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सर्वकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 248, कुल 356 में से

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पृष्ठ 248

212 शार्ङ्गधरसंहिता [ उत्तरखण्डे

आप ध्यान दें, कोई भी वस्तु प्रारम्भ में अपना प्रभाव पूर्णरूप
से दिखलाती है, तत्पश्चात् वह अनुकूल हो जाता है।
स्नेह की मात्रायें
दोषकालाग्निवयसां बलं दृष्ट्वा प्रयोजयेत्।।4।।
हीनां च मध्यमां ज्येष्ठां मात्रां स्नेहस्य बुद्धिमान्।
विद्वान् चिकित्सक वातादि दोषों, शीत-उष्ण आदि काल,
मन्द-तीक्ष्ण आदि जठराग्नि की शक्ति तथा बाल्य आदि वय
के बल को देखकर घृत, तैल आदि स्नेह की हीन, मध्यम
तथा उत्तम मात्रा का रोगियों पर प्रयोग करें।
विधिहीन स्नेहपान के दोष
अमात्रया तथाऽकाले मिथ्याहारविहारतः।।5।।
(कण्डूकुष्ठज्वरोत्क्लेशशूलानाहभ्रमादिकान् ।)
स्नेहः करोति शोफार्शस्तन्द्रानिद्राविसंज्ञताः।।6।।
अनुचित मात्रा से, अनुचित काल में तथा मिथ्या
(अहितकर) आहार-विहार करने से स्नेहपान सूजन, बवासीर,
तन्द्रा, निद्रा, विसंज्ञता (मोह अथवा मूर्च्छा), खुजली, कुष्ठ,
ज्वर, उत्क्लेश (मिचली), शूल, आनाह तथा भ्रम आदि
रोगों को उत्पन्न कर देता है।
दोषशान्ति के उपाय
प्रकुर्याल्लङ्घनं तत्र स्वेदं ज्ञात्वा विरेचनम्।
यदि स्नेहपान से उक्त उपद्रव उत्पन्न हो जाये तो लंघन
तथा स्वेदन अथवा आवश्यकतानुसार विरेचन कराना चाहिये।
स्नेह-मात्रा-विचार
देया दीप्ताग्नये मात्रा स्नेहस्य पलसम्मिता।।7।।
मध्यमाय त्रिकर्षा स्याज्जघन्याय द्विकार्षिकी।
तीक्ष्ण जठराग्नि वाले मनुष्य के लिए स्नेह की मात्रा एक
पल (चार तोला), मध्यम कोटि के मनुष्य के लिए तीन कर्ष
(3 तोला) तथा जघन्य (दुर्बल) मनुष्य के लिए 2 कर्ष (2
तोला) देना चाहिये।
वक्तव्य-स्नेह मात्रा के परिमाण में रोग एवं रोगी की
परिस्थिति के अनुसार चिकित्सक न्यूनाधिकता कर सकता
है।
अन्य प्रकार से मात्रा का निश्चय
अथवा स्नेहमात्राः स्युस्तिस्रोऽन्याः सर्वसम्मताः।।8।।
अहोरात्रेण महती जीर्यत्यह्नि तु मध्यमा।
जीर्यत्यल्पा दिनार्धेण सा विज्ञेया सुखप्रवहा।।9।।

अथवा स्नेह की तीन मात्रा और भी मानी जाती हैं, जो
सर्वसम्मत है। यथा-1. महती या उत्तम मात्रा, जो दिन-रात
(चौबीस घंटे) में पचती है। 2. मध्यमा मात्रा, जो दिन या
रात (4 पहर या 12 घंटे) में पचती है और 3. अल्पा मात्रा,
जो आधे दिन (2 पहर या 6 घंटा) में पचती है, अतः यह
अल्पा मात्रा सुखदायिनी मानी जाती है।
वक्तव्य-वास्तव में स्नेहमात्रा का निश्चय तौल की अपेक्षा
पाचन काल से करना अधिक उपयुक्त है।
मात्राओं के गुण
अल्पा स्याद्दीेपनी वृष्या स्वल्पदोषेषु पूजिता।
मध्यमा स्नेहनी ज्ञेया बृंहणी भ्रमहारिणी।।10।।
ज्येष्ठा कुष्ठविषोन्मादग्रहापस्मारनाशिनी।
अल्पा मात्रा अग्नि को दीप्त रखने लिए, वीर्य को बढ़ाने
के लिए तथा दुर्बल दोषों वाले मनुष्य के लिए मध्यमा मात्रा
कोष्ठ अथवा सम्पूर्ण शरीर स्निग्ध करने के लिए, धातुओं को
बढ़ाने के लिए एवं भ्रमरोग को हरने के लिए और ज्येष्ठा या
महती मात्रा कुष्ठ, विष, उन्माद, ग्रहदोष (आदि का आवेश)
तथा अपस्मार को नष्ट करने के लिए प्रयुक्त की जाती है।
दोष-भेद से स्नेह का विधान
केवलं पैत्तिके सर्पिर्वातिके लवणान्वितम्।।11।।
पेयं बहुकफे चापि व्योषक्षारसमन्वितम्।
पित्तजनित रोगों में केवल घृत, वातजनित रोगों में सेंधा
नमक मिला हुआ घृत तथा कफाधिक रोगों में त्रिकटु तथा
जौखार मिलाकर घृत पीना चाहिये।
घृतपान के योग्य व्यक्ति
रूक्षक्षतविषार्तानां वातपित्तविकारिणाम्।।12।।
हीनमेधास्मृतीनां च सर्पिष्पानं प्रशस्यते।
रूक्षता, क्षत (घाव) तथा विष से पीड़ित, वात एवं पित्त
के रोगों से पीड़ित रोगियों को तथा जिनकी बुद्धि, स्मरण-शक्ति
घट गयी हो उनको घृतपान कराना उचित होता है।
तैलपान के योग्य व्यक्ति
कृमिकोष्ठानिलाविद्धाः प्रवृद्धकफमेदसः।।13।।
पिबेयुस्तैलसात्म्या ये तैलं दाढ्र्यार्थिनस्तु ये।
जिनके उदर में कृमि हों, शरीर में वायु सम्बन्धी रोग हों,
जिनकी कफ तथा मेदा बढ़ गयी हो, जिनको तैल सात्म्य या
अनुकूल पड़ता हो तथा शरीर की दृढ़ता के अभिलाषी हों,
मनुष्य तैल का पान करें।