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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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८६ ] [ श्रीशारदा तिलक
दूध वाले वृक्ष के कषाय से-पलाश वृक्ष से समुत्पन्न से अथवा
तीर्थों के जल से जो कपूर-गन्ध और पुष्पों से सुगन्धित होवें ।
आत्मा के अभेद से प्रतिलोभ से विधि के साथ मातृका का और मूल
मन्त्र का जप करते हुए देवता की बुद्धि से पूरित कर देना चाहिए
।७२-७३। क्वाथ के जल से सम्पूर्ण शंख में अभीष्ट के प्रदाता गन्धाष्टक
का बिलोड़न करके सकल कलाओं कावाहन करे और पूजन करना
चाहिये ।७४। पूर्व में वह्िनकी दशों कलाएं और बारह-बारह आत्मा
की-सोम की सोलह कयाएं पीछे पचास कलाओं का पूजन व रे ।७५।
मत्र के ज्ञान रखने वाला मूल मंत्र का प्रतिलोग के व्दारा जप करे
और परम सावधान मन वाले को मंत्र के देवता का ध्यान करते हुये
वहाँ-वहाँ पर विचरण पुरुष को प्राण प्रतिष्ठा करनी चाहिये । और
कलाओं के स्वरूप वाले शंख में स्थित क्वाथ का कुम्भ में विनिःक्षेपण
कर देना चाहिये ।७६-७७।
गन्धाष्टकं तत्त्रिविधं शक्तिविष्णुशिवात्मकम्।
चन्दनागुरुकर्पूरचोरकुङ्कुमरोचना । ७८
जटामांसी कपियुता शक्तेर्गन्धाष्टकं विदुः ।
चन्दनागुरुह्रीवेरकुष्ठकुङ्कुमसेव्यकाः । ७९
जटामांसीमुरमिति विष्णोर्गन्धाष्टकं विदुः ।
चन्दनागुरुकर्पूर तमालजलकुङ्कुमम् । ८०
कुशीत कुष्ठ संयुक्तं शैवं गन्धाष्टकं विदुः ।
पाशादित्र्यक्षरात्मान्ते स्यादमुष्य पदन्ततः । ८१
क्रमात्प्राणा इह प्राणस्तथा सीव इह स्थितः ।
अमुष्य सर्वेन्द्रियाणि भूयोऽमुष्य पदं वदेत् । ८२
वाङ्मनस्त्वक्छ्रोत्रघ्राणप्राणपदान्वय ।
पश्चादिहागत्य सुखं चिरन्तिष्ठन्तु ठद्वयम् । ८३
अयं प्राणममन्त्रः प्रोक्तः सर्वजीवप्रदायकः
पश्चाद्वश्वत्थपनसचूतकोमलपल्लवैः । ८४