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सर्वकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 485, कुल 511 में से

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पृष्ठ 485

विश पटल ] [ ४८५
इन्द्रियों को वश में रखने वाले मुकृती पुरुष रवि-चन्द्र और वह्नि के
शरीर वाले-निरन्तर तार स्वरूप-नित्यानन्द गुण के निलय आत्मा को
देखा करते हैं ।५६।
तारस्य सप्तविभवैः परिचीयमानं
मानैरगम्यमनिशं श्रुतिमौलिमृग्यम् ।
सच्चित्समस्तगमनश्वरमच्युतं तत्तं जः
परं भजत सान्द्रसुधाम्बुराशिम् ।५७
हिरण्मयं दीप्तमनेकवर्णं त्रिमूर्तिमूलं अनगमादिबीजम् ।
अंगुष्ठमात्रं पुरुषं भजन्ते चैतन्यमात्रं रविमण्डलस्थ लम् ।५८
सुखदा दातृसुभगा शंकराद्ध शरीरिणी ।
ग्रन्थपुष्पोपहारेण प्रीता नः पार्वती सदा ।५६
ध्यायन्ति दुग्धाब्धिभुजङ्गभोगे शयानमाद्यं क लासहायम् ।
प्रफुल्लनेत्राम्बुजनाभं चतुर्मुखेनाश्रितनाभिपद्मम् ।६०
द्याम्नायग्रन्थिवचनं घननीलनुद्यच्छी-
वत्सकौस्तुभगदाम्बुशङ्ख्चक्रम् ।
हृत्पुण्डकरीकनिलयं जगदेकमूलमाल लोकयन्ति
कृतिनः पुरुषं पुराणम् ।६१
बिन्दोर्नादसमुद्भवः समुदिते नादे जगत्कारणम् ।
तां तत्वमुखाम्बुजं पुरवितं वर्णात्मकैर्भूर्जजैः ।
आम्नायडिङ्ग्रचतुष्टयं पुरिरिपोरानन्दमूलं वपुः
पायाद्भोमुकुटेन्दुखण्डविगलद्दिव्यामृतौघैः स् ।६२
तार के सप्त विभवों के द्वारा परिचीय मान-प्रमाणों के द्वारा
अगम्य-निरन्तर श्रुति शिरोमणि के द्वारा खोजने के योग्य-सत्, चित्