शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ
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84 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे
मूल, झाड़ी आदि एवं पत्तों के भाग आदि के सेवन से मद संसार में जो रोग प्रसिद्ध होते हैं, उनकी इस प्रकार
चार प्रकार का और भी होता है। गणना की गयी है तथा धातु मूल एवं जीवादि से उत्पन्न होने
अध्यायोपसंहार वाले अन्यान्य रोग तो असंख्य होते हैं।
इति प्रसिद्धा गणिता ये किलोपद्रवा भुवि। वक्तव्य-सम्पूर्ण सृष्टि दो भागों में विभक्त है-1. चेतन
असङ्ख्याश्चापरे धातुमूलजीवादिसम्भवाः॥ २०४॥ या सजीव और 2. जड़ या निर्जीव। इनमें चेतन को जंगम
इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां और जड़ को स्थावर कहते हैं। इन्हीं से प्राणीमात्र पोषण भी
शार्ङ्गधरसंहितायां पूर्वखण्डे रोगगणना नाम पाते हैं और इन्हीं से रोग भी उत्पन्न होते हैं।
सप्तमोऽध्यायः॥7॥
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या,
विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता पूर्वखण्ड का सातवाँ अध्याय समाप्त।।7।।
पूर्वखण्ड समाप्त।
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