शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 264, कुल 356 में से
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(टांग) तथा उदर की पीड़ा को जीतता है। निरन्तर (बहुत
दिनों या वर्षों तक) सेवन करने से पलित (युवावस्था में
बालों का सफेद हो जाना) का विनाश होता है। ये
'अभयामोदक' उत्तम रसायन माने जाते हैं।
विरेचन-काल में कर्तव्य
पीत्वा विरेचनं शीतजलैः संसिच्य चक्षुषी ।। 34 ।।
सुगन्धिं किञ्चिदाघ्राय ताम्बूलं शीलयेन्नरः ।
निवातस्थो न वेगांश्च धारयेन्न स्वपेत् तथा ।। 35 ।।
शीताम्बु न स्पृशेत् क्वापि कोष्णानीरं पिबेन्मुहुः ।
विरेचन (दस्तावर) औषधि को पीकर आँखों के शीतल
जल से सींचकर तथा किसी सुगन्धित पदार्थ (इत्र आदि) को
सूंघकर उत्तम ताम्बूल का सेवन करना चाहिये, जिसमें अधिक
वायु न लगे ऐसे स्थान में बैठना चाहिये, विरेचन के वेगों को
रोकना नहीं चाहिये, इसमें सोना उचित नहीं, किसी भी कार्य
में शीतल जल का प्रयोग नहीं करना चाहिये और बार-बार
गुनगुना जल पीना चाहिये।
सम्यग् विरेचन का लक्षण
बलासौषधपित्तानि वायुर्वान्ते यथा व्रजेत् ।। 36 ।।
रेकात् तथा मलं पित्तं भेषजं च कफो व्रजेत्।
जैसे वमन में क्रमशः कफ, औषध (जो वमन करने के
लिए पी गयी थी), पित्त तथा वायु निकलती है, उसी प्रकार
विरेचन में मल (पुरीष) पित्त, औषधि तथा कफ निकलता
है।
दुर्विरिक्त का लक्षण
दुर्विरिक्तस्य नाभेस्तु स्तब्धत्वं कुक्षिशूलता ।। 37 ।।
पुरीषवातसङ्गश्च कण्डूमण्डलगौरवाः ।
विदाहोऽरुचिराध्मानं भ्रमश्छर्दिंश्च जायते ।। 38 ।।
दुर्विरिक्त (जिसको भली-भाँति विरेचन नहीं हुआ है)
मनुष्य का नाभि में स्तब्धता (कड़ापन), उदर में शूल, मल
तथा वायु (अपानवायु) की रुकावट, खुजली, शीतपित्त,
शरीर में भारीपन, दाह, अरुचि, आध्मान, भ्रम तथा कै हो
जाता है।
दुर्विरिक्त की चिकित्सा
तं पुनः पाचनैः स्नेहैः पक्त्वा संस्नेह्य रेचयेत् ।
तेनास्योपद्रवा यान्ति दीप्ताऽग्नेर्लघुता भवेत् ।। 39 ।।
जिसे उत्तम विरेचन नहीं हुआ हो, उसे फिर पाचन क्रिया
द्वारा पकाकर और स्नेहों द्वारा स्निग्ध कर विरेचन कराना
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चाहिये। इससे उसके उपद्रव शान्त हो जाते हैं, अग्नि दीप्त
तथा शरीर में हल्कापन हो जाता है।
अति विरेचन के उपद्रव
विरेकस्यातियोगेन मूर्च्छा भ्रंशो गुदस्य च।
शूलं कफातियोगः स्यान्मांसाधावनसन्निभम् ।। 40 ।।
मेदोनिभं जलाभासं रक्तं वापि विरिच्यते।
विरेचन के अतियोग अर्थात् अधिक होने से मूर्च्छा,
गुदभ्रंश (काँच निकलना), उदर में शूल, कफ की अतिप्रवृत्ति
और मांस के धोअन जैसा, मेदा जैसा अथवा जल जैसा
विरेचन होता है, अथवा रक्त भी निकलने लगता है।
विरेकातियोग में कर्तव्य
तस्य शीताम्बुभिः सिक्त्वा शरीरं तण्डुलाम्बुभिः ।। 41 ।।
मधुमिश्रैस्तथा शीतैः कारयेद् वमनं मृदु।
सहकारत्वचः कल्को दध्ना सौवीरकेण वा ।। 42 ।।
पिष्ट्वा नाभिप्रलेपेन हन्त्यतीसारमुल्बणम्।
अजाक्षीरं रसं वापि वैष्किरं हारिणं तथा ।। 43 ।।
शालिभिः षष्टिकैः स्वल्पं मसूरैर्वापि भोजयेत्।
शीतैः सङ्ग्राहिभिर्द्रव्यैः कुर्यात् सङ्ग्रहणं भिषक् ।। 44 ।।
जिसको विरेचन का अतियोग हुआ है, उसके शरीर पर
शीतल जल के छींटें देकर मधु-मिश्रित तण्डुलाम्बु (चावलों
का धोअन) द्वारा साधारण-सी वमन करवा देनी चाहिये।
आम (आम के वृक्ष) की छाल को दही अथवा काँजी के
साथ पीसकर कल्क बनाये और यह कल्क नाभि (उदर पर)
लेप करने से बढ़े हुये अतिसार को नष्ट करता है। बकरी का
दूध अथवा बकरी के मांस का रस (शोरबा) अथवा विष्किर
(बिखेर कर खाने वाले मोर, मुरगा आदि) पक्षियों अथवा
हरिण के मांस का रस, शाली के चावल अथवा साठी के
चावलों के साथ अथवा मसूर की दाल के साथ थोड़ा-सा
खिलाना चाहिये। इतना करने पर यदि अतिसार (दस्त) न
रुक सके तो चिकित्सक शीतल तथा संग्राही द्रव्यों द्वारा
संग्रहण करायें, अर्थात् दस्तों को रोकने का प्रयत्न करें।
सुविरिक्त के लक्षण
लाघवे मनसस्तुष्टावनुलोमे गतेऽनिले।
सुविरिक्तं नरं ज्ञात्वा पाचनं पाययेन्निशि ।। 45 ।।
शरीर में हल्कापन, मन की प्रसन्नता तथा वायु के अनुलोम
(स्वमार्गगामी) हो जाने पर मनुष्य को 'सुविरिक्त' जानकर
रात्रि में पाचन (पाचक औषधियों के चूर्ण तथा फाण्ट आदि)