शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 84, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें८० ] [ श्रीशारदा तिलक
एषु स्वस्वकला न्यस्येन्नामाद्यक्षरपूर्विकाः ।
सत्त्वादींस्त्रीन् गुणान् न्यस्येत्तथैवात्र गुरुत्तमः । ४०
आत्मानमन्तरात्मानं परमात्मानमत्र तु ।
ज्ञानात्मानं प्र (च) विन्त्यस्य न्यस्येत्पीठमनुन्ततः । ४१
अपने देह में धर्मादिके द्वारा क्रम से पीठ की कल्पना करे । विद्वान्
आचार्य प्रदक्षिणा से कन्धे और ऊरुओं के युग्म में क्रम से धर्म-ज्ञान
वैराग्य और ऐश्वर्य का न्यास करे । मुखपार्श्व —नाभिपार्श्व में अधर्म
आदि की कल्पना करे । ३७-३८। धर्म आदिक पाद कहे गये हैं और
दूसरे पीठ गात्र हैं। हृदय में अनन्त पद्म का और इसमें सूर्य-चन्द्र-
अग्नि का—इनमें अपनी-अपनी नाम से पूर्व अक्षरों वाली कलाओं का
न्यास करे । ३६-४०। आत्माका अन्तरात्मा का और परमात्मा का
यहाँ पर ज्ञानात्मा का न्यास करके फिर पीठ मन्त्र का न्यास करना
चाहिए ।४१।
एवं देहमये पीठे चिन्तयेदिष्टदेवताम् ।
मुद्राः प्रदर्श्य विधिवदर्घ्यस्थापनमाचरेत् । ४२
शंखमस्त्राम्बुना प्रोक्ष्य वामतोवह्निमण्डले ।
साधारं स्थापयेद्विद्वान् बिन्दुस्रु (च्यु) तसुधामयैः ।४३
तोयैः सुगन्धिपुष्पाक्तैः पूरयेत्तं यथाविधि ।
आधा पावकं शंख सूर्य तोयं सुधामयम् । ४४
स्मरेद्वह्न्यर्कचन्द्राणाँ कलास्तास्तेष्वनुक्रमात् ।
मूलमन्त्रं जपेत्स्पृष्ट्वा न्यसेत्तस्याङ्गमन्त्रवित् । ४५
हृन्मन्त्रेणाभिसम्पूज्य हस्ताभ्यां छादयन्नपः ।
जपेद्विद्यां यथान्यायं देशिको देवताधिया । ४६
अस्त्रमन्त्रेण संरक्ष्य कवचेनावगुण्ठ्य च ।
धेनुमुद्रां समासाद्य रोधतेत्तत्त्वमुद्रया ।४७