शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 218, कुल 356 में से
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काला सुरमा आँखों में प्रयुक्त करने के अतिरिक्त खिलाया भी
जाता है और सफेद सुरमा या सौवीर को दही अथवा घीकुआर
के रस में पीसकर तथा टिकिया बनाकर पाँच-सात पुटें देने से
भस्म हो जाती है। यह भस्म रक्तपित्त, प्रदर तथा पूयमेह
(सुजाक) में आश्चर्यजनक कार्य करती है। 2. गेरू दो प्रकार
का होता है-(क) साधारण गेरू, (ख) सुवर्णगैरिक अर्थात्
सोना गेरू जिसे हिरौञ्जी कहा जाता है। यह प्रथम गेरू की
अपेक्षा अत्यन्त लाल (देखें-'ततो रक्ततरं हि तत्' । भा०
प्र० नि० धा० व०) होता है। 3. कासीस अर्थात् हीराकासीस
लोह तथा गन्धक का यौगिक है। इसका वर्ण हरापन लिये
नीला होता है। एक लाल कासीस भी होता है जो भीषण
वामक है। 4. टंकण दो प्रकार का होता है-(क) सुहागा और
(ख) चौकिया सुहागा। प्रयोग दोनों का ही होता है। खाने के
लिए इसे कड़ाही या तवा में डालकर आग की सहायता से
फुला लिया जाता है। मलहमों में इसे कच्चा ही डाला जाता
है। 5. वराटिका या कौड़ी कई प्रकार की होती हैं जो समुद्र से
प्राप्त की जाती हैं। यह एक प्रकार के क्रिमि का कवच है,
अथवा एक प्रकार की हड्डी ही है। इसको जलाते समय
अस्थि की-सी गन्ध आती है। जो कौड़ी पीली तथा गाँठदार
हो, वह उत्तम मानी जाती है। यथा-'पीता गुल्मयुता पृष्ठे
रसयोगेषु पूजिता'। 6. तोरी या तुवरी अर्थात् फिटकिरी दो
प्रकार की होती है-(क) सफेद स्फटिका और (ख) लाल
स्फटिका, प्रयोग में दोनों ही आती हैं; किन्तु कुछ लोग लाल
स्फटिका को उत्तम मानते हैं। टंकण के समान इसको भी
फुलाकर खाने के कार्यों में प्रयुक्त किया जाता है। 7. शंख भी
कई प्रकार का होता है। इसका वर्णन भी कौड़ी के ही समान
है। सभी शंखों की भस्म घीकुआर के रस के संयोग से
बनायी जाती है। 8. कंकुष्ठ के सम्बन्ध में अनेक मत हो जाने
के कारण विद्वानों के मन में सन्देह उत्पन्न हो गया है। अतः
निर्णायक बुद्धि से आप स्वयं विचार करें।
मनःशिला-शुद्धि
पचेत् त्र्यहमजामूत्रैर्दोलायन्त्रे मनःशिलाम्।
भावयेत् सप्तधा पित्तैरजायाः शुद्धिमृच्छति ॥ 73 ॥
दोलायन्त्र द्वारा बकरी के मूत्र में मैनसिल को तीन दिन
तक पकाये और बकरी के पित्त (जो पित्ताशय में रहता है)
की सात भावना दें। इस तरह मैनसिल शुद्ध हो जाती है।
वक्तव्य-अदरक के रस की सात भावना देने से भी
मैनसिल शुद्ध हो जाती है। 'शृङ्गवेररसैर्वापि विशुद्ध्यति
मनःशिला'। मैनसिल तथा हरिताल एक ही जाति के दो
पदार्थ हैं। यथा-'तालकस्यैव भेदोऽस्ति मनोह्वा च
तदन्तरम्। तालकं त्वतिपीतं स्याद् भवेद् रक्ता
मनःशिला' ।। (आ०प्र०अ० 2)।
हरिताल-शोधन
तालकं कणशः कृत्वा सचूर्णं काञ्जिके क्षिपेत् ।
दोलायन्त्रेण यामैकं ततः कूष्माण्डजैर्द्रवैः ॥ 74 ॥
तिलतैले पचेद् यामं यामं च त्रिफलाजलैः।
एवं यन्त्रे चतुर्यामं पाच्यं शुद्ध्यति तालकम् ॥ 75 ॥
हरिताल के कणों को अलग-अलग करके तथा चौपरत
कपड़े की पोटली में बाँधकर अर्थात् दोलायन्त्र की विधि से
लटकाकर चूना मिली हुई काञ्जी में डाल दें। एक प्रहर के
पश्चात् उसमें से निकालकर कूष्माण्ड (कोहड़ा या पेठा) के
जल में, तिलतैल में तथा त्रिफला के क्वाथ में एक-एक
प्रहर-पर्यन्त पकायें। इस प्रकार दोलायन्त्र द्वारा चार प्रहर-पर्यन्त
पकाने से हरिताल शुद्ध हो जाती है।
वक्तव्य-हरिताल दो प्रकार की होती हैं-1. वंशपत्री-
'स्वर्णवर्णं गुरु स्निग्धं सपत्नं चाभ्रपत्रवत्', और 2.
पिण्डहरिताल-'निष्पत्रं पिण्डसङ्काशम्'। हरिताल नामक
पदार्थ गन्धक- संखिया का यौगिक है। यह घोर विष है।
हरिताल को चूना युक्त काञ्जी में केवल भिगोकर रखना
चाहिये और तिलतैल में भी पकाना नहीं चाहिये, केवल
स्वेदित करना चाहिये, क्योंकि उक्त दोनों द्रवों में पकाने से
हरिताल घुल जाती है और पिघल जाती है। दोलायन्त्र-इसका
विधान इस प्रकार है-'द्रवद्रव्येण भाण्डस्य पूरितार्धस्य
तस्य च। मुखे तिर्यक् कृते दण्डे यद् द्रव्यं सूत्रलम्बितम् ॥
स्वेदयेत् तन्मध्यगतं दोलायन्त्रमिति स्मृतम् ।।' अर्थात् भाण्ड
(पात्र) को द्रवद्रव्य द्वारा आधा भर दिया जाता है और उसके
मुख पर एक लकड़ी का टुकड़ा तिरछा करके रख दिया जाता
है और इस डंडे में द्रव्य की पोटली बाँधकर लटका दी जाती
है। इसी को 'दोलायन्त्र' कहते हैं। इस यन्त्र द्वारा तीन क्रियाएँ
की जाती हैं। यथा-1. वासन अर्थात् किसी द्रव पदार्थ में
किसी द्रव्य को डुबाकर कुछ समय तक रख छोड़ना, 2.
स्वेदन अर्थात् किसी द्रव का किसी द्रव्य को स्वेद पहुँचाना।
इसमें द्रव्य को द्रव में डुबाया नहीं जाता, अपितु द्रव से द्रव्य
को अंगुल दो अंगुल ऊँचा रखते हैं और 3. पाचन अर्थात् द्रव
को द्रव्य में डुबाकर पकाया जाता है।