शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 152, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽध्यायः
चूर्णकल्पना
चूर्ण-निर्माण-विधि
अत्यन्तशुष्कं यद् द्रव्यं सुपिष्टं वस्त्रगालितम्।
तत् स्याच्चूर्णं रजः क्षोदस्तन्मात्रा कर्षसम्मिता।। 1 ।।
अत्यन्त शुष्क (सूखे हुये) द्रव्य को भली प्रकार पीसकर
कपड़े से छान लें। यह 'चूर्ण' 'रजः' या 'क्षोद' कहलाता है।
इसकी मात्रा एक कर्ष (एक तोला) होती है।
वक्तव्य-साधारणतया पिसी हुई औषध को 'चूर्ण', पूर्ण
रूप से पिसी हुई (अत्यन्त बारीक की हुई) को 'रजः' (धूल
जैसी) तथा दरदरे चूर्ण को 'क्षोद' कहा जाता है। सभी चूर्णों
की मात्रा 'एक कर्ष' नहीं होती, अतः रोगी, रोग तथा औषधियों
के बलाबल का विचार कर मात्रा की व्यवस्था चिकित्सक
को स्वयं करनी चाहिये।
चूर्ण में गुड़ आदि का मान
चूर्णे गुडः समो देयः शर्करा द्विगुणा भवेत्।
चूर्णेषु भर्जितं हिङ्गु देयं नोत्क्लेशकृद्भवेत्।। 2 ।।
चूर्णों में गुड़ समान भाग तथा चीनी (मिश्री) दुगुनी
डाली जाती है और चूर्णों में हींग को भूनकर डालना चाहिये,
जिससे वह उत्क्लेश (जी-मिचलाना) कारक न हो।
वक्तव्य-जिन योगों में गुड़ तथा चीनी का मान न
बतलाया गया हो, उन्हीं में उक्त परिभाषा का प्रयोग करना
चाहिये और हींग को घी में भून लेना चाहिये। कच्ची हींग से
जी मिचलाने लगता है। योग लिखते या खरीदते समय इस
बात पर ध्यान रखना चाहिये कि जिन भिन्न भिन्न द्रव्यों को
लिया जा रहा है, उनको कूटने, पीसने, साफ करने तथा भूनने
के बाद उतना चूर्ण जितना योग में लिखा है, तैयार होगा कि
नहीं। यदि नहीं होता है, तो चिकित्सक से सलाह लें।
चूर्ण-सेवन-विधि
लिहेच्चूर्णं द्रवैः सर्वैर्घृताद्यैर्द्विगुणोन्मितैः।
पिबेच्चतुर्गुणैरेव चूर्णमालोडितं द्रवैः।। 3 ।।
यदि घृत आदि (मधु तथा अडूसा आदि के शर्बत) द्रव
पदार्थ में मिलाकर चूर्ण को चाटने का विधान हो तो चूर्ण की
अपेक्षा घी आदि दुगुने लेने चाहिये। यदि द्रव पदार्थ दूध,
गोमूत्र तथा तक्र आदि में मिलाकर पीने का विधान हो तो
चौगुना द्रव लेना चाहिये।
वक्तव्य-तात्पर्य यह है कि 'लिहेत्' तथा 'पिबेत्' पर
ध्यान रखना चाहिये। यदि औषध को चाटने का निर्देश हो तो
दूना लें। यदि औषध द्रव्य को किसी द्रव पदार्थ के साथ पीना
हो तो चौगुना द्रव ग्रहण करना चाहिये।
चूर्ण का अनुपान
चूर्णावलेहगुटिकाकल्कानामनुपानकम् ।
वातपित्तकफातङ्के त्रिद्व्येकपलमाहरेत्।। 4 ।।
वात, पित्त तथा कफ के रोगों में चूर्ण, अवलेह गुटिका
तथा कल्कों का अनुपान क्रमशः तीन, दो तथा एक पल (4
तोला) होना चाहिये।
वक्तव्य-चूर्ण आदि पदार्थ खाकर उसके तत्काल बाद
जो उष्ण जल आदि पिया जाता है उसे 'अनुपान' कहा जाता
है। अनुपान से औषध निगलने में बहुत सरलता होती है।
उसकी कडुवाहट आदि का कष्टकर अनुभव भी नहीं होता
और वह भीतर जाकर शीघ्र घुल-मिलकर अपना प्रभाव
दिखलाने लगती है।
अनुपान का फल
यथा तैलं जले क्षिप्तं क्षणेनैव प्रसर्पति।
अनुपानबलादङ्गे तथा सर्पति भेषजम्।। 5 ।।
जैसे पानी पर गिरायी हुई तेल की बूँद क्षण भर में फैल
जाती है, वैसे ही अनुपान के बल से औषधद्रव्य शरीर में फैल
(व्याप्त हो) जाता है।
वक्तव्य-प्रत्येक ठोस पदार्थ के साथ जो द्रव पदार्थ का