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सर्वकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 269, कुल 356 में से

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पृष्ठ 269

पञ्चमोऽध्यायः ] स्नेहवस्तिविधिः 233
वस्ति देते समय जँभाई लेना, खाँसना अथवा छींकना उचित
नहीं है। रोगी को यह बात पहले ही समझा देनी चाहिये।
वस्ति-प्रयोग में काल-निर्देश
त्रिंशन्मात्रामितः कालः प्रोक्तो वस्तेस्तु पीडने।
ततः प्रणिहितः स्नेह उत्तानो वाक्शतं भवेत् ।। 27 ।।
वस्ति के पीडन में तीस मात्रा (करीब 1 मिनट) परिमित
समय लगना चाहिये। इसके पश्चात् नेत्र को धीरे से निकाल
लें और रोगी स्नेह को पचाने के लिए उत्तान (चित्त) होकर
सौ वाक् परिमित समय तक लेटा रहे।
मात्रा-काल-प्रमाण
जानुमण्डलमावेष्ट्य कुर्याच्छोटिकया युतम्।
एका मात्रा भवेदेषा सर्वत्रैष विनिश्चयः ।। 28 ।।
वाक् अथवा मात्रा का परिमाण इस प्रकार है-जानु
(घुटना) के सब ओर हाथ घुमाकर चुटकी बजाने में जितना
समय लगता है, उतने समय का नाम 'मात्रा' है। यही सभी
स्थानों में निश्चय माना जाता है।
वस्ति-प्रयोग में पश्चात् कर्म
प्रसारितैः सर्वगात्रैर्यथावीर्य विसर्पति।
ताडयेत् तलयोरेनं त्रीन् वारांश्च शनैः शनैः ।। 29 ।।
स्फिचोश्चैवं ततः श्रोणीं शय्यां चैवोत्क्षिपेत् ततः।
जाते विधाने तु ततः कुर्यान्निद्रां यथासुखम् ।। 30 ।।
गात्रों (हाथ-पाँवों) को पसार कर लेटने से स्नेह का
सार यथावत् शरीर में फैल जाता है और इस रोगा के तलुवों
पर तथा स्फिचों (चूतड़ों) तथा कमर पर तीन बार धीरे-धीरे
ताड़न करना चाहिये तथा उसकी शय्या (पलंग) को उठाकर
(भूमि से एक हाथ भर) फेंकना चाहिये (इस क्रिया से स्नेह
शीघ्र नहीं, अपितु विलम्ब से निकलता है)। इस विधान के
पूर्ण हो जाने पर सुखपूर्वक सो जाना चाहिये।
सम्यक् अनुवासित के लक्षण
सानिलः सपुरीषश्च स्नेहः प्रत्येति यस्य वै।
उपद्रवं विना शीघ्रं स सम्यगनुवासितः ।। 31 ।।
जिस मनुष्य का स्नेह वायु (अपानवायु) तथा पुरीष को
साथ लिये हुये शीघ्र (8-9 घण्टा के भीतर) ही लौट आता है
और जिसमें कोई उपद्रव भी उत्पन्न न हुआ हो, वह
'सम्यक्-अनुवासित' समझा जाता है। अर्थात् उसको उचित
अनुवासन हुआ है, ऐसा समझ लेना चाहिये।
वक्तव्य-इसके उपद्रवों का वर्णन इसी अध्याय के 43वें


श्लोक में देखें और उन उपद्रवों की शान्ति का उपाय भी हीं
दिया है।
वस्ति के पश्चात् पथ्य
जीर्णान्नमथ सायाह्ने स्नेहे प्रत्यागते पुनः।
लघ्वन्नं भोजयेत् कामं दीप्ताग्निस्तु नरो यदि ।। 32 ।।
जीर्णान्न (जिसका भोजन पच चुका है) मनुष्य को स्नेह
के लौट आने पर सायंकाल लघु (हल्का) भोजन इच्छापूर्वक
खिलाना चाहिये, यदि उसकी जठराग्नि दीप्त हो तो, अन्यथा
नहीं खिलाना चाहिये अथवा बहुत थोड़ा खिलाना चाहिये।
अनुवासन की व्यापत्ति की चिकित्सा
अनुवासिताय दातव्यमितरेऽह्नि सुखोदकम्।
धान्यशुण्ठीकषायो वा स्नेहव्यापत्तिनाशनम् ।। 33 ।।
अनुवासित (जिसको अनुवासन दिया गया है) मनुष्य
को दूसरे दिन उष्ण जल अथवा धनियाँ तथा सोंठ का क्वाथ
देना चाहिये, इससे स्नेह की व्यापत्ति (विकृति) का विनाश
हो जाता है और अग्नि दीप्त तथा भोजन में रुचि हो जाती है।
उष्णोदक के गुण - उष्ण जल मनुष्य के अनुवासन-
वस्ति द्वारा दिये गये स्नेह के अनपच को पचाता है, कफ का
भेदन करता है और वायु का अनुलोमन करता है। इसलिये
वमन, विरेचन, निरूहण तथा अनुवासन में वायु तथा कफ
की शान्ति के लिए उष्ण जल देना चाहिये।
धान्यशुण्ठी जल का गुण- 'एकान्तरोपयोगेन
धान्यशुण्ठीजलं पिबेत्। तेनास्य दीप्यते वह्निर्भक्ताकाङ्क्षा
च जायते'। अर्थात् अनुवासन के एक दिन पश्चात् धनियाँ
तथा सोंठ द्वारा परिपक्व जल पीना चाहिये, उसे पीने से अग्नि
दीप्त हो जाती है और भोजन में रुचि होने लगती है।
स्नेह वस्ति के साथ निरूहण-वस्ति
अनेन विधिना सप्त चाष्टौ वाथ नवापि वा।
विधेया बस्तयस्तेषामन्तरा तु निरूहणम् ।। 34 ।।
उक्त विधि से सात आठ अथवा नौ वस्तियाँ देनी चाहिये
और उनके बीच-बीच में निरूहण वस्ति भी देते जाना चाहिये।
वक्तव्य-अनुवासन-वस्ति के स्नेहन और निरूहण-
वस्ति से शोधन होता है। चिकित्सा में सफलता पाने के लिए
इन दोनों का प्रयोग अत्यन्त आवश्यक है।
वस्तियों के फल
दत्तस्तु प्रथमो वस्तिः स्नेहयेद् वस्तिवङ्क्षणौ।
सम्यग्दत्तो द्वितीयस्तु मूर्धस्थमनिलं जयेत् ।। 35 ।।