शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 228, कुल 356 में से
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गोलं न्यसेत् सम्पुटके पुटं दद्यात् प्रयत्नतः।
ततो नीत्वार्कदुग्धेन वज्रीदुग्धेन सप्तधा।।51।।
क्वाथेन दन्त्याः श्यामाया भावयेत्सप्तधा पुनः।
माषमात्रं रसं दिव्यं पञ्चाशन्मरिचैर्युतम् ।। 52।।
गुडं गद्याणकं चैव तुलसीदलयुग्मकम्।
भक्षयेत् त्रिदिनं भक्त्या शीतारिर्दुर्लभः परः ।। 53 ।।
पथ्यं दुग्धोदनं देयं विषमं शीतपूर्वकम्।
दाहपूर्वं हरत्याशु तृतीयकचतुर्थकौ ।। 54 ।।
द्वयाहिकं सततं चैव वैवर्ण्यं च नियच्छति ।
शुद्ध हरिताल, शुद्ध तूतिया, ताम्रभस्म, शुद्ध पारद, शुद्ध
गन्धक तथा शुद्ध मैनसिल प्रत्येक द्रव्य एक-एक कर्ष (1-1
तोला) लेकर त्रिफला (6 तोला) के क्वाथ से मर्दन करें,
फिर गोला बनाकर सम्पुट में रख दें और मृदु-मृदु पुट दें।
स्वांगशीतल हो जाने पर उसे सम्पुट में से निकालकर आक
के दूध तथा थूहर के दूध की सात-सात भावना दें और दन्ती
तथा काली निसोत के क्वाथ की सात-सात भावना दें, फिर
इस उत्तम रस को पचास दाना मरिच, छः माशा गुड़ तथा दो
पत्ते तुलसी के साथ लपेट कर तीन दिन तक भक्तिपूर्वक
(श्रद्धा के साथ) सेवन करें। यह 'शीतारिरस' परम दुर्लभ
है। इसकी मात्रा एक माशा है। इसमें दूध-भात का पथ्य देना
चाहिये। यह रस शीतपूर्वक (जड़ैया) ज्वर को, दाहपूर्वक
विषम ज्वर को तृतीयक तथा चतुर्थक ज्वर को शीघ्र ही नष्ट
कर देता है और दो-दो दिन पर आने वाले तथा सतत (8
पहर में दो बार आने वाले) ज्वर को तथा विवर्णता को नष्ट
करता है।
वक्तव्य-सर्वप्रथम पारद तथा गन्धक की कज्जली बना
लें। इस रस में तूतिया तथा ताम्र के अतिरिक्त अन्य सभी द्रव्य
उड़ने वाले हैं, अतः ऐसी पुट दें, जिससे उड़नशील द्रव्य उड़
न जाये केवल पिघल सके। इसकी मात्रा एक माशा नहीं
अपितु आधी या चौथाई रत्ती देनी चाहिये।
ज्वरघ्नी गुटिका
भागैकः स्याद् रसाच्छुद्धादैलेयः पिप्पली शिवा।।55।।
आकारकरभो गन्धः कटुतैलेन शोधितः।
फलानि चेन्द्रवारुण्याश्चतुर्भागमिता अमी ।। 56 ।।
एकत्र मर्दयेच्चूर्णमिन्द्रवारुणिकारसैः।
माषोन्मितां गुटीं कृत्वा दद्यात् सर्वज्वरे बुधः ।। 57 ।।
छिन्नारसानुपानेन ज्वरघ्नी गुटिका मता।
पारद, एलुआ (मुसब्बर), पीपल, हरड़, अकरकरा तथा
कटु (सरसों के) तेल द्वारा शुद्ध किया हुआ गन्धक प्रत्येक
द्रव्य एक-एक भाग (1-1 तोला) और इन्द्रायण के सूखे
फल चार भाग (5 तोला) सबको एक साथ पीसकर इन्द्रायण
के फलों के रस के योग से एक माशा की गोली बनायें और
गिलोय के रस के साथ सब प्रकार के ज्वरों में दें। इसका नाम
'ज्वरघ्नी गुटिका' है।
वक्तव्य-'एलेय' शब्द विवादग्रस्त है। कुछ लोग इसे
एलुआ या मुसब्बर मानते हैं, तो कुल एलबालुक नामक
सुगन्धिद्रव्य। वैद्यों का बहुमत 'मुसब्बर' की ओर ही है।
लोकनाथ रस
शुद्धो बुभुक्षितः सूतो भागद्वयमितो भवेत् ।। 58 ।।
तथा गन्धस्य भागौ द्वौ कुर्यात्कज्जलिकां तयोः।
सूताच्चतुर्गुणेष्त्वेव कपर्देषु विनिक्षिपेत् ।। 59 ।।
भागैकं टङ्कणं दत्त्वा गोक्षीरेण विमर्दयेत्।
(ततस्तेनकपर्दनां मुखान्यामुद्रयेद् भिषक् ।। 60 ।।)
तथा शङ्खस्य खण्डानां भागानष्टौ प्रकल्पयेत्।
क्षिपेत् सर्वं पुटस्यान्तश्चूर्णलिप्तशरावयोः ।। 61 ।।
गर्ते हस्तोन्मिते धृत्वा पुटेद् गजपुटेन च।
स्वाङ्गशीतं समुद्धृत्य पिष्ट्वा तत् सर्वमेकतः ।। 62 ।।
षड्गुञ्जासम्मितं चूर्णमेकोनत्रिंशदूषणैः।
घृतेन वातजे दद्यान्नवनीतेन पित्तजे ।। 63 ।।
क्षौद्रेण श्लेष्मजे दद्यादतीसारे क्षये तथा।
अरुचौ ग्रहणीरोगे कार्ये मन्दानले तथा ।। 64 ।।
कासश्वासेषु गुल्मेषु लोकनाथरसो हितः।
तस्योपरि घृतान्नं च भुञ्जीत कवलत्रयम् ।। 65 ।।
मज्ज्वे क्षणैकमुत्तानः शयीतानुपधानके।
अनम्लमन्नं सघृतं भुञ्जीत मधुरं दधि ।। 66 ।।
प्रायेण जाङ्गलं मांसं प्रदेयं घृतपाचितम्।
सद्गुग्धभक्तं दद्याच्च जातेऽग्नौ सान्ध्यभोजने ।। 67 ।।
सघृतान् मुद्गवटकान् व्यञ्जनेष्ववचारयेत्।
तिलामलककल्केन स्नापयेत् सर्पिषाऽथवा ।। 68 ।।
अभ्यञ्जयेत् सर्पिषा च स्नानं कोष्णोदकेन च।
क्वचित्तैलं न गृह्णीयान्न बिल्वं कारवेल्लकम् ।। 69 ।।
वार्त्ताकं शफरीं चिञ्चां त्यजेद् व्यायाममैथुने।
मद्यं सन्धानकं हिङ्गु शुण्ठीं माषान्मसूरकान् ।। 70 ।।
कूष्माण्डं राजिकां कोपं काञ्जिकं चैव वर्जयेत्।
त्यजेद्युक्तं निद्रां च कांस्यपात्रे च भोजनम् ।। 71 ।।