शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 236, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ें200 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे
[बायाँ स्तम्भ]
रखकर इस पात्र को एरण्ड के पत्तों में लपेट कर धूप में रख
दें। आधे पहर (1½ घण्टा) के पश्चात् जब अत्यन्त उष्ण
(गर्म) हो जाये तब धान्यराशि (गेहूँ के ढेर) में दबा दें और
आठ पहर के पश्चात् निकाल लें फिर इसे कपड़े में से छान लें।
यह कज्जली और लोह का मिश्रण अवश्य वारितर (जल पर
तैरने वाला) हो जाता है। फिर इसे घीकुआर के रस की सात
भावना दें तथा भाँगर्रा, मकोय, कटसरैया, मुण्डी, पुनर्नवा,
सहदेवी, गिलोय, नील, सम्भालू और चीता के रस अथवा
क्वाथ की पृथक्-पृथक् सात-सात भावनायें देकर और धूप
में सुखाकर रख लेना चाहिये। यह सिद्धयोग रसशास्त्र को
जानने वाले सिद्धयोगियों के मुख से सुना हुआ परम्परा से
चला आया है। मैंने (श्रीशार्ङ्गधराचार्य) इसका अनुभव किया
है। सचमुच यह योग सर्वरोगनाशक है। इसी लोह के समान
ही स्वर्ण आदि धातुओं का भी चूर्ण बनाकर मारा जा सकता
है। उक्त लोह को त्रिफला और मधु के साथ मिलाकर सब
रोगों में प्रयुक्त करना चाहिये। त्रिकटु, त्रिफला, बड़ी इलायची,
जायफल तथा लौंग इन नौ द्रव्यों को समान भाग लेकर चूर्ण
बनायें तथा इसके समान भाग में उक्त रस को मिला दें और
उसे मधु में मिलाकर रख दें। दो-दो निष्क (आठ-आठ
आना भर) की मात्रा में इसे खाना चाहिये। यह रस स्वयं
अग्निस্বরূপ होने के कारण 'अग्निरस' नाम से विख्यात है
और क्षय तथा कास का विनाशक है।
**वक्तव्य—**दो निष्क की मात्रा अधिक नहीं है, क्योंकि
यह मात्रा सम्मिलित औषधियों की है जिसमें लोह का अंश
बहुत ही थोड़ा होता है। उक्त विधि से एक प्रकार की भानुपाकी
लोहभस्म तैयार होती है। लोहचूर्ण अत्यन्त सूक्ष्म होना चाहिये
और यह ध्यान रखना चाहिये कि लोहकण पूर्णरूप से नष्ट हो
जायें। आवश्यकतानुसार इसमें पहले त्रिफला, दही, जामुन
का रस तथा गोमूत्र की भी भावना देनी चाहिये।
अमृतार्णव रस
पारदं गन्धकं शुद्धं मृतलोह च टङ्कणम्।। 162।।
रास्नाविडङ्गतिफला देवदारु कटुत्रयम्।
अमृता पद्मकं क्षौद्रं विश्वं तुल्यांशचूर्णितम्।। 163।।
त्रिगुञ्जं सर्वकासार्तः सेव्येदमृतार्णवम्।
शुद्ध पारद, शुद्ध गन्धक, लोह भस्म, टंकण, रास्ना,
वायविडंग, त्रिफला, देवदारु, त्रिकटु, गिलोय, पद्मकाठ तथा
सोंठ सबको समान भाग लेकर चूर्ण बना लें। इसकी तीन रत्ती
[दायाँ स्तम्भ]
की मात्रा मधु के साथ सब प्रकार के कास से पीड़ित रोगी को
सेवन करानी चाहिये। इसका नाम 'अमृतार्णव रस' है।
सूर्यावर्त रस
सूतार्धो गन्धको मर्दो यामैकं कन्यकाद्रवैः।। 164।।
द्वयोस्तुल्यं ताम्रपत्रं पूर्वकल्केन लेपयेत्।
दिनैकं स्थालिकायन्त्रे पक्वमादाय चूर्णयेत्।। 165।।
सूर्यावर्तो रसो ह्येष द्विगुञ्जः श्वासजिद् भवेत्।
पारद (4 तोला) से अर्द्धभाग (2 तोला) शुद्ध गन्धक
लेकर एक पहर-पर्यन्त घीकुआर के रस से मर्दन करें और
दोनों के समान भाग (6 तोला) शुद्ध ताम्र के अत्यन्त सूक्ष्म
पत्रों पर उक्त कल्क का लेप कर दें तत्पश्चात् स्थालिकायन्त्र में
एक दिन तक पाक करें और स्वांगशीतल होने पर निकाल
कर चूर्ण बना लें। यह 'सूर्यावर्त्त' नामक रस दो रत्ती की मात्रा
से श्वास को जीतता है।
**वक्तव्य—**स्थालिकायन्त्र वही है जिससे ताम्रभस्म (शा०
सं०, म०खं०अ० 11 में) बनायी गयी है। इसके सेवन से
रोगी को वमन होता है, कफ निकल जाता है और श्वास रोग
शान्त हो जाता है। इसके लिए सर्वप्रथम स्नेहन तथा स्वेदन
द्वारा रोगी के कफ को ढीला कर लेना चाहिये, जिससे वह
सुखपूर्वक निकल सके।
स्वच्छन्दभैरव रस
शुद्धं सूतं मृतं लोह ताप्यं गन्धकतालके।। 166।।
पथ्याग्निमन्थं निर्गुण्डी त्र्यूषणं टङ्कणं विषम्।
तुल्यांशं मर्दयेत् खल्वे दिनं निर्गुण्डिकाद्रवैः।। 167।।
मुण्डीद्रावैर्दिनैकं तु द्विगुञ्जं वटकीकृतम्।
भक्षयेद् वातरोगार्तो नाम्ना स्वच्छन्दभैरवम्।। 168।।
रास्नामृतादेवदारुशुण्ठीवातारिजं शृतम्।
सगुग्गुलुं पिबेत् कोष्णमनुपानं सुखावहम्।। 169।।
शुद्ध पारद, लोहभस्म, स्वर्णमाक्षिक की भस्म, शुद्ध
गन्धक, शुद्ध हरिताल, हरड़, अरणी, सम्भालू की जड़ का
छाल, त्रिकटु, टंकण तथा शुद्ध विष सभी को समान भाग में
लेकर खरल में डालकर सम्भालू के रस से एक दिन तक
मर्दन करें और एक दिन गोरखमुण्डी के रस से मर्दन करें
फिर दो दो रत्ती की गोलियाँ बनाकर रख लें। इस रस का
नाम 'स्वच्छन्दभैरव' है। इसको वातव्याधि से पीड़ित रोगी
खायें और अनुपान में रास्ना, गिलोय, देवदारु, सोंठ तथा