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सर्वकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 225, कुल 356 में से

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पृष्ठ 225

द्वादशोऽध्यायः ] रसादिशोधनमारणकल्पना 189
आक, सेहुण्ड (थूहर), धत्तूरा, कलिहारी, कनेर, गुञ्जा की
जड़ तथा अफीम-ये सात द्रव्य उपविष हैं। इन द्रव्यों के साथ
मर्दन करने से पारद 'छिन्नपक्ष' हो जाता है और उसका मुख
बन जाता है, जिससे वह धातुओं को क्षण भर में ग्रस (निगल)
लेता है।
दूसरी विधि
अथवा त्रिकटु क्षारौ राजी लवणपञ्चकम् ।। 21 ।।
रसोनो नवसारश्च शिग्रुश्चैकत्र चूर्णितैः।
समांशैः पारदादेतैर्जम्बीरेण द्रवेण वा ।। 22 ।।
निम्बुतोयैः काञ्जिकैर्वा सोष्णखल्वे विमर्दयेत् ।
अहोरात्रत्रयेण स्याद् रसे धातुचरं मुखम् ।। 23 ।।
अथवा त्रिकटु (सोंठ, मरिच तथा पीपल), दोनों क्षार
(सज्जीखार तथा जौखार), राई, पाँचों नमक (सैन्धव, सोंचर,
विड्, सामुद्र तथा साँभर), लहसुन, नौसादर तथा सहजन की
छाल, इन सबका एक साथ चूर्ण बना लें। इस चूर्ण के समान
भाग पारद मिलाकर जम्बीरी नींबू के रस से अथवा काञ्जी से
'उष्ण खल्ल' तीन अहोरात्र (निरन्तर 72 घंटों) तक मर्दन
करे तो पारद में 'धातुचर' मुख हो जाता है।
वक्तव्य-एक गड्ढे में बकरी की मेंगन, तुष (धान को
भूसी) तथा अग्नि इन तीनों को डाल दें। जब सब जलकर
अग्नि हो जाये तो उस पर खरल रख दें और जब यह खरल
तप जाता है तो इसे 'तप्त खल्ल' या 'उष्ण खल्ल' कहते हैं।
इस प्रकार खरल गरम भी रहता है, पीसने वाले को गर्मी भी
नहीं लगती तथा खरल के फूटने का भय भी नहीं रहता।
रस-ग्रन्थों में खल्ल तथा खल्व दोनों शब्द मिलते हैं। ये दोनों
शब्द एक ही पात्र के परिचायक हैं।
तीसरी विधि
अथवा बिन्दुलीकीटै रसो मर्द्यस्त्रिवासरम्।
लवणाम्लैर्मुखं तस्य जायते धातुघस्मरम् ।। 24 ।।
अथवा बिन्दुलीकीटों के साथ तथा नमक या अम्ल
(काँजी अथवा नींबू रस) के साथ पारद को तीन दिन तक
मर्दन करें। इस प्रकार पारद में 'धातुघस्मर' (धातु को खाने
वाला) मुख हो जाता है।
वक्तव्य-यद्यपि पारद में स्वर्ण आदि धातुओं को अपने
में विलीन कर लेने की स्वाभाविक शक्ति विद्यमान है, तथापि
उपर्युक्त तीन विधियों द्वारा घोटने पीसने से वह शक्ति और भी
तीव्र हो जाती है। 'धातून ग्रसते क्षणात्', 'रसे धातुचरं मुखम्'
तथा 'मुखं तस्य जायते धातुघस्मरम्' इन सभी का तात्पर्य
यही है, कि वह धातुओं को क्षणभर में ग्रस लेता है अथवा
खा जाता है, किन्तु यह मुख दिखलायी नहीं देता केवल
उसके प्रयोग से ज्ञात होता है।
गन्धक-जारण-विधि
अथ कच्छपयन्त्रेण गन्धजारणमुच्यते ।
मृत्कुण्डे निक्षिपेत् तोय तन्मध्ये च शरावकम् ।। 25 ।।
महत्कुण्डपिधानाभं मध्ये मेखलया युतम्।
लिप्त्वा च मेखलामध्यं चूर्णेनात्र रसं क्षिपेत् ।। 26 ।।
रसस्योपरि गन्धस्य रजो दद्यात् समांशकम्।
दत्त्वोपरि शरावं च भस्ममुद्रां प्रदापयेत् ।। 27 ।।
तस्योपरि पुटं दद्याच्चतुर्भिर्गोमयोलैः।
एवं पुनः पुनर्गन्धं षड्गुणं जारयेद् बुधः ।। 28 ।।
गन्धे जीर्णे भवेत् सूतस्तीक्ष्णाग्निः सर्वकर्मसु।
अब कच्छप-यन्त्र द्वारा पारद के साथ मिले हुये गन्धक
के जारण (परिपाक) का विधान कहा जाता है-मिट्टी के
कुण्ड में जल डालकर उसके मुख पर बड़ा-सा ढँकना रख दें
(इसका तलभाग जल से लगा रहना चाहिये), इसके मध्यभाग
में मेखला (थाला) बनाना चाहिये। चूना का लेप कर इसमें
शुद्ध पारद डालना चाहिये। इस रस में समान भाग गन्धक का
चूर्ण देना चाहिये तथा इस पर सिकोरा रखकर जल में मिलाकर
राख की मुद्रा देनी चाहिये, अर्थात् राख (भस्म) में बन्द कर
देना चाहिये। इसके ऊपर चार उपलों की पुट देनी चाहिये।
इसी प्रकार छः गुनी गन्धक का जारण करना चाहिये। गन्धक
जीर्ण होने पर पारद अत्यन्त तीक्ष्ण तथा सब कार्यों में प्रयुक्त
करने के योग्य बन जाता है।
पारद-मारण-विधि
धूमसारं रसं तोरौं गन्धकं नवसादरम् ।। 29 ।।
यामैकं मर्दयेदम्लैर्भागं कृत्वा समांशकम्।
काचकूप्यां विनिक्षिप्य तां च मृद्वस्त्रमुद्रया ।। 30 ।।
विलिप्य परितो वक्त्रे मुद्रां दत्त्वा च शोषयेत्।
अधःसच्छिद्रपीठीमध्ये कूपीं निवेशयेत् ।। 31 ।।
पिठरीं बालुकापूरैर्भृत्वा चाकूपिकागलम्।
निवेश्य चुल्ल्यां तदधः कुर्याद् वह्निं शनैः शनैः ।। 32 ।।
तस्मादप्यधिकं किञ्चित्तावत् ज्वलयेत् क्रमात्।
एवं द्वादशभिर्यामैर्ग्रियते सूतकोत्तमः ।। 33 ।।
स्फोटयेत् स्वाङ्गशीतं तमूर्ध्वगं गन्धकं त्यजेत्।
अधःस्थं मृतसूतं च सर्वकर्मसु योजयेत् ।। 34 ।।