शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 181, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽध्यायः ] घृततैलकल्पना 145
दुग्धे दध्नि रसे तक्रे कल्को देयोऽष्टमांशकः।
कल्कस्य सम्यक्पाकार्थं तोयमत्र चतुर्गुणम् ।। 7 ।।
जिस योग में स्नेह का साधन (परिपाक) केवल जल से
अर्थात् द्रव्यकार्य में केवल जल का विधान हो तो उसमें कल्क
चतुर्थांश (चौथाई), क्वाथ से हो तो कल्क षष्ठांश (छठा
भाग) तथा रस या स्वरस से हो तो अष्टमांश (आठवाँ भाग)
कल्क लेना चाहिये। यदि दूध, दही, मांसरस, स्वरस अथवा
तक्र से स्नेहपाक का विधान हो तो कल्क (स्नेह की अपेक्षा)
अष्टमांश (आठवाँ भाग) डालना चाहिये और इसमें कल्क
को भली-भाँति पकने के लिए चौगुना जल भी डालना चाहिये।
वक्तव्य-यद्यपि उक्त श्लोकों द्वारा कही हुई बातों का
चरक एवं सुश्रुत के वचनों से विरोध होने के कारण इसका
कविराज गंगाधर राय ने अनार्ष कहकर जोरों से खण्डन
किया है, किन्तु हम इस आधार पर इनका आदर कर सकते
हैं। सम्भव है कि पुरानी संहिताओं, जो आजकल प्राप्त नहीं
हैं, में इस प्रकार के वचन हों और हमारा विश्वास है कि
अवश्य होंगे, क्योंकि आचार्य शार्ङ्गधर ने कहीं न कहीं से
इनको उद्धृत किया है, स्वयं नहीं रचा है। यदि ध्यानपूर्वक
विचार किया जाये तो यही ज्ञात होता है कि
'कल्काच्चतुर्गुणीकृत्य' तथा 'कल्कस्यांशं तत्र दद्यात्
चतुर्थं षष्ठमष्टमम्' ये दोनों ही मत प्राचीन काल में प्रचलित
थे। हो सकता है कि दो से अधिक मत भी प्रचलित रहे हों।
इसमें कुछ आश्चर्य नहीं, क्योंकि ऐसे भी योग मिलते हैं,
जिनमें अर्धांश कल्क डालने का विधान है। देखें-इसी अध्याय
में 'क्षीरषट्पल' एवं 'मसूरघृत'।
स्नेह में द्रवद्रव्यों का परिमाण
द्रवाणि यत्र स्नेहेषु पञ्चादीनि भवन्ति हि।
तत्र स्नेहसमान्याहुर्यथापूर्वं चतुर्गुणम् ।। 8 ।।
जिन स्नेहों में पाँच से अधिक द्रव पदार्थों को डालने का
विधान हो, उनमें प्रत्येक द्रव स्नेह के समान ही डाले जाते हैं
या डालने चाहिये। पाँच से पूर्व (चार, तीन, दो अथवा एक)
सब द्रव द्रव्य मिलाकर चौगुने डाले जाते हैं।
वक्तव्य-उक्त श्लोक का तात्पर्य यह है कि द्रव पदार्थ
स्नेह से चौगुना अवश्य होना चाहिये, इससे कम नहीं, अधिक
भले ही हो।
केवल क्वाथ से स्नेहपाक
द्रव्येण केवलनैव स्नेहपाको भवेद् यदि।
तत्राम्बुपिष्टः कल्कः स्याज्जलं चात्र चतुर्गुणम् ।। 9 ।।
क्वाथेन केवलनैव पाको यत्रेरितः क्वचित्।
क्वाथद्रव्यस्य कल्कोऽपि तत्र स्नेहे प्रयुज्यते ।। 10 ।।
यदि कहीं केवल द्रव्य से ही स्नेहपाक का विधान हो तो
वहाँ उस द्रव्य का जल के योग से कल्क बनाकर डालना
चाहिये। इसमें चौगुना जल डाल देना चाहिये। यदि कहीं
केवल क्वाथ से ही स्नेहपाक का विधान हो तो वहाँ पर
क्वाथद्रव्य (जिससे क्वाथ बनाया गया हो) का कल्क भी
स्नेह में प्रयुक्त किया जाता है।
वक्तव्य-तात्पर्य यह है कि स्नेहपाक में कल्क एवं
द्रवपदार्थ दोनों ही होने चाहिये। देखें-'गौराद्यं घृतम्' तथा
'वज्रीतैलम्' इनमें पहला केवल द्रव्य से और दूसरा केवल
द्रव से योग सिद्ध किया गया है। ऐसे ही स्थानों पर उक्त
परिभाषा का प्रयोग होते देखा जाता है।
कल्कहीन स्नेहपाक
कल्कहीनस्तु यः स्नेहः स साध्यः केवले द्रवे।
जिस स्नेह में कल्क का विधान न हो अथवा निषेध हो,
उसे केवल द्रवपदार्थ में ही सिद्ध कर लेना चाहिये।
वक्तव्य-इसका तात्पर्य यही है कि कल्क के बिना भी
स्नेहपाक किया जा सकता है।
पुष्पकल्क से स्नेहपाक-विधि
पुष्पकल्कस्तु यः स्नेहस्तत्र तोयं चतुर्गुणम् ।। 11 ।।
स्नेहे स्नेहाष्टमांशश्च पुष्पकल्कः प्रयुज्यते।
जिस स्नेह में पुष्पों का कल्क डाला जाता हो, उसमें
चौगुना जल डालना चाहिये और पुष्पों का कल्क स्नेह से
अष्टमांश (आठवाँ भाग) प्रयुक्त करनी चाहिये।
वक्तव्य-यदि गुलाब एवं चमेली आदि के सुगन्धित
पुष्पों का तेल बनाना हो तो उक्त परिभाषा का प्रयोग कदापि
नहीं करना चाहिये, क्योंकि इस विधि से तेल सुगन्धित न
होकर दुर्गन्धित हो जाता है।
पुष्पतैल-निर्माण-विधि-पुष्पों को (कल्क किये बिना
ही) तेल में डालकर और पात्र का मुख बन्द करके दो-तीन
सप्ताह तक धूप में रखना चाहिये। इस प्रकार उनकी सुगन्धि
तेल में आ जायेगी।
स्नेहसिद्धि का लक्षण
वर्तित्त्वत् स्नेहकल्कः स्याद् यदाङ्गुल्या विमर्दितः ।। 12 ।।
शब्दहीनोऽग्निनिक्षिप्तः स्नेहः सिद्धो भवेत् तदा।