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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 511 में से

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पृष्ठ 82

७८ ] [ श्रीशारदा तिलक
ततः संशोषये द्देहेहं वायु बीजेन वायुना ।
वह्निवीजेन तेनैव संदहेत्सकलां तनुम्।२६
विश्लेषयंत्तदा दोषानमृतेनामृताम्भसा।
आप्लाव्याप्लावयेद्देहमापादतलमस्तकम् ।२७
आत्मलीनानि तत्त्वानि स्वस्थानं प्राप्तेत्तदा।
आत्मानं हृदयाम्भोजमानयेत्परमात्मनः ।२८
मनुना हंसदेवस्य कुर्यान्न्यासादिकं ततः
ऋषिश्चन्दोदेवतानि न्यसेन् मन्त्रस्य मन्त्रवित् ।२६
आत्मनो मूर्ध्नि बदने हृदये च यथाक्रमात् ।
विधाय मूलमन्त्रेण प्राणायामं यथाविधि ।३०
समस्त भूतों के कारण में तत्वों का भी विशेष चिन्तन करना
चाहिए । जो बीज भाव से व्युत्क्रम से परमात्मा में लीन हैं ।२५। इसके
अनन्तर वायु बीज के द्वारा वायु से देह को संशोषण करे । उसी
वह्नि बीज के द्वारा अपने सम्पूर्ण देह का दहन करे ।२६। उस अवसर
में अमृत जल स दोषों का विश्लेषण करे । देह को आप्लावित
करके मस्तकसे चरणों तक आप्लावित करना चाहिये ।२७। तब आत्मा
में लीन हुए तत्त्वों को पुनः अपने स्थान पर प्राप्त करा देवे । परमात्मा
के हृदय कमल में आत्मा का आनयन करना चाहिये ।२८। फिर हंसदेव
के मन्त्र के द्वारा व्योम आदि का समाचरण करे । मन्त्र के ज्ञाता मन्त्र
को ऋषि-छन्द और देवता का न्यास करे ।२६। आत्मा का मस्तक में
मुख में और उदय में यथाक्रम मूलमन्त्र से न्यास करे और फिर विधि
के साथ प्राणायाम करना चाहिए ।
विदध्यान्मातृकान्यासं मन्त्रन्यासमनन्तरम् ।
अंगुष्ठादिष्वंगुलीषु न्यसेदङ्गैः सजातिभिः ।३१
अस्त्रं तत्तलयोर्न्यस्य कुर्यात्तालत्रयादिकम् ।
दिशस्तेनैव बध्नीयाच्छोटिकाभिः समाहितः ।३२