शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ
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४६० ] [ श्रीशारदा तिलक
आधारबन्धप्रमुख क्रियाभिः समुत्थिता कुण्डलिनी सुधाभिः
त्रिधामबीजं शिवमर्चयन्ती शिवाऽङ्गना वा शिवमातनोतु ॥७५
- आधार में स्थित शक्ति बिन्दु के निलय वाली नीवार शुक के
समान, नित्य आनन्द से पूर्ण, प्रबोधकी प्रदायक, गलित परम सुधा की
वर्षाओं से षट् सरसी रुहों कं विधिपूर्वक करने वाली को दण्ड
के मध्य में उदित-भास्वर बन्धु जीव के समान रुचिर सत और चित्
से परिपूर्ण देवता का ध्यान करना चाहिये ।७०। हृदय रूपी कमल को
भानुबिम्ब के समान ही निलय जिसका तथा विद्युल्लता के सदृण-
बाल सूर्य के समान अरुण तेज वाले भगवान् के द्वारा अन्धकार का
निर्भत्सन करती हुई, नाद नामक परम अर्ध चन्द्र के समान कुटिल तथा
निरन्तर सम्बित् से पूर्ण, अक्षर रूप वाली, तेजों की विभु कों विमल
बुद्धि वाला ध्यान करें ।७१। भाल में पूर्ण चन्द्र वाली, प्रतिभटों को
नीहार की कान्ति से अमृत द्वारा देव का सिंचन करती हुई जो कि
अपरिमित है, वपु की आनन्दित करने वाली, वर्णों के जनन करने
वाली, उसके वपु से विश्व को प्राप्त करके स्थित ऐसी संवित् से
परिपूर्ण अम्बिकादेवी का भलीभाँति अनाकुल मन से ध्यान करना
चाहिये । ७२। मूल में भाल में और हृदय में विराजमान वर्ण रूप
सवित्री-पीन (स्थूल) और उत्तुङ्ग (ऊँचे) स्तनों के भार से नमित
शरीर के मध्य देश वाली महेशी देवी मक्रचक्र में घलित हुये अमृत से
गात्र को प्रकाम रूप से सिक्त करने वाली देवी अविकल आद्य वाङ्मयी
श्री को हमको प्रदान करे ।७३। अपने भवन में निवास से विवसों के
द्वारा उच्चारण करती हुई, मार्ग में कमलों के सुन्दर विकास करके,
तरुण सूर्य की कान्ति वह कुण्डली देवता शिव के सदन की सुधा से
आत्म तेज को प्रदत्त करा देवे ।७४। आधार बन्ध की प्रदान क्रियाओं
के द्वारा अमृत से समुत्थित कुण्डलिनी त्रिधाम के बीजस्वरूप भगवान्