सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 511 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 74

७० ] [ श्रीशारदा तिलक
दलमूलेषु यु॰गशः केसराणि प्रकल्पयेत् ।
एतत् साधारणं प्रोक्तं पङ्कजं तन्त्रवेदिभिः । ११८
पदानि त्रीणि पादार्थं पीठकोणेषु मार्जयेत् ।
अवशिष्टैः पदैर्विद्वान् गात्राणि परिकल्पयेत् । ११९
पदानि वीथिसंस्थानि मार्जयेत्पङ्क्त्यभेदतः ।
दिक्षु द्वाराणि रचयेद्द्विचतुष्कोष्ठकैस्ततः । १२०
पदैस्त्रिभिरथैकेन शोभाः स्युर्द्वारपार्श्वयोः ।
उपशोभाः स्युरेकेन त्रिभिः कोष्ठैरनन्तरम् । १२१
वाह्य वृत्त के अन्तराल के मान से विधि से सुधी केसराद्यो ं में
रखकर दोनो ं और अर्ध निशाचरो ं को लिये कर वहांपर सन्धि संस्थान
सूत्रो ं का पातन करे । दलो ं के अग्र भागो ं का जो मान है उसी मान
वाला वृत्त लिखे । ११५-११६। उसके अन्तरालमें सुधी पुरुष दोनो ं ओर
उसके मध्यस्थ सूत्र के चारो ं ओर वाह्य हस्त से दलाग्रो ं को लिखे ।
।११७। दलो ं के मूलो ं में दो केसरो ं को प्रकल्पित करे । तन्त्र शास्त्र
विद्वानो ं द्वारा यह साधारण पंकज बताया गय है । ११८। पाद के
लिये पीठ के कोणों में तीन पदो ं का मार्जन करना चाहिये । अवशिष्ट
पदो ं के द्वारा विव्दान् को चाहिये कि वह गात्रो ं का परिकल्पन करे
।११९। पक्ति के अभेद से ही वीथि में संस्थिति पदो ं का मार्जन करे ।
दिशाओ ं में द्वारो ं की रचना करे फिर दो और चार कोष्ठो ं वाले पदो ं
से रचना करनी चाहिये । इसके अनन्तर एक के द्वारा द्वार के पार्श्व
भागो ं की शोभाएं होती है । एक से उपशोभाए होती हैं और अनन्तर
में तीन कोष्ठो ं से होती हैं । १२०-१२१।
क्षवशिष्टैः पदैः षड्भिः कोणानां स्याञ्चतुष्टयम् ।
रञ्जयेत्पञ्चभिर्वर्णैर्मण्डलं तन्मनोहरम् । १२२
पीतं हरिद्राचूर्णं स्यात्सितं तन्डुलसम्भवम् ।
कुसुम्भचूर्णमरुणं कृष्णं दग्धं पुलाकजम् । १२३