शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 266, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽध्यायः
स्नेहवस्तिविधिः
वस्तियों के दो भेद
वस्तिर्द्विधाऽनुवासाख्यो निरूहश्च ततः परम्।
वस्तिभिर्दीयते यस्मात् तस्माद् वस्तिरिति स्मृतः।।1।।
वस्ति दो प्रकार की होती हैं-1. अनुवासन और 2
निरूहण। क्योंकि यह 'वस्ति' द्वारा दी जाती है, इसलिये इसे
'वस्ति' कहते हैं। देखें-च० सि० अ० 3।
वक्तव्य-बूढ़ी गाय, भैंस, सूअर, बकरा तथा भेड़ा की
वस्ति या मूत्राशय ही इस उपकरण या यन्त्र में प्रधान होता है,
अतः इसे 'वस्ति' कहा जाता है। 'अनुवसन्नपि न दुष्यति,
अनुदिवसं वा दीयते इति अनुवासनः'। तथा 'स
दोषनिर्हरणात् शरीररोगहरणाद्वा निरूहः'।-सु० चि० अ०
35.18 के अनुसार इसके दो नाम रखे गये हैं।
वस्ति का एक नाम 'पिचकारी' भी है। इससे गुद, भग
तथा मूत्रमार्ग में द्रव औषध पहुँचायी जाती है। यद्यपि शरीर
के अन्यान्य स्रोतों में तथा सिराओं में इंजेक्शन द्वारा औषधि
पहुँचाने के साधन को भी वस्ति कहा जा सकता है, तथापि
अगले तीन अध्यायों में उपर्युक्त तीन स्थानों में ही वस्ति देने
का विधान लिखा गया है। चरकसंहिता तथा सुश्रुतसंहिता में
चिकित्सा की दृष्टि से वस्ति की भूरि-भूरि प्रशंसा की गयी
है। देखें-च० सि० अ० 1.40 तथा सु० चि० 35.13। आधुनिक
भारतीय आयुर्वेद की प्रणाली के चिकित्सक प्रायः वस्ति
कर्म का परित्याग कर बैठे हैं। हमारा विचार है कि वे इस
कर्म को पुनः अपनायें और यशस्वी बनें।
वस्तियों के लक्षण
यः स्नेहौर्दीयते सः स्यादनुवासननामकः।
कषायक्षारतैलैर्यो निरूहः स निगद्यते।।2।।
जो वस्ति स्नेहों द्वारा दी जाती है, वह 'अनुवासन' तथा
जो कषाय (क्वाथ आदि), क्षार (सोडा आदि) तथा तैल को
मिलाकर दी जाती है, वह 'निरूह' कहलाती है।
वक्तव्य-उक्त दोनों ही वस्तियाँ एक ही प्रकार के यन्त्र
द्वारा दी जाती हैं। अन्तर केवल प्रयुक्त किये जाने वाले द्रव्यों
का है। उक्त 'कषायक्षीरतैलैः' इस पाठ में 'क्षीर' के स्थान में
'क्षार' पाठ अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है, क्योंकि सुश्रुत में
निरूहवस्ति को शोधन तथा लेखनकारक कहा है। देखें-'सु०
चि० अ० 35। उक्त दोनों गुण 'क्षार' में ही होते हैं, 'क्षीर'
(दूध) में नहीं। आजकल निरूहवस्ति साबुन के पानी से दी
जाती है, जो क्षार तथा तैल का मिश्रण है।
वस्ति-क्रम का निर्देश
तत्रानुवासनाख्यो हि वस्तिरर्यः सोऽत्र कथ्यते।
पूर्वमेव ततो वस्तिर्निरूहाख्यो भविष्यति।।3।।
निरूहादुत्तरञ्चैव वस्तिः स्यादुत्तराभिधः।
उक्त दोनों प्रकार की वस्तियों में से यहाँ पर पहिले
'अनुवासन-वस्ति' का वर्णन किया जाता है। इसके पश्चात्
'निरूहण-वस्ति' का वर्णन किया जायेगा और निरूह के
पश्चात् 'उत्तर' नामक वस्ति का वर्णन किया जायेगा।
अनुवासन का भेद मात्रावस्ति
अनुवासनभेदश्च मात्रावस्तिरुदीरितः।।4।।
पलद्वयं तस्य मात्रा तस्मादर्धापि वा भवेत्।
अनुवासन वस्ति का भेद या विकल्प 'मात्रावस्ति' नाम
से पुकारा जाता है। इसकी मात्रा दो पल (8 तोला) अथवा
इससे भी आधी अर्थात् एक पल (4 तोला) की होती है।
वक्तव्य-अनुवासन तथा मात्रावस्ति में केवल स्नेह की
मात्रा का अन्तर है। देखें-शा० सं०, उ० ख० अ० 5 श्लोक
20 और सु० चि० अ० 35 में मात्रावस्ति परिचय। इसमें
किसी प्रकार के परहेज की आवश्यकता नहीं होता है और
मात्रावस्ति के लिये ही लिखा गया है 'अनुदिवसं वा दीयते'।
अर्थात् यह प्रतिदिन भी दी जा सकती है।