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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 139, कुल 356 में से

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पृष्ठ 139

द्वितीयोऽध्यायः ] क्वाथादिकल्पना 103
चित्ता, चिरायता, नीम की छाल, कुटकी, परवल की पत्ती,
त्रिफला, नागरमोथा, जौ, इन्द्रजौ तथा कुरैया की छाल का
क्वाथ आँख के सभी रोगों को नष्ट करता है। स्वरभेद, पीनस
(जुकाम नामक प्रसिद्ध नासारोग) को, श्वास को और उरःक्षत
(वक्षःस्थल के भीतरी घाव) को नष्ट करता है।
अमृतादि क्वाथ
अमृतांत्रिफलाक्वाथः पिप्पलीचूर्णसंयुतः।
सक्षौद्रः शीलितो नित्यं सर्वनेत्रव्यथां जयेत् ।। 148 ।।
गिलोय और त्रिफला का क्वाथ पीपल का चूर्ण तथा
मधु मिलाकर बहुत दिनों तक प्रतिदिन पीने से यह आँख की
पीड़ा को जीतता है।
पञ्चवल्कल क्वाथ
अश्वत्थोदुम्बरप्लक्षवर्टवेतसजं श्रुतम् ।
व्रणशोथोपदेशानां नाशनं क्षालनात् स्मृतम् ।। 149 ।।
पीपल वृक्ष, गूलर, पाकर (पिलखन), बरगद तथा बेत
की छालों का क्वाथ बनाकर प्रक्षालन करने (धोने) से व्रण
(घाव), शोथ तथा उपदंश का नाश होता है।
वक्तव्य-उक्त क्वाथ द्वारा व्रणादि के प्रक्षालन का उपदेश
देकर आचार्य शार्ङ्गधर ने यह बात व्यक्त की है, कि क्वाथ
केवल पीने के ही काम में नहीं आते, अपितु व्रण धोने,
आँख-नाक में डालने तथा कुल्ले करने आदि कामों में भी
प्रयुक्त किये जाते हैं। इन क्वाथों का अर्क निकालकर भी
प्रयोग किया जाता है। इस प्रसंग में कतिपय प्रकरणोचित
विषयों का यहाँ संग्रह किया जा रहा है।
पाठादि क्वाथ-पाठा, मरोड़फली, चिरायता, देवदार
की छाल, सोंठ, इन्द्रजौ, सारिवा तथा कुटकी का क्वाथ-यह
धात्री (धाय) के विकृत दूध को शुद्ध करता है।
निम्बादि क्वाथ-नीम की छाल, पित्तपापड़ा, पाठा,
परवल की पत्ती, कुटकी, लालचन्दन, सफेदचन्दन, खस,
आँवला, अडूसा की पत्ती और जवासा-यह 'निम्बादि क्वाथ'
चीनी डालकर पीने से विसर्प और ज्वर से युक्त सभी प्रकार
की 'मसूरिका' को नष्ट करता है।
काञ्चनार क्वाथ-जो शीतला थोड़ी निकल कर फिर
शरीर में प्रविष्ट हो जाती है अर्थात् दिखलायी देकर फिर छिप
जाती है, उसे कचनार की छाल के क्वाथ में (शुद्ध)
स्वर्णमाक्षिक का चूर्ण (दो रत्ती) मिलाकर पीने से उसे पुनः
बाहर निकाल देता है।

शतपुष्पादि क्वाथ-सौंफ या सोया, वायविडंग,
अमलतास की गुंदी, हरड़, बालवच पलाश के बीज,
अजवायन, सुहागा की खील, गुड़, काकड़ासिंगी अतीस,
भारंगी, मुनक्का नागरमोथा तथा पीपल इन सब द्रव्यों का
समान भाग क्वाथ काला नमक डालकर बालकों को पिलाना
चाहिये। यह उत्तम जन्मघुट्टी है।
लंघन या अपतर्पण-वातादि दोषों से जकड़े हुये शरीर
वाले रोगी को दोषों की उत्कटता की शान्ति के लिए दोष
तथा बल का विचार करके 'अपतर्पण' (लंघन) कराना
आवश्यक होता है।
लंघन के अयोग्य व्यक्ति-किन्तु वह अपतर्पण
वातव्याधि, भूख, प्यास, मुखशोष तथा भ्रमरोग से पीड़ित
तथा गर्भवती नारी, वृद्ध, बालक, दुर्बल तथा भीरु (डरपोक)
को नहीं कराना चाहिये।
लंघन का फल-लंघन अव्यवस्थित या विकृत दोषों
तथा अग्नि को व्यवस्थित करता है, दोषों को पकाता है, ज्वर
को नष्ट करता है, अग्नि को दीप्त करता है, भोजन की इच्छा,
खाने में रुचि (स्वाद) तथा शरीर में हल्कापन को उत्पन्न
करता है।
सुलंधित का लक्षण-जब अधोवायु, मूत्र तथा पुरीष
का उचित रूप से विसर्ग होने लगे, शरीर में हल्कापन या
स्फूर्ति हो; हृदय, उद्गार, कण्ठ तथा मुख शुद्ध हो जाये;
तन्द्रा, क्लम दूर हो जाये, पसीना निकलने लगे, रुचि उत्पन्न
हो जाये, भूख तथा प्यास एक साथ लगने लगे और अन्तरात्मा
प्रसन्न हो जाये तब समझना चाहिये कि 'लंघन' भली-भाँति
हो गया है।
अतिलंघन के दोष-आवश्यकता से अधिक लंघन
करने से जोड़-जोड़ में वेदना, अंग-अंग में पीड़ा, खाँसी,
मुखशोष, भूख का नाश, भोजन में अरुचि, अत्यन्त प्यास,
कान, नाक में दुर्बलता, मन में खेद, उद्गारों की अधिकता
हृदय में अन्धकार या मूर्च्छा, शरीर, जठराग्नि तथा बल का
क्षय आदि दोष होने लगते हैं।
लंघन का सदुपयोग-लंघन तभी तक करे जब तक
प्राण या बल का ह्रास न हो, क्योंकि जिस आरोग्य के लिए
चिकित्सा की जाती है, उसका अधिष्ठान बल ही है।
प्रमथ्यापाक-विधि
प्रमथ्या प्रोच्यते द्रव्यपलात् कल्कीकृताच्छृतात् ।
तोयेऽष्टगुणिते तस्याः पानमाहुः पलद्वयम् ।। 150 ।।