सुखा दिया जाता है। वह 'अस्थि' संज्ञा को
प्राप्त करता है। ये अस्थियाँ सम्पूर्ण शरीर में सार-स्वरूप हैं।
मज्जा का स्वरूप
( अस्थि यत्स्वाग्निना पक्वं तस्य सारो भवेद् घनः।
यः स्वेदवत् पृथग्भूतः स मज्जेत्यभिधीयते ।। 23 ।।)
जो अस्थि अपनी अग्नि द्वारा परिपक्व हो जाता है और
उसका सार स्वेद के समान पृथक् होकर गाढ़ा हो जाता है,
वह 'मज्जा' कहा जाता है।
शुक्र का स्वरूप
( मज्जातो जायते शुक्रं तस्य व्यक्तिस्तु यौवने।
स्फटिकाभं द्रवं स्निग्धं मधुरं मधुगन्धि च।। 24 ।।
शुक्रमिच्छन्ति केचित्तु तैलक्षौद्रनिभं तथा।)
मज्जा से शुक्र की उत्पत्ति होती है और उसकी व्यक्ति
(दर्शन) युवावस्था में होती है तथा वह स्फटिक (बिल्लौर)
के समान उज्ज्वल श्वेत, द्रव (तरल), चिकना, मीठा, मधु
की-सी गन्ध वाला होता है। कुछ आचार्यों का कथन है कि
तैल तथा मधु जैसा शुक्र भी उत्तम होता है।
सप्त धातुओं के मल
जिह्वानेत्रकपोलानां जलं पित्तं च रञ्जकम्।। 25 ।।
कर्णविड्रसनादन्तकक्षामेढ्रादिजं मलम्।
नखनेत्रमलं वक्त्रे स्निग्धत्वं पिटिकास्तथा ।। 26 ।।
जायन्ते सप्तधातूनां मलान्येवमनुक्रमात् ।
जीभ, नेत्र और कपोल (गाल का भीतरी भाग) का जल
रस धातु का मल है; रञ्जक पित्त (रस को रंगकर रक्त रूप में
परिणत करने वाला) रक्त धातु का मल है; कान का मैल
मांस धातु का मल है; जीभ, दाँत, काँख एवं लिंग आदि में
उत्पन्न होने वाला मैल मेदो धातु का मल है; नाखून अस्थि
धातु का मल है; नेत्र का मैल मज्जा धातु का मल है और मुख
पर की चिकनाई तथा युवान् पिडिका (जो प्रायः जवानी में
मुख निकला करती हैं, जिन्हें कील या मुँहासे कहा जाता है)
शुक्र धातु का मल है। इसी प्रकार सातों धातुओं के ये सात
मल उत्पन्न होते हैं।
धातुमलों का परिगणन
कफः पित्तं मलं खेषु प्रस्वेदो नखरोम च ।। 27 ।।
नेत्रविट् त्वक्षु च स्नेहो धातूनां क्रमशो मलाः।
कफ, पित्त, स्रोतों का मल, पसीना, नख, रोम, नेत्रों की
मैल और त्वचा का स्नेह-ये क्रमशः सातों धातुओं के मल हैं।
वक्तव्य-आचार्य शार्ङ्गधर ने मल-सम्बन्धी दोनों मत
प्रदर्शित किये हैं। देखें-च० चि० 15.18-19।
उपधातु
स्तन्यं रजश्च नारीणां काले भवति गच्छति ।। 28 ।।
शुद्धमांसभवः स्नेहः सा वसा परिकीर्तिता।