शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 242, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंशिग्रुज्वालामुखीशुण्ठीबिल्वेभ्यस्तण्डुलीयकात्।
प्रत्येकं स्वरसैः कुर्याद् यामैकैकं विमर्दनम्।। २४१।।
कृत्वा गोलं वृतं वस्त्रे लवणापूरिते न्यसेत्।
काचभाण्डे ततः स्थाल्यां काचकूपीं निवेशयेत्।। २४२।।
वालुकाभिः प्रपूर्याथ वह्निर्यामद्वयं भवेत्।
तत उद्धृत्य तं गोलं चूर्णयित्वा विमिश्रयेत्।। २४३।।
प्रवालचूर्णकर्षेण शाणमात्रविषेण च।
कृष्णसर्पस्य गरलैर्द्विवेलां भावयेत् तथा।। २४४।।
तगरं मुशली मांसी हेमाह्वा वेतसः कणा।
नीलिनी पत्रकं चैला चित्रकश्च कुठेरकः।। २४५।।
शतपुष्पा देवदाली धत्तूरागत्यमुण्डिकाः।
मधूकजातीमदनरसैरेषां विमर्दयेत्।। २४६।।
प्रत्येकमेकवेलां च ततः संशोष्य धारयेत्।
बीजपूराऽर्द्रकद्रावैर्मरिचैः षोडशोन्मितैः।। २४७।।
रसो द्विगुञ्जप्रमितः सन्निपातेषु दीयते।
प्रसिद्धोऽयं रसो नाम्ना सन्निपातस्य भैरवः।। २४८।।
शुद्ध पारद तथा शुद्ध गन्धक मिलाकर तीन कर्ष
(1½-1½ तोला) लेकर कज्जली करें। ताम्रभस्म, रौप्य
(चाँदी) भस्म, आर (पीतल अथवा यशद) भस्म, वंगभस्म,
नाग (सीसा) भस्म एवं लोहभस्म प्रत्येक एक-एक कर्ष
(1-1 तोला) लें, फिर सहिजन की छाल, ज्वालामुखी, सोंठ,
बेलगिरी तथा चौलाई के स्वरस की एक-एक बार भावना दें,
प्रत्येक भावना देने के बाद एक-एक पहर तक मर्दन करें।
फिर गोला बनाकर तथा कपड़े में लपेट कर लवण (सेंधा
नमक) से भरे हुये काँच के पात्र में रख दें तत्पश्चात् उस
काँचपात्र को मिट्टी की स्थाली (नाँद) में रखकर और बालू
से उक्त स्थाली को भरकर दो पहर तक अग्नि दें स्वांगशीतल
होने पर उस गोले को निकालकर सूक्ष्म चूर्ण बना लें, फिर
प्रवाल चूर्ण (गुलाबजल द्वारा मूँगा की बनायी हुई पिष्टि)
एक कर्ष (1 तोला) तथा शुद्ध विष एक शाण (चौथाई
तोला) मिला दें, उसमें काले साँप के विष की दो बार भावना
दें। तगर, सफेदमुसली, जटामांसी, चोक, बेत, पीपल, नील,
तेजपत्ता, इलायची, चीता, तुलसी, सौंफ, बन्दालडोडा, धतूरा,
अगस्त्य वृक्ष की छाल, गोरखमुण्डी, महुआ, चमेली तथा
मैनफल, प्रत्येक द्रव्य के स्वरस की एक-एक बार भावना दें,
तत्पश्चात् सुखाकर रख लें। यह रस दो रत्ती की मात्रा में
बिजौरा नींबू के रस, अदरक के रस तथा काली मिरच सोलह
नग के साथ सभी प्रकार के सन्निपातों में दिया जाता है। यह
रस 'सन्निपातभैरव रस' नाम से प्रसिद्ध है।
वक्तव्य-आर (पीतल) के विषय में शा०सं०, म०
खं०अ० 11 श्लोक 1 का वक्तव्य देखें। सर्पविष सपेरों से
प्राप्त किया जा सकता है।
ग्रहणीकपाट रस
तारमौक्तिकहेमानि सारश्रैकैकभागकाः।
द्विभागो गन्धकः सूतस्त्रिभागो मर्दयेदिमान्।। २४९।।
कपित्थस्वरसैर्गाढं मृगशृङ्गे ततः क्षिपेत्।
पुटेन्मध्यपुटेनैव तत उद्धृत्य मर्दयेत्।। २५०।।
बलारसैः सप्तवेलमपामार्गरसैस्त्रिधा।
लोध्रप्रतिविषामुस्तधातकीन्द्रयवामृताः ।। २५१।।
प्रत्येकमेषां स्वरसैर्भावना स्यात् त्रिधा त्रिधा।
माषमात्रो रसो देयो मधुना मरिचैस्तथा।। २५२।।
हन्यात् सर्वानतीसारान् ग्रहणीं सर्वजामपि।
कपाटो ग्रहणीरोगे रसोऽयं वह्निदीपनः।। २५३।।
तार (चाँद) भस्म, मोतीभस्म, सुवर्ण भस्म तथा लोहभस्म
का एक-एक भाग (1-1 तोला), शुद्ध गन्धक दो भाग (2
तोला) तथा शुद्ध पारद तीन भाग (3 तोला) दोनों का कज्जली
बना लें और उक्त सभी द्रव्यों को मिला दें, तत्पश्चात् कैथ के
स्वरस से उन्हें भली-भाँति पीसकर मृग शृङ्ग में भर दें तथा
मध्यमपुट द्वारा पुट दें, इसके पश्चात् पीस लें और बरियारा के
रस की सात बार, अपामार्ग के रस की तीन बार लोध,
अतीस, नागरमोथा, धाय के फूल, इन्द्रजौ तथा गिलोय प्रत्येक
द्रव्य के रस का तीन-तीन बार भावना देनी चाहिये। फिर
एक माशा रस को मधु तथा मरिच (10-20 दाना) के साथ
सेवन कराना चाहिये। यह सभी प्रकार के अतिसारों को तथा
सन्निपातजनित ग्रहणीरोग को नष्ट करता है। यह 'ग्रहणीकपाट'
नामक रस ग्रहणपोरग में प्रयुक्त होता है और अग्नि को दीप्त
करता है।
वक्तव्य-मृगशृङ्ग (हिरन के सींग) का मूल भाग
खोखला होता है, उसी में औषधद्रव्य भर दिये जाते हैं। पुट
देने पर मृगशृङ्ग भी भस्म हो जाता है और वह भी साथ में
पीस लिया जाता है। सावधानी-पुट इतनी मृदु होनी चाहिये
कि केवल गन्धक का ही पाक हो सके, अन्यथा पारद भी उड़
जायेगा।
ग्रहणीवज्रकपाट रस
मृतसूताभ्रकं गन्धं यवक्षारं षट्कूणम्।
अग्नमन्थं वचां कुर्यात् सूततुल्यानिमान् सुधीः।। २५४।।